भारतीय अर्थव्यवस्था में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के महत्व और उनकी समस्याओं का विश्लेषण करें।
Q. भारतीय अर्थव्यवस्था में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के महत्व और उनकी समस्याओं का विश्लेषण करें।
Ans -
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) भारतीय अर्थव्यवस्था की 'रीढ़' (Backbone) माने जाते हैं। आर्थिक समीक्षा 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में MSME क्षेत्र का योगदान लगभग 30%, विनिर्माण उत्पादन में 45% और कुल निर्यात में 40% से अधिक है। कृषि क्षेत्र के बाद रोजगार सृजन का यह दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है। आर्थिक संवृद्धि के साथ-साथ यह क्षेत्र सतत विकास लक्ष्यों (SDGs)—विशेषकर SDG 8 (उत्कृष्ट कार्य और आर्थिक वृद्धि) और SDG 10 (असमानताओं में कमी)—की प्राप्ति का एक प्रमुख वाहक है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में MSMEs का महत्व
आर्थिक संवृद्धि और रोजगार सृजन
कृषि के बाद MSMEs रोजगार के सबसे बड़े प्रदाता हैं, जो देश भर में लगभग 11 करोड़ से अधिक लोगों को आजीविका प्रदान करते हैं। कम पूंजी गहनता (Low Capital Intensity) के कारण यह क्षेत्र जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का इष्टतम उपयोग करने और बेरोजगारी दर को नियंत्रित करने में अत्यंत प्रभावी है।
निर्यात संवर्धन और विदेशी मुद्रा अर्जन
भारत के कुल निर्यात में इस क्षेत्र की 40% से अधिक की हिस्सेदारी है। वस्त्र, हस्तशिल्प, रत्न एवं आभूषण और चमड़ा उद्योग जैसे श्रम-गहन क्षेत्रों में MSMEs के माध्यम से निर्यात को बढ़ावा मिलता है, जो चालू खाता घाटे (CAD) को प्रबंधनीय सीमा में रखने में सहायक है।
समावेशी और संतुलित क्षेत्रीय विकास
MSMEs, विशेष रूप से खादी और ग्रामोद्योग, का ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में व्यापक विस्तार है। यह स्थानीय संसाधनों के उपयोग को बढ़ावा देता है, ग्रामीण औद्योगिकीकरण को गति प्रदान करता है, और महानगरों की ओर होने वाले अनियंत्रित शहरी प्रवासन (Distress Migration) पर रोक लगाता है।
सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण
इस क्षेत्र में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यमों की बड़ी संख्या है। स्टैंड-अप इंडिया जैसी योजनाओं के साथ मिलकर यह क्षेत्र हाशिए के वर्गों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था में जोड़ता है, जो संविधान के अनुच्छेद 38 (आय और सुविधाओं की असमानता को कम करना) के नीतिगत लक्ष्यों के अनुरूप है।
बड़े उद्योगों के लिए सहायक (Ancillary Support)
MSME क्षेत्र बड़ी विनिर्माण इकाइयों को कच्चे माल, कलपुर्जे और मध्यवर्ती वस्तुएं (Intermediate goods) प्रदान कर देश की आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को मजबूत करता है।
MSME क्षेत्र के समक्ष प्रमुख चुनौतियां
वित्तीय बाधाएं और ऋण अंतराल (Credit Gap)
यू.के. सिन्हा समिति की रिपोर्ट के अनुसार, MSME क्षेत्र में संस्थागत ऋण का भारी अभाव है। बैंकों की कठोर ऋण नीतियों, जटिल कागजी कार्यवाही और संपार्श्विक (Collateral) की अनिवार्य मांग के कारण अधिकांश सूक्ष्म उद्यम आज भी अनौपचारिक और महंगे ऋण स्रोतों पर निर्भर हैं।
विलंबित भुगतान (Delayed Payments)
बड़े कॉर्पोरेट्स और सरकारी विभागों द्वारा भुगतान में अत्यधिक देरी की जाती है। इससे इन छोटे उद्यमों की कार्यशील पूंजी (Working Capital) बाधित होती है, जिससे उनके 'गैर-निष्पादित संपत्तियों' (NPA) में बदलने का गंभीर खतरा रहता है।
तकनीकी और नवाचार का अभाव (Technological Obsolescence)
अधिकांश उद्यम पुरानी तकनीक पर कार्य कर रहे हैं। अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश की कमी तथा तकनीकी साक्षरता के अभाव के कारण वैश्विक मूल्य श्रृंखला (Global Value Chain) में उनकी उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो जाती है।
नियामकीय अनुपालन और प्रशासनिक बाधाएं
कई श्रम कानूनों, पर्यावरण संबंधी मंजूरियों, और कराधान (Taxation) की जटिलताओं के कारण अनुपालन लागत (Compliance Cost) अधिक होती है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने भी लालफीताशाही और 'इंस्पेक्टर राज' को ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में एक बड़ी बाधा माना है।
अवसंरचनात्मक और रसद (Logistics) चुनौतियां
महंगी बिजली, कच्चे माल की अस्थिर कीमतें और उच्च रसद लागत (जो भारत में जीडीपी का लगभग 13-14% है), MSMEs के लाभ मार्जिन को काफी हद तक कम कर देती हैं।
आगे की राह और रणनीतिक सुधार
डिजिटल और वित्तीय समावेशन: ऋण प्रवाह को सुगम बनाने के लिए TReDS (Trade Receivables Discounting System) प्लेटफॉर्म का विस्तार करना और 'अकाउंट एग्रीगेटर' फ्रेमवर्क का अधिक उपयोग करना।
तकनीकी उन्नयन: सूक्ष्म उद्यमों को वैश्विक मानकों के अनुकूल बनाने के लिए ZED (Zero Defect Zero Effect) प्रमाणन योजना और प्रौद्योगिकी उन्नयन कोष (TUFS) का सुदृढ़ीकरण।
औपचारिकरण (Formalization): उद्यम (Udyam) पोर्टल के माध्यम से असंगठित उद्यमों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाना ताकि वे सरकारी योजनाओं (जैसे- PLI योजना) का सीधा लाभ उठा सकें।
भारतीय अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर का आकार देने और 'आत्मनिर्भर भारत' के विजन को यथार्थ में बदलने के लिए MSMEs का सशक्तिकरण अपरिहार्य है। ऋण सुलभता, तकनीकी नवोन्मेष और विनियामक सरलीकरण पर केंद्रित एक सुदृढ़ नीतिगत ढांचा ही इस क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बना सकता है। यही 'विकसित भारत 2047' के एक न्यायपूर्ण, आत्मनिर्भर और औद्योगिक रूप से उन्नत राष्ट्र (SDG 9: उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढांचा) के निर्माण की मजबूत आधारशिला सिद्ध होगा।