गिग इकॉनमी (Gig Economy) क्या है? इसके श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की चुनौतियों की विवेचना करें।

 Q. गिग इकॉनमी (Gig Economy) क्या है? इसके श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की चुनौतियों की विवेचना करें।

Ans - 

नीति आयोग की ऐतिहासिक रिपोर्ट "इंडियाज बूमिंग गिग एंड प्लेटफॉर्म इकॉनमी" (India’s Booming Gig and Platform Economy) के अनुसार, भारत में वर्ष 2029-30 तक गिग श्रमिकों की संख्या 2.35 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। गिग इकॉनमी एक ऐसी मुक्त बाजार प्रणाली है, जिसमें पारंपरिक 9-से-5 के स्थायी रोजगार (Permanent Employment) के बजाय अस्थायी पदों (Temporary positions) और अल्पकालिक अनुबंधों (Short-term contracts) पर स्वतंत्र श्रमिकों (Freelancers) या प्लेटफॉर्म-आधारित कामगारों को नियुक्त किया जाता है। यह नई अर्थव्यवस्था लचीलेपन और उद्यमशीलता को बढ़ावा देती है, परंतु सतत विकास लक्ष्य (SDG) 8 (उत्कृष्ट कार्य और आर्थिक वृद्धि) की प्राप्ति के संदर्भ में यह श्रमिकों की सामाजिक-आर्थिक भेद्यता (Vulnerability) को भी उजागर करती है।

गिग इकॉनमी की संरचना और प्रकृति

गिग इकॉनमी को मुख्य रूप से दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  • प्लेटफॉर्म आधारित कार्य (Platform-based work): जहां डिजिटल प्लेटफॉर्म (जैसे- स्विगी, उबर, अर्बन कंपनी) ग्राहकों और सेवा प्रदाताओं (श्रमिकों) के बीच मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हैं।

  • गैर-प्लेटफॉर्म कार्य (Non-platform work): पारंपरिक स्वतंत्र कार्य (Freelancing) जहां श्रमिक सीधे ग्राहकों को सेवाएं प्रदान करते हैं (जैसे- सलाहकार, स्वतंत्र लेखक)।

गिग श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की प्रमुख चुनौतियां

यद्यपि सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (Code on Social Security, 2020) में पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को वैधानिक मान्यता दी गई है, फिर भी उन्हें सामाजिक सुरक्षा तंत्र (पेंशन, बीमा, मातृत्व लाभ) के दायरे में लाने में कई बहुआयामी चुनौतियां विद्यमान हैं:

विधिक और नियामकीय चुनौतियां (Legal and Regulatory Challenges)

  • 'कर्मचारी' बनाम 'स्वतंत्र ठेकेदार' का विवाद: गिग श्रमिकों को पारंपरिक 'कर्मचारियों' (Employees) के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जाता है, बल्कि उन्हें 'भागीदार' (Partners) या 'स्वतंत्र ठेकेदार' माना जाता है। इस कारण वे औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 या न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के वैधानिक संरक्षण से बाहर रह जाते हैं।

  • संहिता के प्रावधानों में अस्पष्टता: सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में गिग श्रमिकों के लिए योजनाएं बनाने का प्रावधान है, परंतु इन योजनाओं के क्रियान्वयन, वित्तपोषण के सटीक मॉडल और समय-सीमा को लेकर नियामकीय शून्यता (Regulatory Vacuum) बनी हुई है।

आर्थिक और वित्तीय चुनौतियां (Economic Challenges)

  • वित्तपोषण का बोझ (Funding Mechanism): सामाजिक सुरक्षा कोष के लिए धन जुटाना एक जटिल प्रश्न है। प्लेटफॉर्म कंपनियां तर्क देती हैं कि अतिरिक्त उपकर (Cess) या अनिवार्य योगदान से उनके लाभ मार्जिन (Profit Margin) और परिचालन लागत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जिससे वे ग्राहकों पर वित्तीय बोझ स्थानांतरित कर सकती हैं।

  • अनिश्चित आय संरचना: गिग श्रमिकों की आय स्थिर नहीं होती और यह मांग (Demand-driven) पर निर्भर करती है। ऐसे में श्रमिकों द्वारा भविष्य निधि (EPF) या बीमा के लिए नियमित अंशदान (Regular Contribution) करना व्यावहारिक रूप से कठिन है।

प्रशासनिक और तकनीकी चुनौतियां (Administrative & Technological Challenges)

  • डेटाबेस और पंजीकरण का अभाव: गिग श्रमिक अक्सर कई प्लेटफॉर्म्स पर एक साथ कार्य करते हैं। यद्यपि सरकार ने ई-श्रम (e-Shram) पोर्टल लॉन्च किया है, लेकिन 100% पंजीकरण सुनिश्चित करना और श्रमिकों की निरंतर गतिशीलता (Mobility) को ट्रैक करना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है।

  • एल्गोरिथम नियंत्रण (Algorithmic Control): कार्य का आवंटन, मूल्यांकन और भुगतान पूरी तरह से अपारदर्शी एल्गोरिथम द्वारा संचालित होता है। यदि कोई श्रमिक सामाजिक सुरक्षा की मांग करता है, तो एल्गोरिथम द्वारा उसे 'डि-लॉग' (De-log) करने या कार्य न देने का जोखिम बना रहता है।

सामाजिक चुनौतियां (Social Challenges)

  • सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining) का अभाव: गिग श्रमिक भौगोलिक रूप से बिखरे हुए हैं और उनके पास कोई मजबूत ट्रेड यूनियन नहीं है। इसके परिणामस्वरूप, वे प्लेटफॉर्म एग्रीगेटर्स के साथ समान स्तर पर संवाद या अपनी मांगों के लिए सामूहिक दबाव बनाने में असमर्थ रहते हैं।

आगे की राह (Way Forward)

गिग अर्थव्यवस्था के इष्टतम दोहन और श्रमिकों के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए एक बहु-हितधारक दृष्टिकोण (Multi-stakeholder approach) की आवश्यकता है:

  • नीति आयोग का RAISE फ्रेमवर्क: अधिकारों (Rights), पहुंच (Accessibility), समावेशन (Inclusion), समर्थन (Support) और सशक्तीकरण (Empowerment) के आधार पर गिग श्रमिकों के लिए एक व्यापक नीतिगत ढांचा तैयार किया जाना चाहिए।

  • अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाएं (Global Best Practices): ब्रिटेन के 'उबर बनाम असलम' (Uber v Aslam, 2021) फैसले की तर्ज पर भारत में भी गिग कामगारों के लिए 'कर्मचारी' और 'स्वतंत्र ठेकेदार' के बीच एक नई श्रेणी 'वर्कर' (Worker) सृजित की जा सकती है, जिन्हें न्यूनतम वेतन और वैतनिक अवकाश जैसे कुछ बुनियादी अधिकार प्राप्त हों। हाल ही में राजस्थान सरकार द्वारा पारित 'राजस्थान प्लेटफॉर्म आधारित गिग श्रमिक (पंजीकरण और कल्याण) अधिनियम, 2023' एक प्रगतिशील कदम है, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर एक मॉडल के रूप में अपनाया जा सकता है।

  • सार्वभौमिक कोष का निर्माण (Universal Fund): एक त्रिपक्षीय कोष की स्थापना की जाए जिसमें प्लेटफॉर्म एग्रीगेटर, सरकार और (स्वैच्छिक रूप से) श्रमिक योगदान करें। इसे डिजिटल लेन-देन पर एक सूक्ष्म उपकर (Micro-transaction fee) लगाकर वित्तपोषित किया जा सकता है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 41 (काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता का अधिकार) और अनुच्छेद 42 (काम की न्यायसंगत और मानवीय दशाएं) राज्य को एक कल्याणकारी व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश देते हैं। जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का पूर्ण लाभ उठाने और वर्ष 2047 तक एक समावेशी 'विकसित भारत' (Viksit Bharat) के निर्माण के लिए, यह अपरिहार्य है कि गिग अर्थव्यवस्था को शोषणकारी व्यवस्था बनने से रोका जाए और 'सबका प्रयास, सबका विकास' के मंत्र के तहत हर श्रमिक को गरिमापूर्ण आजीविका सुनिश्चित की जाए।

🛍️ ऑनलाइन शॉपिंग करें
Amazon, Flipkart, Myntra और AJIO पर खरीदारी करें
यहाँ से खरीदारी करने पे एक्स्ट्रा डिस्काउंट मिल सकता है।
Next Post Previous Post
हमसे जुड़ें
1