भारतीय समाज में जाति व्यवस्था का भिन्न स्वरूपः क्या शहरीकरण ने जातिगत भेदभाव को कम किया है?

Q. भारतीय समाज में जाति व्यवस्था का भिन्न स्वरूपः क्या शहरीकरण ने जातिगत भेदभाव को कम किया है?

Ans - 

भारत में जाति व्यवस्था एक प्राचीन और जटिल सामाजिक स्तरीकरण (Social Stratification) प्रणाली है, जो ऐतिहासिक रूप से जन्म, अनुष्ठानिक शुद्धता और व्यवसाय पर आधारित रही है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने शहरीकरण को जातिवाद की बेड़ियों को तोड़ने और सामाजिक समता स्थापित करने का एक सशक्त माध्यम माना था। वर्तमान में, जैसे-जैसे भारत तीव्र जनसांख्यिकीय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है (2050 तक लगभग 50% आबादी के शहरी होने का अनुमान), जाति व्यवस्था का स्वरूप भी ग्रामीण 'संरचनात्मक पदानुक्रम' (Structural Hierarchy) से बदलकर अधिक बहुआयामी हो गया है।

भारतीय समाज में जाति व्यवस्था का बदलता स्वरूप और शहरीकरण का प्रभाव

शहरीकरण ने सामाजिक अंतःक्रियाओं की प्रकृति को परिवर्तित किया है। इस संदर्भ में इसके प्रभावों का मूल्यांकन दो मुख्य दृष्टिकोणों से किया जा सकता है:

1. शहरीकरण द्वारा जातिगत भेदभाव में कमी (सकारात्मक प्रभाव)

शहरीकरण ने कई स्तरों पर पारंपरिक जातीय बंधनों को शिथिल किया है:

  • आर्थिक एवं व्यावसायिक गतिशीलता (Economic Mobility): ग्रामीण जजमानी व्यवस्था के विपरीत, शहरी श्रम बाजार में रोजगार योग्यता (Merit), शिक्षा और कौशल पर आधारित है। आधुनिक उद्योगों और सेवा क्षेत्र ने जातियों को उनके पारंपरिक पेशों से मुक्त कर ऊर्ध्वाधर गतिशीलता (Vertical Mobility) को बढ़ावा दिया है।

  • सार्वजनिक स्थानों का तटस्थीकरण: शहरी जीवन शैली में सार्वजनिक परिवहन (मेट्रो, बस), रेस्तरां, सिनेमाघर और शैक्षणिक संस्थानों में अनुष्ठानिक शुद्धता और प्रदूषण (Purity and Pollution) की धारणा लगभग अप्रासंगिक हो गई है। शहरी गुमनामी (Urban Anonymity) ने प्रत्यक्ष छुआछूत को अत्यंत सीमित कर दिया है।

  • राजनीतिक एवं विधिक जागरूकता: शहरी केंद्रों में सूचना और शिक्षा तक बेहतर पहुंच ने दलित और पिछड़े वर्गों में संवैधानिक अधिकारों (जैसे अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 17) के प्रति चेतना का प्रसार किया है।

  • महानगरीय संस्कृति और अंतर्जातीय संबंध: महानगरीय शहरों में कार्यस्थल की अंतःक्रियाओं और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत अंतर्जातीय विवाहों को धीरे-धीरे (यद्यपि सीमित स्तर पर) सामाजिक स्वीकृति मिल रही है।

2. शहरीकरण की सीमाएँ: जातिगत भेदभाव के नए और प्रच्छन्न (Covert) स्वरूप

यद्यपि प्रत्यक्ष और हिंसक भेदभाव में कमी आई है, किंतु समाजशास्त्री सुखदेव थोराट के अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि शहरी क्षेत्रों में जाति ने स्वयं को नए, आधुनिक सांचों में ढाल लिया है:

  • स्थानिक और आवासीय पृथक्करण (Spatial Segregation): शहरी बस्तियों का भूगोल आज भी जातीय आधार पर विभाजित है। रियल एस्टेट बाजार में दलितों और अल्पसंख्यकों को मकान किराए पर मिलने में 'संस्थागत भेदभाव' का सामना करना पड़ता है।

  • आर्थिक एवं कॉरपोरेट असमानता: कॉर्पोरेट बोर्डरूम, निजी क्षेत्र के उच्च प्रशासनिक पदों और स्टार्टअप इकोसिस्टम में आज भी उच्च जातियों का वर्चस्व है। इस असमानता को अक्सर 'सामाजिक पूंजी' (Social Capital) और 'नेटवर्किंग' के आवरण में छिपा दिया जाता है।

  • वैवाहिक प्राथमिकताएं और नव-जातिवाद: यद्यपि विवाह के माध्यम आधुनिक (जैसे- ऑनलाइन Matrimonial Sites) हो गए हैं, किंतु वैवाहिक विज्ञापन आज भी जातिगत फिल्टर, गोत्र और उप-जाति की प्राथमिकताओं पर दृढ़ता से आधारित हैं।

  • व्यवसायों का जातीयकरण (Casteisation of Occupations): 'मैनुअल स्कैवेंजिंग', शहरी सीवर सफाई और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े अधिकांश कर्मचारी आज भी विशिष्ट हाशिए की जातियों (विशेषकर वाल्मीकि समुदाय) से आते हैं। यह शहरीकरण के बीच जातीय असमानता का सबसे ज्वलंत और क्रूर प्रमाण है।

शहरीकरण ने जाति व्यवस्था के कठोर, अनुष्ठानिक और प्रत्यक्ष स्वरूप को निश्चित रूप से कम किया है, परंतु इसने जाति को पूर्णतः समाप्त करने के बजाय उसे एक नए 'आधुनिक और अदृश्य' (Modern and Invisible) स्वरूप में परिवर्तित कर दिया है। इस सामाजिक विडंबना को दूर करने के लिए केवल जनसांख्यिकीय विस्तार पर्याप्त नहीं है, बल्कि संज्ञानात्मक और वैचारिक शहरीकरण (Cognitive Urbanization) की आवश्यकता है। सतत विकास लक्ष्य (SDG) 10 (असमानता में कमी) के आदर्शों के अनुरूप निजी क्षेत्र में विविधता (Diversity & Inclusion), समान आवासीय नीतियां और गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा सुनिश्चित करके ही हम 'विकसित भारत @2047' के समतामूलक विजन को यथार्थ में बदल सकते हैं।

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