भारत में कृषि सब्सिडी की प्रणालीः इसके सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों का मूल्यांकन करें।

 Q. भारत में कृषि सब्सिडी की प्रणालीः इसके सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों का मूल्यांकन करें।

Ans - 

आर्थिक समीक्षा के अनुसार, भारतीय कृषि क्षेत्र में उर्वरक, बिजली, जल, बीज और ऋण पर दी जाने वाली विभिन्न सब्सिडियां (प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष) कृषि विकास की जीवनरेखा रही हैं। 1960 के दशक में 'हरित क्रांति' के दौर में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और उच्च उपज वाले बीजों (HYV) को अपनाने के लिए इन आर्थिक सहायताओं की शुरुआत की गई थी। वर्तमान परिदृश्य में, जहां एक ओर ये नीतियां सतत विकास लक्ष्य (SDG) 2 (शून्य भुखमरी) और SDG 1 (गरीबी की समाप्ति) के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को बल देती हैं, वहीं दूसरी ओर राजकोषीय घाटे, पारिस्थितिक क्षरण और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मंचों पर उठने वाले विवादों के कारण इनके व्यापक मूल्यांकन की आवश्यकता है।

भारत में कृषि सब्सिडी प्रणाली: सकारात्मक प्रभाव

कृषि सब्सिडी ने भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था को 'शिप-टू-माउथ' (आयात-निर्भरता) से एक 'शुद्ध खाद्य निर्यातक' राष्ट्र में परिवर्तित करने में आधारभूत भूमिका निभाई है:

1. खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता (Social & Economic Impact)

  • अधिशेष उत्पादन: उर्वरक और सिंचाई पर भारी सब्सिडी के कारण भारत आज गेहूं और चावल के उत्पादन में वैश्विक स्तर पर अग्रणी है। यही अधिशेष उत्पादन राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 के तहत 80 करोड़ आबादी की पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करता है।

  • मूल्य स्थिरता: न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और खाद्य सब्सिडी के माध्यम से उपभोक्ताओं को मुद्रास्फीति (Food Inflation) से बचाया जाता है, जिससे समाज के कमजोर वर्गों की क्रय शक्ति बनी रहती है।

2. कृषक आय सुरक्षा और जोखिम न्यूनीकरण

  • PM-KISAN (पीएम-किसान) जैसी प्रत्यक्ष आय समर्थन (Direct Income Support) योजनाओं ने छोटे और सीमांत किसानों (जो कुल कृषक आबादी का लगभग 86% हैं) को तरलता (Liquidity) प्रदान की है, जिससे वे महाजनों के महंगे ऋण-जाल (Debt Trap) से बचे हैं।

  • रियायती कृषि ऋण (Interest Subvention Scheme) ने कृषि क्षेत्र में पूंजी निर्माण को सुगम बनाया है।

3. तकनीकी समावेश और आधुनिकीकरण (Technological Impact)

  • कृषि-मशीनीकरण (ट्रैक्टर, हार्वेस्टर) और सूक्ष्म-सिंचाई उपकरणों (Micro-irrigation) पर दी जाने वाली पूंजीगत सब्सिडी (Capital Subsidy) ने पारंपरिक निर्वाह कृषि (Subsistence Farming) को वाणिज्यिक कृषि में परिवर्तित किया है।

कृषि सब्सिडी के नकारात्मक प्रभाव और अंतर्निहित चुनौतियां

सकारात्मक पहलुओं के बावजूद, वर्तमान सब्सिडी संरचना समष्टि-आर्थिक (Macroeconomic) और पारिस्थितिक मोर्चे पर गंभीर चुनौतियां उत्पन्न कर रही है:

1. राजकोषीय दबाव और पूंजीगत निवेश का ह्रास (Economic Challenges)

  • बढ़ती उर्वरक और खाद्य सब्सिडी के कारण सरकार का राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) दबाव में रहता है।

  • अर्थशास्त्रियों के अनुसार, सब्सिडी का उच्च बोझ कृषि अवसंरचना (जैसे- ग्रामीण सड़क, शीत भण्डारण/Cold Storage, अनुसंधान एवं विकास) में आवश्यक पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) को बाहर कर देता है (Crowding out effect)।

2. पारिस्थितिक और पर्यावरणीय संकट (Environmental Impact)

  • मृदा स्वास्थ्य का क्षरण: यूरिया (नाइट्रोजन) पर अत्यधिक नियंत्रण और सब्सिडी के कारण किसानों ने इसका अंधाधुंध उपयोग किया है। इसके परिणामस्वरूप NPK (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश) का आदर्श अनुपात (4:2:1) बिगड़कर कई राज्यों में 7:3:1 या उससे अधिक हो गया है।

  • जल दोहन और डार्क जोन: बिजली और डीजल पर मुफ्त या अत्यधिक रियायती सब्सिडी ने पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भूजल के अति-दोहन को जन्म दिया है, जिससे SDG 12 (जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन) का गंभीर उल्लंघन हो रहा है।

3. सामाजिक और क्षेत्रीय असमानता (Social Inequity)

  • शांता कुमार समिति की रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि MSP और कृषि इनपुट सब्सिडी का लाभ मुख्य रूप से बड़े किसानों और कुछ विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों (हरित क्रांति वाले राज्य) तक ही सीमित रहा है।

  • असिंचित क्षेत्रों और वर्षा-आधारित कृषि (Rainfed Agriculture) करने वाले छोटे किसानों को संस्थागत सब्सिडी तंत्र का बहुत कम लाभ मिल पाता है।

4. अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कानूनी बाधाएं (Global & Legal Challenges)

  • विश्व व्यापार संगठन (WTO) के कृषि समझौते (Agreement on Agriculture - AoA) के तहत भारत की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और इनपुट सब्सिडी नीतियां 'एम्बर बॉक्स' (Amber Box) के अंतर्गत आती हैं, जिन्हें व्यापार को विकृत करने वाला माना जाता है। विकसित राष्ट्र अक्सर भारत की 10% डी-मिनिमिस (De-minimis) सीमा के उल्लंघन का मुद्दा उठाते हैं।

आगे की राह (Way Forward)

अशोक दलवई समिति (किसानों की आय दोगुनी करने संबंधी) की सिफारिशों के आलोक में सब्सिडी संरचना को 'इनपुट-केंद्रित' से 'निवेश-केंद्रित' बनाने की आवश्यकता है:

  • प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) का विस्तार: लीकेज (Leakage) और बाज़ार की विकृतियों को रोकने के लिए उर्वरक और बिजली सब्सिडी को सीधे किसानों के बैंक खातों (JAM ट्रिनिटी के माध्यम से) में स्थानांतरित किया जाना चाहिए।

  • सब्सिडी का पारिस्थितिक सशर्तकरण: उर्वरक सब्सिडी को मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) के आंकड़ों से जोड़ा जाना चाहिए ताकि वैज्ञानिक और संतुलित उर्वरक उपयोग सुनिश्चित हो सके।

  • पूंजीगत व्यय की ओर झुकाव (Shift to Capex): इनपुट सब्सिडी से बचाई गई राजकोषीय पूंजी को प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY), ई-नाम (e-NAM) और कृषि अवसंरचना कोष (AIF) में निवेश किया जाए।

  • फसल विविधीकरण (Crop Diversification): धान और गेहूं जैसी जल-सघन फसलों पर निर्भरता कम करने के लिए दलहन, तिलहन और 'श्री अन्न' (Millet) को लक्षित मूल्य समर्थन व सब्सिडी प्रदान की जाए।

भारतीय कृषि आज एक संक्रमणकालीन दौर से गुजर रही है। जहां किसानों को वित्तीय झटकों से बचाने के लिए सरकारी सहायता अपरिहार्य है, वहीं यह सहायता बाजार-विरोधी या प्रकृति-विरोधी नहीं होनी चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 48 (कृषि का आधुनिक और वैज्ञानिक प्रबन्ध) के नीतिगत आदर्शों पर चलते हुए 'जलवायु-स्मार्ट कृषि' (Climate-Smart Agriculture) और न्यायसंगत आय-समर्थन का संतुलित मॉडल ही वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के सशक्त और आत्मनिर्भर ग्रामीण आधार का निर्माण कर सकता है।

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