भारत में 'रोजगारविहीन विकास' (Jobless Growth) की समस्या के कारणों और समाधानों पर चर्चा करें।
Q. भारत में 'रोजगारविहीन विकास' (Jobless Growth) की समस्या के कारणों और समाधानों पर चर्चा करें।
Ans -
'रोजगारविहीन विकास' (Jobless Growth) उस व्यापक समष्टि-आर्थिक (Macroeconomic) विरोधाभास को संदर्भित करता है जिसमें किसी देश का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) तो उच्च दर से बढ़ता है, परंतु उसके अनुपात में रोजगार के नए अवसरों का सृजन नहीं हो पाता है। तकनीकी शब्दों में, यह अर्थव्यवस्था में कम रोजगार लोच (Low Employment Elasticity) की स्थिति है। हाल ही में जारी अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) और मानव विकास संस्थान (IHD) की 'भारत रोजगार रिपोर्ट 2024' के अनुसार, यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन युवा बेरोजगारी और कार्यबल का असंतुलित ढांचा एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है।
रोजगारविहीन विकास के प्रमुख कारण
भारत में इस समस्या की जड़ें आर्थिक, सामाजिक और विधिक संरचनाओं में गहराई तक व्याप्त हैं:
1. संरचनात्मक संक्रमण में विसंगति (Economic & Structural Anomaly)
विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing Sector) का ठहराव: भारत का आर्थिक विकास मॉडल पारंपरिक 'कृषि से विनिर्माण' के बजाय 'कृषि से सीधे सेवा क्षेत्र (Service Sector)' में परिवर्तित हो गया। सेवा क्षेत्र (जैसे IT, BPO) उच्च मूल्य वर्धन तो करता है, लेकिन यह पूंजी और कौशल-गहन (Skill-intensive) है, श्रम-गहन (Labor-intensive) नहीं।
जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान लगभग 16-17% पर स्थिर है, जबकि रोजगार सृजन की सर्वाधिक क्षमता इसी क्षेत्र में होती है।
2. पूंजी-गहन औद्योगिकीकरण (Technological Shift)
स्वचालन (Automation) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का प्रभाव: वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए बड़े उद्योगों और बहुराष्ट्रीय निगमों (MNCs) ने 'लेबर-सब्स्टीट्यूटिंग' (श्रम को प्रतिस्थापित करने वाली) तकनीकों को अपनाया है, जिससे उत्पादन तो बढ़ा है लेकिन रोजगार के अवसर घटे हैं।
3. कौशल और शिक्षा का अंतराल (Social & Educational Deficit)
'इंडिया स्किल्स रिपोर्ट' के आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत के आधे से अधिक स्नातक औद्योगिक आवश्यकताओं के अनुरूप रोजगार-योग्य (Employable) नहीं हैं।
शैक्षणिक पाठ्यक्रम और उद्योग की मांग (Industry-Academia Gap) के बीच भारी असंतुलन है, जिसके कारण बाजार में नौकरियां होने के बावजूद योग्य उम्मीदवारों का अभाव रहता है।
4. विनियामक और श्रम कानून संबंधी बाधाएं (Legal & Political Factors)
ऐतिहासिक रूप से जटिल और कठोर श्रम कानूनों (जैसे- औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947) के कारण उद्योगों ने स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति के बजाय 'संविदा श्रम' (Contract Labor) या पूंजी-गहन मशीनों को प्राथमिकता दी।
अनुपालन लागत (Compliance Cost) अधिक होने से उद्योगों में विस्तार और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन बाधित हुआ है।
5. MSME और कृषि क्षेत्र का संकट
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) भारत में रोजगार का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत हैं। हालांकि, संस्थागत ऋण (Credit Gap) तक सीमित पहुंच, विलंबित भुगतान और तकनीकी पिछड़ेपन के कारण इनकी रोजगार सृजन क्षमता प्रभावित हुई है।
कृषि क्षेत्र में भारी 'प्रच्छन्न बेरोजगारी' (Disguised Unemployment) मौजूद है, जिसे अन्य क्षेत्रों में खपाने की गति अत्यंत धीमी है।
समाधान और आगे की राह (Way Forward)
भारत के पास उपलब्ध जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) को इष्टतम रूप से भुनाने के लिए नीतिगत दृष्टिकोण में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है:
1. श्रम-गहन विनिर्माण का संवर्धन
कपड़ा, चमड़ा, खाद्य प्रसंस्करण और खिलौना उद्योग जैसे श्रम-गहन क्षेत्रों को लक्षित प्रोत्साहन देना आवश्यक है।
उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना के वर्तमान स्वरूप को केवल पूंजी निवेश से न जोड़कर, सृजित किए गए 'रोजगार की संख्या' से भी जोड़ा जाना चाहिए (Employment-Linked Incentives)।
2. मानव पूंजी और कौशल विकास में निवेश
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education) को स्कूल स्तर से ही मुख्यधारा में लाना।
'भविष्य के कौशल' (Future Skills) जैसे- डेटा एनालिटिक्स, ग्रीन जॉब्स और रोबोटिक्स में कार्यबल को प्रशिक्षित करने के लिए प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY 4.0) का प्रभावी क्रियान्वयन।
3. MSME और उद्यमिता पारिस्थितिकी तंत्र का सुदृढ़ीकरण
मुद्रा योजना (PMMY), स्टैंड-अप इंडिया और पीएम स्वनिधि (PM SVANidhi) जैसी योजनाओं के माध्यम से ऋण सुलभता सुनिश्चित कर जमीनी स्तर पर स्वरोजगार (Self-employment) और 'जॉब क्रिएटर्स' को बढ़ावा देना।
असंगठित क्षेत्र के व्यवसायों का उद्यम पोर्टल (Udyam Portal) के माध्यम से त्वरित औपचारिकीकरण।
4. श्रम सुधारों का क्रियान्वयन
संसद द्वारा पारित चार नई श्रम संहिताओं (Labour Codes) को राज्य सरकारों के साथ समन्वय स्थापित कर शीघ्र लागू करना, ताकि उद्योगों को ईज ऑफ डूइंग बिजनेस मिले और श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा (Social Security) प्राप्त हो।
5. नई अर्थव्यवस्था का विनियमन
गिग अर्थव्यवस्था (Gig Economy) और प्लेटफॉर्म आधारित रोजगार तेजी से बढ़ रहे हैं। नीति आयोग के 'RAISE' ढांचे का पालन करते हुए इन कामगारों को औपचारिक सुरक्षा जाल प्रदान किया जाना चाहिए।
भारतीय अर्थव्यवस्था वर्तमान में एक निर्णायक मोड़ पर है। यदि आर्थिक संवृद्धि की गति को गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजन के साथ संरेखित नहीं किया गया, तो जनसांख्यिकीय लाभांश एक 'जनसांख्यिकीय आपदा' में परिवर्तित हो सकता है। संविधान के अनुच्छेद 39 (आजीविका के पर्याप्त साधन का अधिकार) तथा सतत विकास लक्ष्य 8 (SDG 8: उत्कृष्ट कार्य और आर्थिक वृद्धि) की प्राप्ति के लिए विकास का मॉडल 'पूंजी-केंद्रित' न होकर 'मानव-केंद्रित' होना चाहिए। इसी ठोस आधारशिला पर वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' (Viksit Bharat) और एक समावेशी, न्यायपूर्ण राष्ट्र के निर्माण का स्वप्न साकार किया जा सकता है।