जलवायु-स्मार्ट कृषि (Climate-Smart Agriculture) क्या है? भारत में इसके महत्व को स्पष्ट करें।
Q. जलवायु-स्मार्ट कृषि (Climate-Smart Agriculture) क्या है? भारत में इसके महत्व को स्पष्ट करें।
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खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, जलवायु-स्मार्ट कृषि (Climate-Smart Agriculture - CSA) कृषि प्रणालियों को प्रबंधित करने का एक ऐसा एकीकृत दृष्टिकोण है, जो जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का समाधान करते हुए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है। आर्थिक सर्वेक्षण और IPCC की रिपोर्टों से यह स्पष्ट है कि भारतीय कृषि जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, जिससे उपज और किसानों की आय दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।
जलवायु-स्मार्ट कृषि (CSA) के तीन मुख्य स्तंभ (Triple Win)
CSA कोई एक विशिष्ट तकनीक नहीं है, बल्कि यह स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कृषि को ढालने की एक बहुआयामी रणनीति है, जो तीन मुख्य उद्देश्यों पर केंद्रित है:
उत्पादकता और आय में वृद्धि (Productivity): कृषि उपज और किसानों की आय को संधारणीय (sustainable) रूप से बढ़ाना, ताकि बढ़ती आबादी के लिए खाद्य और पोषण सुरक्षा (SDG 2) सुनिश्चित की जा सके।
अनुकूलन (Adaptation): चरम मौसमी घटनाओं (सूखा, बाढ़, लू) के प्रति कृषि प्रणालियों की लचीलापन (resilience) बढ़ाना।
शमन (Mitigation): कृषि गतिविधियों से उत्पन्न होने वाले ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन (जैसे धान के खेतों से मीथेन और उर्वरकों से नाइट्रस ऑक्साइड) को कम करना।
भारत में जलवायु-स्मार्ट कृषि का बहुआयामी महत्व
भारतीय कृषि मानसून पर अत्यधिक निर्भर है और लगभग 50% कार्यबल को रोजगार प्रदान करती है। इस संदर्भ में CSA का महत्व निम्नलिखित आयामों में देखा जा सकता है:
1. आर्थिक महत्व (Economic)
आय सुरक्षा: भारत में 86% से अधिक छोटे और सीमांत किसान हैं। चरम मौसमी घटनाओं के कारण होने वाली फसल विफलता से बचाव कर CSA किसानों की आजीविका को सुरक्षित करता है।
लागत में कमी: जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (ZBNF) और सटीक कृषि (Precision Farming) जैसे CSA घटक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करते हैं, जिससे कृषि आदान लागत (input cost) में गिरावट आती है।
2. पर्यावरणीय और पारिस्थितिक महत्व (Environmental)
जल संसाधन प्रबंधन: नीति आयोग की CWMI रिपोर्ट के अनुसार भारत गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। CSA तकनीकों (जैसे सूक्ष्म-सिंचाई - 'प्रति बूंद अधिक फसल', ड्रिप/स्प्रिंकलर) के माध्यम से कृषि जल उपयोग दक्षता में सुधार होता है।
मृदा स्वास्थ्य बहाली: फसल चक्रण, पलवार (mulching), और जैविक खेती जैसी प्रथाएं मृदा में कार्बन संचय (Carbon Sequestration) को बढ़ाती हैं और मरुस्थलीकरण (Desertification) को रोकती हैं।
3. शमन और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं (Mitigation & Global Linkages)
GHG उत्सर्जन में कमी: भारत का कृषि क्षेत्र कुल राष्ट्रीय उत्सर्जन में लगभग 14% का योगदान देता है। प्रत्यक्ष बीजित चावल (DSR) और नीम-लेपित यूरिया जैसे उपयोगों से मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन में भारी कमी आती है।
COP26 'पंचामृत' लक्ष्य: CSA को अपनाकर भारत जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) और SDG 13 (Climate Action) के लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है।
भारत में CSA को बढ़ावा देने हेतु प्रमुख सरकारी पहलें
| पहल का नाम | मुख्य उद्देश्य |
| NICRA (राष्ट्रीय जलवायु अनुकूल कृषि नवाचार) | ICAR द्वारा संचालित; जलवायु-अनुकूल बीज किस्मों का विकास और ग्राम-स्तर पर तकनीक का प्रदर्शन। |
| NMSA (सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन) | जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) का हिस्सा; एकीकृत खेती और मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन पर जोर। |
| PM कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) | जल उपयोग दक्षता बढ़ाना और जलवायु-प्रेरित सूखे के प्रभाव को कम करना। |
| परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) | जैविक खेती को बढ़ावा देना, जिससे मृदा की जल धारण क्षमता और कार्बन सोखने की क्षमता में वृद्धि हो। |
आगे की राह (Way Forward)
तकनीकी एकीकरण: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), और ड्रोन तकनीक का उपयोग कर सटीक कृषि (Precision Agriculture) को गांव-गांव तक पहुंचाना।
क्षमता निर्माण और वित्तीय समावेशन: 'कृषि विज्ञान केंद्रों' (KVKs) के माध्यम से किसानों को जागरूक करना और उन्हें हरित जलवायु कोष (Green Climate Fund) एवं प्रभावी फसल बीमा (PMFBY) के तहत वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना।
विकेंद्रीकृत नीतियां: कृषि राज्य का विषय है, इसलिए राष्ट्रीय नीतियों को कृषि-जलवायु क्षेत्रों (Agro-climatic zones) के अनुसार अनुकूलित करने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच मजबूत सहकारी संघवाद की आवश्यकता है।
जलवायु-स्मार्ट कृषि केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि भारतीय कृषि के अस्तित्व और विकास के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है। इसे व्यापक रूप से अपनाकर ही भारत 'अमृत काल' में 'आत्मनिर्भर भारत' के साथ-साथ 'वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना के अनुरूप वैश्विक खाद्य सुरक्षा और जलवायु नेतृत्व सुनिश्चित कर सकता है।
