समावेशी विकास (Inclusive Growth) से आप क्या समझते हैं? भारत में समावेशी विकास हासिल करने की प्रमुख चुनौतियां क्या हैं?
Q. समावेशी विकास (Inclusive Growth) से आप क्या समझते हैं? भारत में समावेशी विकास हासिल करने की प्रमुख चुनौतियां क्या हैं?
Ans -
समावेशी विकास (Inclusive Growth) आर्थिक संवृद्धि की वह व्यापक अवधारणा है जिसमें विकास की प्रक्रिया के दौरान समाज के सभी वर्गों—विशेषकर हाशिए पर स्थित और वंचित समूहों—की समान भागीदारी सुनिश्चित की जाती है, और विकास के लाभों का न्यायसंगत वितरण होता है। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में पहली बार औपचारिक रूप से भारत के लिए इसे एक मुख्य लक्ष्य के रूप में स्थापित किया गया था। यह अवधारणा केवल धन सृजन (Wealth Generation) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सतत विकास लक्ष्यों (SDGs), विशेष रूप से SDG 8 (उत्कृष्ट कार्य और आर्थिक वृद्धि) तथा SDG 10 (असमानताओं में कमी), की प्राप्ति का मूल आधार है।
समावेशी विकास के प्रमुख आयाम
अवसरों की समानता: शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार तक सभी की समान पहुंच।
गरीबी और असमानता में कमी: आय के वितरण में न्याय (Distributive Justice)।
क्षमता निर्माण (Capacity Building): कौशल विकास के माध्यम से जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का इष्टतम उपयोग।
क्षेत्रीय संतुलन: देश के सभी भौगोलिक क्षेत्रों का समान और संतुलित विकास।
भारत में समावेशी विकास हासिल करने की प्रमुख चुनौतियां
आर्थिक चुनौतियां
आय और संपत्ति की बढ़ती असमानता: ऑक्सफैम (Oxfam) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की शीर्ष 1% आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का 40% से अधिक हिस्सा है। यह विकास के लाभों के संकेंद्रण को दर्शाता है।
रोजगारविहीन संवृद्धि (Jobless Growth): यद्यपि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र के धीमे विकास और स्वचालन (Automation) के कारण पर्याप्त रोजगार सृजन नहीं हो पा रहा है।
कृषि क्षेत्र का संकट: भारत की आधी से अधिक आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है, लेकिन जीडीपी में इसका योगदान लगभग 18% ही है। छद्म बेरोजगारी और कम उत्पादकता बड़ी बाधाएं हैं।
विशाल अनौपचारिक क्षेत्र (Informal Sector): कार्यबल का लगभग 80-90% हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है, जहां सामाजिक सुरक्षा, पेंशन या न्यूनतम वेतन की कोई गारंटी नहीं है।
सामाजिक चुनौतियां
बहुआयामी गरीबी (Multidimensional Poverty): नीति आयोग के राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार, यद्यपि करोड़ों लोग गरीबी रेखा से बाहर आए हैं, फिर भी स्वास्थ्य, पोषण और स्कूली शिक्षा के स्तर पर वंचनाएं मौजूद हैं।
लैंगिक असमानता: श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी (FLFP) वैश्विक मानकों की तुलना में काफी कम है, जो आर्थिक विकास में आधी आबादी के योगदान को सीमित करती है।
तकनीकी और अवसंरचनात्मक चुनौतियां
डिजिटल अंतराल (Digital Divide): शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच इंटरनेट की पहुंच और डिजिटल साक्षरता में भारी अंतर है, जिससे ग्रामीण आबादी आधुनिक ई-सेवाओं और फिनटेक (FinTech) के लाभों से वंचित रह जाती है।
वित्तीय समावेशन की अपूर्णता: जन धन योजना (PMJDY) के माध्यम से बैंक खाते तो खुले हैं, लेकिन हाशिए के वर्गों तक संस्थागत ऋण (Institutional Credit) की पहुंच अब भी एक चुनौती है।
प्रशासनिक और नीतिगत चुनौतियां
योजनाओं का क्रियान्वयन और रिसाव (Leakages): द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और शासन प्रणाली में पारदर्शिता की कमी के कारण कल्याणकारी योजनाओं का लक्षित लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाता।
आगे की राह
समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए बहुआयामी सुधारों की आवश्यकता है:
मानव पूंजी में निवेश: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप कौशल विकास और वोकेशनल प्रशिक्षण को बढ़ावा देना, तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को जीडीपी के 2.5% तक ले जाना।
कृषि और MSME का आधुनिकीकरण: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को ऋण सुविधा उपलब्ध कराना और कृषि में कृषि-प्रौद्योगिकी (Agri-Tech) व खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को बढ़ावा देना।
लक्षित कल्याणकारी योजनाएं: JAM ट्रिनिटी (जन धन, आधार, मोबाइल) के माध्यम से प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) को और अधिक सुदृढ़ करना ताकि लीकेज को शून्य किया जा सके।
क्षेत्रीय विकास: नीति आयोग के आकांक्षी जिला कार्यक्रम (Aspirational Districts Programme) की तर्ज पर पिछड़े क्षेत्रों के बुनियादी ढांचे और शासन में सुधार करना।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 38 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) राज्य को आय, सुविधाओं और अवसरों की असमानता को कम करने का निर्देश देता है। समावेशी विकास की यह यात्रा केवल एक आर्थिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' के मंत्र को यथार्थ में बदलने का साधन है। इसी मजबूत सामाजिक-आर्थिक नींव पर भारत वर्ष 2047 तक एक 'विकसित भारत' (Viksit Bharat) और न्यायपूर्ण समाज के अपने संकल्प को साकार कर सकता है।