विश्व व्यापार संगठन (WTO) में विकासशील देशों के हितों की रक्षा करने में भारत की भूमिका का मूल्यांकन करें।
Q. विश्व व्यापार संगठन (WTO) में विकासशील देशों के हितों की रक्षा करने में भारत की भूमिका का मूल्यांकन करें।
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विश्व व्यापार संगठन (WTO) में विकासशील देशों के हितों की रक्षा में भारत की भूमिका
विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना के बाद से ही भारत ने 'ग्लोबल साउथ की आवाज़' (Voice of the Global South) के रूप में एक अपरिहार्य और नेतृत्वकारी भूमिका निभाई है। हाल ही में अबू धाबी में संपन्न 13वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC13) में भी भारत ने यह स्पष्ट कर दिया कि बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली का मूल उद्देश्य केवल विकसित देशों के व्यापारिक हितों का पोषण नहीं, बल्कि विश्व की बहुसंख्यक आबादी की खाद्य सुरक्षा और आजीविका सुनिश्चित करना है।
विकासशील देशों के हितों का संरक्षण: भारत के बहुआयामी प्रयास
भारत ने WTO के विभिन्न मंचों पर PESTLE दृष्टिकोण के तहत विकासशील व अल्पविकसित देशों (LDCs) की चिंताओं को मुखरता से उठाया है:
1. कृषि और खाद्य सुरक्षा (आर्थिक एवं सामाजिक आयाम)
सार्वजनिक भंडारण (Public Stockholding - PSH): कृषि पर समझौते (Agreement on Agriculture - AoA) की असमान शर्तों के विरुद्ध भारत ने G-33 देशों का नेतृत्व किया है।
भारत का दृढ़ मत है कि खाद्य सुरक्षा के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को व्यापार-विकृत (Trade-distorting) नहीं माना जा सकता। शांति खंड (Peace Clause) और स्थायी समाधान: 2013 के बाली सम्मेलन में भारत ने 'पीस क्लॉज़' को मान्यता दिलाई।
MC13 तक भारत ने PSH के स्थायी समाधान की मांग को सर्वोपरि रखा है, ताकि सतत विकास लक्ष्य-2 (शून्य भुखमरी) को प्राप्त किया जा सके। सब्सिडी की असमानता का विरोध: विकसित देशों द्वारा प्रदान की जाने वाली एम्बर बॉक्स (Amber Box) कृषि सब्सिडी विकासशील देशों की तुलना में कई गुना अधिक है।
भारत इस असंतुलन को दूर कर 'समान अवसर' (Level Playing Field) स्थापित करने के लिए मुखर रहा है।
2. बौद्धिक संपदा अधिकार और जन स्वास्थ्य (तकनीकी एवं सामाजिक आयाम)
TRIPS छूट (Waiver): कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर टीकों, जांच और दवाओं पर TRIPS (Trade-Related Aspects of Intellectual Property Rights) नियमों में छूट का ऐतिहासिक प्रस्ताव रखा था, ताकि जन स्वास्थ्य को कॉर्पोरेट एकाधिकार से ऊपर रखा जा सके।
सदाबहार पेटेंटिंग (Evergreening) का विरोध: भारत ने बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों द्वारा दवाओं के पेटेंट की अवधि अनुचित रूप से बढ़ाने का निरंतर विरोध किया है, जिससे गरीब देशों को सस्ती जेनेरिक दवाएं सुलभ हो सकें।
3. मत्स्य पालन सब्सिडी और आजीविका (पर्यावरणीय एवं कानूनी आयाम)
विशेष और विभेदक उपचार (S&DT): विकसित देशों के औद्योगिक मत्स्यन (Industrial Fishing) के कारण समुद्री संसाधन नष्ट हो रहे हैं। भारत ने यह मांग पुरजोर तरीके से उठाई है कि विकासशील देशों के पारंपरिक और छोटे मछुआरों के हितों की रक्षा के लिए विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में 200 समुद्री मील तक सब्सिडी जारी रखने हेतु छूट (S&DT) दी जाए।
4. ई-कॉमर्स और डिजिटल संप्रभुता (तकनीकी एवं आर्थिक आयाम)
कस्टम ड्यूटी मोरेटोरियम: इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर सीमा शुल्क स्थगन (Moratorium) को अनिश्चित काल तक बढ़ाने का भारत ने कड़ा विरोध किया है।
इसका प्राथमिक कारण यह है कि इससे विकासशील देशों को भारी राजस्व हानि होती है और उनकी डिजिटल संप्रभुता (Data Sovereignty) प्रभावित होती है।
5. बहुपक्षवाद और संस्थागत अखंडता (राजनीतिक आयाम)
संयुक्त वक्तव्य पहलों (JSIs) का विरोध: विकसित देशों द्वारा WTO के सर्वसम्मति नियम को दरकिनार कर 'निवेश सुविधा' (Investment Facilitation for Development) जैसे बहुपक्षीय (Plurilateral) समझौते थोपने का भारत ने कड़ा प्रतिरोध किया है।
विवाद समाधान तंत्र की बहाली: भारत ने अपीलीय निकाय (Appellate Body) की शीघ्र बहाली पर जोर दिया है, जिसे कुछ विकसित देशों द्वारा पंगु बना दिया गया है।
विद्यमान चुनौतियां
नकारात्मक छवि का निर्माण: विकसित देशों द्वारा अक्सर भारत को व्यापार वार्ता में "बाधा उत्पन्न करने वाले" (Obstructionist) के रूप में चित्रित किया जाता है, जो एकतरफा विमर्श का हिस्सा है।
विकासशील देशों के बीच वैचारिक भिन्नता: कृषि निर्यात करने वाले विकासशील देश (जैसे केर्न्स ग्रुप) और खाद्य आयात करने वाले देशों (G-33) के बीच अक्सर सामंजस्य का अभाव होता है, जिससे एकजुटता प्रभावित होती है।
नए व्यापारिक मुद्दे: श्रम मानक, पर्यावरण, और लैंगिक समानता को व्यापार से जोड़ने के विकसित देशों के प्रयासों से विकासशील देशों पर गैर-व्यापारिक अवरोध (Non-Tariff Barriers) थोपे जाने का तीव्र जोखिम उत्पन्न हो गया है।
आगे की राह और वैश्विक दृष्टिकोण
भारत का रुख संरक्षणवादी (Protectionist) न होकर, न्यायसंगत और विकासोन्मुखी (Pro-Development) है। 'वसुधैव कुटुंबकम' के महान दर्शन पर चलते हुए, भारत को G-33, अफ्रीकी समूह (African Group) और ACP (Africa, Caribbean, and Pacific) देशों के साथ अपने गठजोड़ को रणनीतिक रूप से और अधिक सुदृढ़ करना चाहिए।
WTO में सुधारों की प्रक्रिया पारदर्शी, समावेशी और सर्वसम्मति-आधारित होनी आवश्यक है। 'न्यू इंडिया 2047' के विजन के अनुरूप, भारत को नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि वैश्वीकरण का लाभ वैश्विक पदानुक्रम में सबसे निचले पायदान पर खड़े देशों तक भी पहुंचे। एक न्यायसंगत विश्व व्यापार प्रणाली ही भविष्य की स्थिर और समृद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव रख सकती है।
यह वीडियो विश्व व्यापार संगठन के 13वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC13) के मुख्य मुद्दों, विशेषकर खाद्य सुरक्षा और विकासशील देशों के हितों को लेकर भारत के रणनीतिक रुख का प्रासंगिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।