गरीबी और असमानता को कम करने में 'गिग इकॉनमी' (Gig Economy) की भूमिका और चुनौतियों का मूल्यांकन करें।
Q. गरीबी और असमानता को कम करने में 'गिग इकॉनमी' (Gig Economy) की भूमिका और चुनौतियों का मूल्यांकन करें।
Ans -
नीति आयोग की बहुचर्चित रिपोर्ट 'इंडियाज बूमिंग गिग एंड प्लेटफॉर्म इकॉनमी' (2022) के अनुसार, गिग इकॉनमी से तात्पर्य एक ऐसी मुक्त श्रम बाजार व्यवस्था से है, जिसमें पारंपरिक, पूर्णकालिक रोजगार के बजाय अस्थायी, लचीले और फ्रीलांस अनुबंध होते हैं। वर्तमान में भारत में लगभग 77 लाख गिग श्रमिक हैं, जिनके वर्ष 2029-30 तक 2.35 करोड़ होने का अनुमान है। तीव्र तकनीकी प्रगति और इंटरनेट की पहुंच ने इस अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है, जो भारतीय समाज में गरीबी उन्मूलन और आय असमानता को पाटने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है, यद्यपि इसके साथ कई संरचनात्मक चुनौतियाँ भी अंतर्निहित हैं।
गरीबी और असमानता कम करने में गिग इकॉनमी की भूमिका
1. आर्थिक समावेशन और रोजगार सृजन
प्रवेश की निम्न बाधाएं (Low Entry Barrier): गिग इकॉनमी (जैसे राइड-हेलिंग, डिलीवरी प्लेटफॉर्म) अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों को रोजगार के त्वरित अवसर प्रदान करती है, जिससे वे गरीबी के दुष्चक्र से बाहर आ पाते हैं।
वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion): डिजिटल भुगतान प्रणालियों (UPI आदि) से जुड़ने के कारण हाशिए के श्रमिक औपचारिक बैंकिंग प्रणाली का हिस्सा बन रहे हैं, जिससे उन्हें संस्थागत ऋण प्राप्त करने में सुविधा होती है।
2. क्षेत्रीय और भौगोलिक असमानता में कमी
रोजगार का विकेंद्रीकरण: गिग इकॉनमी ने आर्थिक अवसरों को केवल महानगरों तक सीमित नहीं रखा है। तकनीकी प्लेटफार्मों के विस्तार ने पटना और बिहार के सभी जिलों जैसे टियर-2 और टियर-3 क्षेत्रों में भी स्थानीय स्तर पर सूक्ष्म-उद्यमिता और रोजगार के नए स्रोत उत्पन्न किए हैं।
प्रवास पर नियंत्रण: स्थानीय स्तर पर आय के साधन उपलब्ध होने से बड़े शहरों की ओर होने वाले 'संकटग्रस्त प्रवास' (Distress Migration) में कमी आई है।
3. सामाजिक और लैंगिक सशक्तिकरण
महिला श्रम बल भागीदारी (FLFP): कार्य के घंटों में लचीलापन (Flexibility) महिलाओं को घरेलू जिम्मेदारियों के साथ-साथ आर्थिक उपार्जन का अवसर प्रदान करता है, जो लैंगिक असमानता को कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
हाशिए के वर्गों का समावेश: दिव्यांग जनों और छात्रों के लिए 'वर्क फ्रॉम होम' और फ्रीलांसिंग के अवसर सुलभ हुए हैं।
गिग इकॉनमी के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ (असमानता के नए खतरे)
1. विधिक और विनियामक शून्यता
कर्मचारी बनाम ठेकेदार विवाद: गिग श्रमिकों को पारंपरिक श्रम कानूनों (जैसे न्यूनतम मजदूरी अधिनियम) के तहत 'कर्मचारी' नहीं, बल्कि 'स्वतंत्र भागीदार' माना जाता है।
सामाजिक सुरक्षा का अभाव: स्वास्थ्य बीमा, पेंशन, सवेतन अवकाश और मातृत्व लाभ न होने के कारण किसी भी आकस्मिक स्वास्थ्य या आर्थिक झटके से ये श्रमिक पुनः गरीबी रेखा के नीचे जा सकते हैं।
2. आर्थिक और तकनीकी चुनौतियाँ
आय की अस्थिरता और एल्गोरिथम नियंत्रण: प्लेटफॉर्म का अपारदर्शी एल्गोरिथम (Algorithmic Management) कार्य के आवंटन और आय को नियंत्रित करता है। श्रमिकों की सौदेबाजी की शक्ति (Bargaining Power) अत्यंत क्षीण होती है।
डिजिटल डिवाइड (Digital Divide): स्मार्टफ़ोन, उच्च गति के इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता तक असमान पहुंच के कारण ग्रामीण और अत्यंत गरीब वर्ग इस अर्थव्यवस्था से वंचित रह जाते हैं।
कौशल विकास का अभाव: अपस्किलिंग (Upskilling) की पूरी जिम्मेदारी श्रमिक पर होती है, जिससे उनके करियर में ऊर्ध्वाधर गतिशीलता (Vertical Mobility) बाधित होती है।
रणनीतिक रूपरेखा और आगे की राह
गिग इकॉनमी को शोषक व्यवस्था बनने से रोकने और इसके लाभों को न्यायसंगत बनाने के लिए बहुआयामी हस्तक्षेप आवश्यक हैं:
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 का क्रियान्वयन: इस संहिता में गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को पहली बार कानूनी मान्यता दी गई है और उनके लिए एक विशेष 'सामाजिक सुरक्षा कोष' स्थापित करने का प्रावधान है। इसे त्वरित रूप से लागू किया जाना चाहिए।
नीति आयोग का RAISE ढांचा: प्लेटफार्मों को RAISE (Recognise, Allow, Incorporate, Support, Ensure) फ्रेमवर्क अपनाना चाहिए, ताकि श्रमिकों का उचित कल्याण सुनिश्चित हो सके।
अंतर्राष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाएं: ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट के उबेर (Uber) फैसले और फेयरवर्क सिद्धांतों (Fairwork Principles) से सीख लेते हुए न्यूनतम आय की गारंटी, सुरक्षित कार्य परिस्थितियां और शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना अनिवार्य है।
गिग इकॉनमी भारतीय श्रम बाजार के अपरिहार्य संरचनात्मक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करती है। यद्यपि इसने रोजगार के अभूतपूर्व अवसर सृजित कर गरीबी शमन में योगदान दिया है, किंतु एक मजबूत विनियामक तंत्र के बिना यह 'श्रम के अनौपचारीकरण' (Informalisation of Labour) का नया रूप बन सकती है। उचित नीतिगत हस्तक्षेपों के माध्यम से इन श्रमिकों के हितों को सुरक्षित करके ही हम सतत विकास लक्ष्य (SDG) 1 (गरीबी की समाप्ति), SDG 8 (उत्कृष्ट कार्य और आर्थिक वृद्धि) और SDG 10 (असमानताओं में कमी) को प्राप्त कर 'विकसित भारत @2047' के एक सशक्त और समावेशी विजन को साकार कर सकते हैं।