'डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर' (DPI जैसे UPI, आधार) ने भारत की वित्तीय समावेशन यात्रा को कैसे बदल दिया है?

 Q.  'डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर' (DPI जैसे UPI, आधार) ने भारत की वित्तीय समावेशन यात्रा को कैसे बदल दिया है?

Ans - 

विश्व बैंक (World Bank) के G20 ग्लोबल पार्टनरशिप फॉर फाइनेंशियल इंक्लूजन (GPFI) दस्तावेज के अनुसार, भारत ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के माध्यम से मात्र 6 वर्षों में वह वित्तीय समावेशन हासिल कर लिया है, जिसे प्राप्त करने में पारंपरिक तरीकों से 47 वर्ष लग जाते। DPI मूलतः प्रौद्योगिकी के खुले और इंटरऑपरेबल (Interoperable) डिजिटल ब्लॉक हैं, जो पहचान, भुगतान और डेटा विनिमय की सुविधा प्रदान करते हैं। इंडिया स्टैक (India Stack) के रूप में यह प्रणाली न केवल सतत विकास लक्ष्यों (SDGs), विशेष रूप से SDG 8 (आर्थिक वृद्धि) और SDG 10 (असमानता में कमी), को प्राप्त करने का एक सशक्त माध्यम बनी है, बल्कि इसने भारतीय अर्थव्यवस्था के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को भी मुख्यधारा के वित्तीय तंत्र से जोड़ दिया है।

वित्तीय समावेशन यात्रा में DPI का परिवर्तनकारी प्रभाव

DPI के तीन प्रमुख स्तंभों—पहचान (आधार), भुगतान (UPI), और डेटा विनिमय (अकाउंट एग्रीगेटर)—ने बहुआयामी स्तर पर वित्तीय समावेशन को पुनर्परिभाषित किया है:

1. आर्थिक और प्रशासनिक प्रभाव (Economic & Administrative Impact)

  • JAM ट्रिनिटी (जन-धन, आधार, मोबाइल) का अभिसरण: ई-केवाईसी (e-KYC) ने बैंकों के लिए ग्राहक अधिग्रहण लागत (Customer Acquisition Cost) को भारी मात्रा में घटा दिया है। इसके परिणामस्वरूप प्रधानमंत्री जन-धन योजना (PMJDY) के तहत 50 करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले जा सके हैं।

  • प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) में क्रांति: आधार-संबद्ध बैंक खातों के कारण कल्याणकारी योजनाओं में फर्जी लाभार्थियों की पहचान कर उन्हें बाहर किया गया है। आर्थिक समीक्षा के अनुसार, DBT के माध्यम से सरकार ने प्रणालीगत रिसाव (Leakages) को रोककर 2.7 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत की है।

  • सूक्ष्म ऋण (Micro-Credit) का लोकतंत्रीकरण: 'अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क' के माध्यम से एमएसएमई (MSMEs) और आम नागरिकों का डिजिटल फुटप्रिंट तैयार हो रहा है, जिससे बिना संपार्श्विक (Collateral-free) संस्थागत ऋण प्राप्त करना सुलभ हो गया है।

2. सामाजिक और लैंगिक सशक्तिकरण (Social & Gender Impact)

  • महिला वित्तीय स्वायत्तता: जन-धन खातों में 55% से अधिक खाताधारक महिलाएं हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान PM-GKY के तहत सीधे महिलाओं के खातों में नकद हस्तांतरण ने उनकी आर्थिक सुरक्षा और निर्णय लेने की क्षमता (Decision-making power) को सुदृढ़ किया है।

  • अनौपचारिक क्षेत्र का एकीकरण: रेहड़ी-पटरी वालों के लिए पीएम स्वनिधि (PM SVANidhi) योजना के तहत UPI आधारित लेन-देन ने सूक्ष्म उद्यमियों को मुख्यधारा की बैंकिंग से जोड़ा है।

3. तकनीकी और भौगोलिक विस्तार (Technological & Geographical Impact)

  • अंतिम छोर तक बैंकिंग (Last-Mile Delivery): आधार सक्षम भुगतान प्रणाली (AePS) और बैंक मित्रों (Business Correspondents) ने बैंक शाखाओं की भौतिक अनुपस्थिति के बावजूद सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में नकद निकासी और जमा की सुविधा उपलब्ध कराई है।

  • नवोन्मेषी भुगतान प्रणालियां: UPI की जीरो मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) नीति और त्वरित निपटान (Instant Settlement) प्रणाली ने डिजिटल लेन-देन को सर्वव्यापी बना दिया है।

वित्तीय समावेशन में मौजूदा चुनौतियां

इस तीव्र डिजिटल संक्रमण के बावजूद, कुछ संरचनात्मक और तकनीकी सीमाएं अभी भी विद्यमान हैं:

अवसंरचनात्मक और तकनीकी बाधाएं

  • डिजिटल और नेटवर्क अंतराल (Digital Divide): ग्रामीण भारत में स्मार्टफोन की कम पहुंच और इंटरनेट कनेक्टिविटी की अस्थिरता (विशेषकर भारतनेट (BharatNet) के क्रियान्वयन में देरी) निरंतर डिजिटल समावेशन में एक बड़ी बाधा है।

  • लेन-देन की विफलता (Transaction Failures): सर्वर डाउनटाइम या प्रमाणीकरण (Authentication) विफलताओं के कारण ग्रामीण ग्राहकों का डिजिटल प्रणालियों पर विश्वास कमजोर होता है।

सामाजिक और विधिक चुनौतियां

  • वित्तीय और डिजिटल निरक्षरता: नई तकनीक के साथ साक्षरता का अभाव साइबर धोखाधड़ी (Cyber Frauds) और फिशिंग हमलों के खतरे को बढ़ाता है, जो नव-शामिल (Newly banked) ग्राहकों के लिए अत्यंत जोखिम भरा है।

  • डेटा गोपनीयता और सुरक्षा: व्यापक डेटा संग्रहण के युग में निजता का अधिकार (पुट्टास्वामी निर्णय, 2017) सुरक्षित रखना आवश्यक है। हालांकि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 पारित हो गया है, लेकिन इसका सुदृढ़ संस्थागत क्रियान्वयन अभी शेष है।

आगे की राह एवं दूरगामी दृष्टि

भारत की वित्तीय समावेशन यात्रा को पूर्णता तक ले जाने के लिए निम्नलिखित बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है:

  • भाषाई और वॉयस-आधारित तकनीक: भाषिणी (Bhashini) और UPI 123Pay जैसे नवाचारों का विस्तार करना ताकि गैर-स्मार्टफोन उपयोगकर्ता और क्षेत्रीय भाषा बोलने वाले लोग भी निर्बाध लेन-देन कर सकें।

  • ऑफ़लाइन डिजिटल भुगतान: e-RUPI और सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC/e-Rupee) के उपयोग को बढ़ावा देना ताकि बिना इंटरनेट कनेक्टिविटी वाले क्षेत्रों में भी वित्तीय पहुंच सुनिश्चित हो।

  • साइबर सुरक्षा ग्रिड: रिज़र्व बैंक (RBI) और राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) के नेतृत्व में टियर-2 और टियर-3 शहरों में वित्तीय साक्षरता अभियान और मजबूत शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना।

  • नियामकीय सैंडबॉक्स (Regulatory Sandbox): फिनटेक (FinTech) नवाचारों को बढ़ावा देने के लिए नीतिगत लचीलापन अपनाना ताकि 'सैंडबॉक्स' के माध्यम से सुरक्षित परीक्षण किए जा सकें।

भारत का 'डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर' न केवल एक राष्ट्रीय संपत्ति है, बल्कि 'वसुधैव कुटुम्बकम' (विश्व एक परिवार है) के दर्शन को चरितार्थ करते हुए 'ग्लोबल साउथ' (Global South) के देशों के लिए एक मार्गदर्शक मॉडल (India Stack Global) बन चुका है। समावेशी तकनीक, वित्तीय साक्षरता और डेटा सुरक्षा के एक संतुलित ढांचे के माध्यम से ही भारत वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के अपने सामाजिक-आर्थिक संकल्प को पूर्णतः साकार कर सकता है।

🛍️ ऑनलाइन शॉपिंग करें
Amazon, Flipkart, Myntra और AJIO पर खरीदारी करें
यहाँ से खरीदारी करने पे एक्स्ट्रा डिस्काउंट मिल सकता है।
Next Post Previous Post
हमसे जुड़ें
1