खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की भूमिका और इसमें तकनीक के उपयोग (e-PDS) की चर्चा करें।

 Q. खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की भूमिका और इसमें तकनीक के उपयोग (e-PDS) की चर्चा करें।

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विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) और सतत विकास लक्ष्य 2 (SDG 2: शून्य भुखमरी) के वैश्विक उद्देश्यों के आलोक में, भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) विश्व का सबसे बड़ा खाद्य सुरक्षा नेटवर्क है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 के तहत वैधानिक स्वरूप प्राप्त यह प्रणाली, देश की लगभग 80 करोड़ से अधिक आबादी को रियायती दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराकर संविधान के अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद 47 (पोषण स्तर में सुधार) के नीतिगत लक्ष्यों को यथार्थ में परिवर्तित करती है। हाल के वर्षों में PDS से लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) और अब ई-पीडीएस (e-PDS) तक का संक्रमण, शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही स्थापित करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध हुआ है।

खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में PDS की बहुआयामी भूमिका

भारत की समष्टि-आर्थिक (Macroeconomic) और सामाजिक संरचना में PDS एक दोहरी भूमिका (उत्पादक और उपभोक्ता दोनों के लिए) निभाता है:

1. सामाजिक और पोषण सुरक्षा (Social & Nutritional Security)

  • गरीबी शमन और क्रय शक्ति: बाजार मूल्य (Market Price) से अत्यधिक कम दरों (केंद्रीय निर्गम मूल्य) पर खाद्यान्न उपलब्ध कराकर, PDS समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की क्रय शक्ति (Purchasing Power) को बचाता है, जिसका उपयोग वह शिक्षा और स्वास्थ्य पर कर सकता है।

  • संकट प्रबंधन (Crisis Management): कोविड-19 महामारी के दौरान प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के माध्यम से PDS ने करोड़ों प्रवासी और दिहाड़ी मजदूरों को भुखमरी से बचाकर एक 'राष्ट्रीय सुरक्षा जाल' के रूप में कार्य किया।

2. आर्थिक और कृषि मूल्य स्थिरता (Economic & Agricultural Stability)

  • मूल्य स्थिरीकरण (Price Stabilization): यह प्रणाली खुले बाजार में खाद्यान्नों की कमी होने पर बफर स्टॉक (Buffer Stock) का उपयोग करके 'खाद्य मुद्रास्फीति' (Food Inflation) को नियंत्रित करती है।

  • किसानों का संरक्षण: PDS के लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर की जाने वाली खरीद किसानों को आय सुरक्षा (Income Security) प्रदान करती है।

पारंपरिक PDS की चुनौतियां और e-PDS (तकनीकी एकीकरण) का प्रभाव

शांता कुमार समिति (2015) की रिपोर्ट ने रेखांकित किया था कि पारंपरिक PDS में लगभग 46% खाद्यान्न का रिसाव (Leakage) होता है। फर्जी राशन कार्ड, कालाबाजारी और रसद श्रृंखला की अक्षमता जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए तकनीक का समावेशन (e-PDS) किया गया।

e-PDS के तहत तकनीकी हस्तक्षेप और उसके प्रभाव निम्नलिखित हैं:

1. बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और पहचान (Identification & e-KYC)

  • JAM ट्रिनिटी (जन-धन, आधार, मोबाइल) का उपयोग: राशन कार्डों को आधार से जोड़ने (Aadhaar Seeding) के परिणामस्वरूप देश भर में लगभग 4.7 करोड़ फर्जी और 'घोस्ट' (Ghost) राशन कार्डों को रद्द किया गया है। इससे समावेशन/बहिष्करण त्रुटियों (Inclusion/Exclusion Errors) में भारी कमी आई है।

  • इलेक्ट्रॉनिक पॉइंट ऑफ सेल (e-PoS) मशीनें: उचित दर की दुकानों (FPS) पर e-PoS मशीनों की स्थापना से वास्तविक लाभार्थी को ही खाद्यान्न मिलना सुनिश्चित हुआ है।

2. आपूर्ति श्रृंखला का डिजिटलीकरण (Supply Chain Management)

  • कमांड और कंट्रोल तंत्र: गोदामों से उचित दर की दुकानों तक खाद्यान्न की आवाजाही को GPS ट्रैकिंग और SMS अलर्ट से जोड़ा गया है। इससे 'ट्रांजिट लॉस' (मार्ग में चोरी) पर प्रभावी नियंत्रण लगा है।

  • ऑनलाइन पोर्टल और पारदर्शिता: प्रत्येक राज्य ने आपूर्ति, स्टॉक और लाभार्थियों का रियल-टाइम डेटाबेस ऑनलाइन कर दिया है, जिससे सामाजिक लेखा परीक्षा (Social Audit) और सूचना के अधिकार (RTI) का प्रभावी उपयोग संभव हुआ है।

3. सामाजिक न्याय और गतिशीलता (Social Justice via Tech)

  • वन नेशन वन राशन कार्ड (ONORC): e-PDS की सबसे बड़ी उपलब्धि ONORC है। यह 'पोर्टेबिलिटी' (Portability) की सुविधा देता है, जिससे कोई भी प्रवासी श्रमिक देश की किसी भी ई-पीओएस (e-PoS) सक्षम दुकान से अपने हिस्से का राशन प्राप्त कर सकता है। इसने भौगोलिक बाधाओं को समाप्त कर दिया है।

ई-पीडीएस और खाद्य सुरक्षा के समक्ष विद्यमान चुनौतियां

तकनीकी प्रगति के बावजूद, यह प्रणाली कुछ तकनीकी और संरचनात्मक बाधाओं का सामना कर रही है:

  • डिजिटल और आधारभूत संरचना का अंतराल (Digital Divide): सुदूर जनजातीय क्षेत्रों और पहाड़ी राज्यों में इंटरनेट कनेक्टिविटी की अस्थिरता और सर्वर डाउनटाइम के कारण e-PoS मशीनें कार्य नहीं कर पातीं, जिससे वास्तविक लाभार्थी राशन से वंचित (Authentication failures) रह जाते हैं।

  • अदृश्य भूख (Hidden Hunger) की समस्या: e-PDS मुख्य रूप से मैक्रोन्यूट्रिएंट्स (चावल और गेहूं) के वितरण में सफल रहा है, लेकिन सूक्ष्म पोषक तत्वों (Micronutrients) की कमी के कारण कुपोषण और एनीमिया की दर (जैसे NFHS-5 के आंकड़े) अभी भी उच्च है।

  • शारीरिक श्रम संबंधी त्रुटियां: बुजुर्गों और मजदूरों के उंगलियों के निशान घिस जाने के कारण बायोमेट्रिक पहचान विफल होने के कई मामले पीयूसीएल बनाम भारत संघ (PUCL vs Union of India) जैसी याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में लाए गए हैं।

आगे की राह और रणनीतिक सुधार

भारत को 'खाद्य सुरक्षा' (Food Security) से 'पोषण सुरक्षा' (Nutritional Security) की ओर ले जाने के लिए निम्नलिखित सुधारात्मक कदम आवश्यक हैं:

  • स्मार्ट और बहुआयामी प्रमाणीकरण: इंटरनेट न होने की स्थिति में 'ऑफलाइन ऑथेंटिकेशन' या 'स्मार्ट कार्ड' और आईरिस स्कैनर (Iris Scanner) जैसे वैकल्पिक पहचान तंत्रों का विस्तार किया जाना चाहिए।

  • आहार विविधीकरण (Dietary Diversification): 'श्री अन्न' (Millets/मोटे अनाज), दालों और खाद्य तेलों को e-PDS प्रणाली में व्यापक रूप से शामिल किया जाना चाहिए। फोर्टिफाइड चावल (Fortified Rice) का वितरण इस दिशा में एक सकारात्मक शुरुआत है।

  • प्रभावी शिकायत निवारण: द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की अनुशंसाओं के अनुरूप टोल-फ्री हेल्पलाइन और पंचायत स्तर पर मजबूत शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया जाए।

कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था होने के नाते, भारत का अंतिम लक्ष्य केवल भूख को मिटाना नहीं, बल्कि एक स्वस्थ, उत्पादक और कुपोषण-मुक्त मानव पूंजी का निर्माण करना है। तकनीक (e-PDS) और पोषण-केंद्रित नीतियों का यह अभिसरण न केवल 'सबका साथ, सबका विकास' के विजन को धरातल पर उतारेगा, बल्कि वर्ष 2047 तक एक स्वस्थ, समृद्ध और 'विकसित भारत' (Viksit Bharat) की मजबूत नींव भी रखेगा।

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