भारत-अमेरिका संबंधों में रक्षा और तकनीकी सहयोग (ICET) के बढ़ते महत्व की विवेचना करें।
Q. भारत-अमेरिका संबंधों में रक्षा और तकनीकी सहयोग (ICET) के बढ़ते महत्व की विवेचना करें।
Ans -
शीत युद्ध के दौर के 'अलग-थलग लोकतंत्रों' (Estranged Democracies) से लेकर 21वीं सदी की 'व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी' (Comprehensive Global Strategic Partnership) तक, भारत-अमेरिका संबंधों ने एक लंबी कूटनीतिक यात्रा तय की है। वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में, दोनों देशों के मध्य संबंधों का गुरुत्व केंद्र 'महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों पर पहल' (iCET - Initiative on Critical and Emerging Technology) और उन्नत रक्षा सहयोग की ओर स्थानांतरित हो गया है। यह धुरी न केवल हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में शक्ति संतुलन को आकार दे रही है, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण में भी एक निर्णायक भूमिका निभा रही है।
रक्षा और तकनीकी सहयोग (iCET) का बहुआयामी महत्व
वर्तमान वैश्विक संक्रमण काल में, जहां प्रौद्योगिकी ही नई भू-राजनीतिक मुद्रा (Geopolitical Currency) बन चुकी है, भारत-अमेरिका सहयोग को निम्नलिखित आयामों (PESTLE दृष्टिकोण) के अंतर्गत विश्लेषित किया जा सकता है:
1. भू-सामरिक और सैन्य सुरक्षा (Geopolitical & Military Security)
रक्षा समझौतों का संस्थागतीकरण: अमेरिका द्वारा भारत को 'प्रमुख रक्षा भागीदार' (Major Defense Partner - MDP) का दर्जा देना और चार बुनियादी समझौतों— LEMOA, COMCASA, GSOMIA, और BECA— पर हस्ताक्षर ने दोनों सेनाओं के मध्य अंतर-संचालनीयता (Interoperability) और रसद समर्थन को उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है।
सह-उत्पादन की ओर संक्रमण: रक्षा व्यापार और प्रौद्योगिकी पहल (DTTI) और नवगठित INDUS-X (India-U.S. Defense Acceleration Ecosystem) पहल के तहत, दोनों देश क्रेता-विक्रेता (Buyer-Seller) मॉडल से आगे बढ़कर संयुक्त अनुसंधान और सह-विकास (Co-development) की ओर बढ़ रहे हैं। GE F414 जेट इंजन का भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ निर्माण और MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन का अधिग्रहण इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
2. iCET के माध्यम से तकनीकी संप्रभुता (Technological Sovereignty)
उभरती प्रौद्योगिकियों (Emerging Tech) में नेतृत्व: 2023 में लॉन्च किए गए iCET के अंतर्गत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, 6G और बायोटेक्नोलॉजी पर संयुक्त कार्यबल का निर्माण किया गया है। यह चीन के तकनीकी एकाधिकार (Tech Hegemony) को प्रतिसंतुलित करने की एक अहम 'हेजिंग' (Hedging) रणनीति है।
अंतरिक्ष और विज्ञान कूटनीति: भारत का अमेरिकी नेतृत्व वाले 'आर्टेमिस समझौते' (Artemis Accords) पर हस्ताक्षर करना और नासा-इसरो का संयुक्त NISAR (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar) मिशन बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है।
3. आर्थिक और औद्योगिक लचीलापन (Economic & Industrial Resilience)
आपूर्ति श्रृंखला का विविधीकरण: वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में चीन के विकल्प के रूप में उभरने के लिए सुरक्षित सेमीकंडक्टर तंत्र का निर्माण किया जा रहा है। यह भारत की 'चाइना प्लस वन' (China Plus One) रणनीति का प्रमुख लाभार्थी बनाता है।
'मेक इन इंडिया' का सुदृढ़ीकरण: उच्च तकनीक वाले क्षेत्रों (High-tech sectors) में अमेरिकी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) भारत को सतत विकास लक्ष्य-9 (SDG-9: उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढांचा) प्राप्त करने में सशक्त कर रहा है।
भारत-अमेरिका संबंधों का संरचनात्मक रूपांतरण
| आयाम (Dimension) | परंपरागत कूटनीति (Traditional) | नव-रणनीतिक कूटनीति (New Strategic - iCET) |
| रक्षा संबंध | सैन्य उपकरणों की प्रत्यक्ष खरीद (Import) | तकनीकी हस्तांतरण (ToT) और संयुक्त उत्पादन |
| आर्थिक व्यापार | सेवा क्षेत्र और सॉफ्टवेयर निर्यात | सेमीकंडक्टर, क्रिटिकल मिनरल्स, डी-रिस्किंग (De-risking) |
| भू-राजनीतिक फोकस | द्विपक्षीय व्यापार वार्ताएं | क्वाड (QUAD) के माध्यम से इंडो-पैसिफिक सुरक्षा |
सहयोग के मार्ग में विद्यमान चुनौतियाँ (Legal & Political Challenges)
इस रणनीतिक अभिसरण के बावजूद, कई नीतिगत और विनियामक बाधाएं उपस्थित हैं:
अमेरिकी निर्यात नियंत्रण (Export Controls): अमेरिका के ITAR (अंतर्राष्ट्रीय शस्त्र यातायात नियम) के कड़े प्रावधान संवेदनशील और दोहरे उपयोग (Dual-use) वाली प्रौद्योगिकी के निर्बाध हस्तांतरण में लाल फीताशाही और कानूनी बाधाएं उत्पन्न करते हैं।
भारत की 'सामरिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy): रूस के साथ भारत के गहरे ऐतिहासिक रक्षा संबंध (जैसे S-400 मिसाइल प्रणाली की खरीद) और बहु-गठबंधन (Multi-alignment) नीति, वाशिंगटन के राजनीतिक हलकों में यदा-कदा विश्वास की कमी (Trust Deficit) पैदा करती है।
बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) और डेटा नीतियां: भारत की 'डेटा स्थानीयकरण' (Data Localization) नीतियों और IPR मानकों पर दोनों देशों के विनियामक ढांचे में भिन्नताएं हैं, जो अमेरिकी टेक दिग्गजों के निवेश को प्रभावित करती हैं।
आगे की राह (Way Forward)
रक्षा और तकनीकी सहयोग की पूर्ण क्षमता का दोहन करने के लिए नीतिगत स्तर पर निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए:
'ट्रिपल हेलिक्स मॉडल' (Triple Helix Model) का उपयोग: रक्षा और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने के लिए दोनों देशों की सरकारों, निजी उद्योगों और शैक्षणिक संस्थानों (Academia) के बीच एक मजबूत त्रिपक्षीय संस्थागत ढांचा विकसित किया जाना चाहिए।
नियामक बाधाओं का सरलीकरण: अमेरिकी कांग्रेस को भारत के लिए 'प्रौद्योगिकी हस्तांतरण' प्रक्रियाओं में विशेष विधायी छूट (Legislative Waivers) प्रदान करनी चाहिए, ताकि INDUS-X और iCET जैसी पहलें तेजी से धरातल पर उतर सकें।
वैश्विक मानक-निर्धारण (Global Standard Setting): ग्लोबल साउथ (Global South) की चिंताओं का प्रतिनिधित्व करते हुए, भारत को अमेरिका के साथ मिलकर AI, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए समावेशी और पारदर्शी वैश्विक नियामक मानक तय करने चाहिए।
भारत और अमेरिका के मध्य रक्षा और iCET सहयोग केवल दो राष्ट्रों के द्विपक्षीय हितों का योग नहीं है, बल्कि यह एक खुले, नियम-आधारित (Rule-based) और तकनीकी रूप से सुरक्षित इंडो-पैसिफिक की जीवन रेखा है। इस रणनीतिक साझेदारी के माध्यम से भारत न केवल अपने रक्षा आधुनिकीकरण को पूर्ण कर रहा है, बल्कि 21वीं सदी की ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में एक 'प्रौद्योगिकी महाशक्ति' के रूप में स्थापित हो रहा है। यह अभिसरण भारत को 'विकसित भारत @ 2047' के आर्थिक व सामरिक संकल्पों को सिद्ध करने के साथ-साथ 'वसुधैव कुटुंबकम' के दर्शन के अनुरूप वैश्विक शांति और तकनीकी प्रगति का नेतृत्व करने में पूर्णतः सक्षम बनाएगा।