संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार की आवश्यकता क्यों है? भारत की स्थायी सदस्यता के दावे का आधार क्या है?

 Q. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार की आवश्यकता क्यों है? भारत की स्थायी सदस्यता के दावे का आधार क्या है?

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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार: प्रासंगिकता एवं भारत की दावेदारी

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की वर्तमान संरचना मूलतः वर्ष 1945 के द्वितीय विश्व युद्धोत्तर भू-राजनीतिक शक्ति-संतुलन का प्रतिरूप है। विगत आठ दशकों में वैश्विक व्यवस्था के वि-उपनिवेशीकरण, आर्थिक केंद्रों के पूर्व की ओर स्थानांतरण तथा समकालीन भू-राजनीतिक संकटों (यथा युक्रेन युद्ध एवं पश्चिम एशिया संघर्ष) ने परिषद की संस्थागत पंगुता को उजागर किया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा हाल ही में अंगीकार किए गए 'पैक्ट फॉर द फ्यूचर' (Pact for the Future) ने 'सुधारित बहुपक्षवाद' (Reformed Multilateralism) को अंतरराष्ट्रीय शांति एवं स्थिरता के लिए अपरिहार्य घोषित किया है।

सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधारों की अनिवार्यता

वर्तमान वैश्विक संदर्भ में सुरक्षा परिषद में संरचनात्मक एवं प्रक्रियात्मक सुधार निम्नलिखित कारणों से अनिवार्य हो चुके हैं:

  • भू-राजनीतिक एवं प्रतिनिधित्वमूलक विषमता: वर्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र के 51 सदस्य थे, जो वर्तमान में बढ़कर 193 हो चुके हैं; किंतु सुरक्षा परिषद का स्थायी ढांचा (P-5) अपरिवर्तित है। संपूर्ण अफ्रीका महाद्वीप और लैटिन अमेरिका का स्थायी श्रेणी में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है, जबकि वैश्विक निर्णयों का एक बड़ा भाग इन्हीं क्षेत्रों से संबंधित होता है।

  • वीटो शक्ति (Veto Power) का दुरुपयोग एवं संस्थागत गतिरोध: यूएन चार्टर के अनुच्छेद 27(3) के तहत प्रदत्त वीटो शक्ति का उपयोग वैश्विक शांति के संरक्षण के स्थान पर P-5 देशों द्वारा अपने संकीर्ण भू-रणनीतिक हितों की रक्षा हेतु किया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप मानवीय संकटों के समय परिषद 'सामूहिक सुरक्षा' (Collective Security) सुनिश्चित करने में विफल रही है।

  • वैधता एवं लोकतांत्रिक घाटा (Democratic Deficit): 21वीं सदी की बहुध्रुवीय व्यवस्था में 1945 के विजेताओं का आधिपत्य वैश्विक शासन की नैतिक वैधता को क्षीण करता है। निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव वैश्विक दक्षिण (Global South) में अलगाव की भावना को जन्म दे रहा है।

  • उभरती सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में अक्षमता: सुरक्षा की समकालीन परिभाषा अब केवल अंतर-राज्यीय पारंपरिक युद्ध तक सीमित नहीं है। साइबर युद्ध, जलवायु परिवर्तन प्रेरित विस्थापन, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद और समुद्री डकैती जैसी गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों का समाधान समावेशी प्रतिनिधित्व के बिना संभव नहीं है।


भारत की स्थायी सदस्यता के दावे के प्रमुख आधार

भारत का दावा ऐतिहासिक पात्रता, वर्तमान वैश्विक प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति उसके सकारात्मक योगदान पर आधारित है:

  • जनसांख्यिकीय एवं लोकतांत्रिक साख: भारत विश्व की लगभग 18% जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है तथा विश्व का सबसे बड़ा, सतत एवं जीवंत लोकतंत्र है। इतनी विशाल जनसंख्या को स्थायी निर्णय-निर्माण प्रक्रिया से बाहर रखना वैश्विक लोकतंत्र के सिद्धांतों के प्रतिकूल है।

  • आर्थिक सामर्थ्य एवं विकास का संवाहक: भारतीय अर्थव्यवस्था क्रय शक्ति समता (PPP) के आधार पर तीसरी सबसे बड़ी और सांकेतिक जीडीपी (Nominal GDP) के आधार पर विश्व की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। भारत वैश्विक आर्थिक संवृद्धि, हरित ऊर्जा संक्रमण और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) का प्रमुख चालक है।

  • संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों (UNPKF) में अद्वितीय योगदान: भारत ऐतिहासिक रूप से संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में सैनिकों का शीर्ष योगदानकर्ता रहा है। भारत ने 50 से अधिक मिशनों में 2,75,000 से अधिक शांति सैनिक भेजे हैं तथा वैश्विक शांति स्थापना में सर्वाधिक बलिदान दिए हैं।

  • संवैधानिक एवं अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रति निष्ठा: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51 (राज्य की नीति के निदेशक तत्व) अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि, राष्ट्रों के मध्य न्यायसंगत संबंधों तथा अंतरराष्ट्रीय संधियों के प्रति सम्मान को अनिवार्य बनाता है।

  • उत्तरदायी परमाणु शक्ति एवं अप्रसार रिकॉर्ड: अप्रसार संधि (NPT) का औपचारिक हस्ताक्षरकर्ता न होने के बावजूद, भारत का 'पहले प्रयोग न करने' (No First Use) का सिद्धांत और निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं (MTCR, वासेनार व्यवस्था, ऑस्ट्रेलिया समूह) की पूर्ण सदस्यता उसके उत्तरदायी आचरण को प्रमाणित करती है।

  • ग्लोबल साउथ का प्रामाणिक नेतृत्व: भारत ने 'वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट' और G-20 नई दिल्ली घोषणापत्र में अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता दिलाकर विकासशील देशों के हितों को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की क्षमता सिद्ध की है।

सुधार मार्ग की प्रमुख बाधाएँ

श्रेणीप्रमुख चुनौतियाँ
संस्थागतयूएन चार्टर का अनुच्छेद 108, जिसके अनुसार किसी भी संशोधन हेतु P-5 देशों की सहमति सहित दो-तिहाई बहुमत अनिवार्य है।
भू-राजनीतिककॉफी क्लब / यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस (UfC) (यथा इटली, पाकिस्तान, अर्जेंटीना) द्वारा नए स्थायी सदस्यों के प्रवेश का विरोध।
रणनीतिक अवरोधचीन द्वारा भारत की सदस्यता पर रणनीतिक असहयोग एवं दोहरे मानदंड अपनाना।
प्रक्रियात्मकअंतर-सरकारी वार्ता (IGN) का बिना किसी आधिकारिक वार्ता पाठ (Text-Based Negotiations) के चलना।

रणनीतिक दृष्टिकोण

सुरक्षा परिषद का वर्तमान ढांचा वैश्विक वास्तविकताओं से विलग हो चुका है, जिससे इसकी प्रभावशीलता संकट में है। यदि सुरक्षा परिषद समय रहते स्वयं को पुनर्गठित नहीं करती है, तो यह लीग ऑफ नेशंस की भांति अप्रासंगिक होने के जोखिम की ओर अग्रसर होगी।

भारत को G-4 (भारत, ब्राजील, जर्मनी, जापान) तथा L.69 समूह के माध्यम से लिखित वार्ता पाठ (Text-Based Negotiations) की दिशा में प्रक्रियात्मक दबाव बनाए रखना चाहिए। भारत का दृष्टिकोण संकीर्ण राष्ट्रीय शक्ति अर्जन तक सीमित न होकर, 'वसुधैव कुटुंबकम्' और सतत विकास लक्ष्य (SDG) 16 (शांति, न्याय और सुदृढ़ संस्थाएं) के आलोक में संपूर्ण विकासशील विश्व की सामूहिक सुरक्षा को सशक्त करना है। 'न्यू इंडिया 2047' के विजन के अनुरूप, एक न्यायसंगत और समतामूलक वैश्विक व्यवस्था की स्थापना भारत की स्थायी उपस्थिति के बिना अधूरी रहेगी।

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