सिविल सेवाओं में 'लेटरल एंट्री' (Lateral Entry) के लाभ और इससे जुड़ी चिंताओं पर चर्चा करें।

 Q. सिविल सेवाओं में 'लेटरल एंट्री' (Lateral Entry) के लाभ और इससे जुड़ी चिंताओं पर चर्चा करें। 

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सिविल सेवाओं में 'लेटरल एंट्री': लाभ एवं चिंताओं का विश्लेषणात्मक मूल्यांकन

बदलती वैश्विक गतिकी और तकनीकी प्रगति के दौर में प्रशासनिक जटिलताएं तेजी से बढ़ी हैं। इस संदर्भ में, 'लेटरल एंट्री' (Lateral Entry) या 'पार्श्व प्रवेश' का तात्पर्य सरकार में संयुक्त सचिव (Joint Secretary), निदेशक (Director) या उप-सचिव स्तर के पदों पर निजी क्षेत्र, शिक्षाविदों या सार्वजनिक उपक्रमों से विशेषज्ञों की सीधी संविदात्मक नियुक्ति से है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की दसवीं रिपोर्ट और नीति आयोग के "स्ट्रैटेजी फॉर न्यू इंडिया @ 75" (Strategy for New India @ 75) दस्तावेज़ में प्रशासन में विशेषज्ञता लाने हेतु इस व्यवस्था की पुरजोर वकालत की गई है।

हाल ही में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) द्वारा लेटरल एंट्री के विज्ञापनों और तत्पश्चात आरक्षण संबंधी विमर्श के कारण यह विषय राष्ट्रीय पटल पर अत्यंत प्रासंगिक हो गया है।

लेटरल एंट्री के बहुआयामी लाभ (Multidimensional Benefits)

प्रशासनिक दक्षता को 'न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन' (Minimum Government, Maximum Governance) के आदर्श तक ले जाने में लेटरल एंट्री निम्नलिखित (PESTLE) आयामों में लाभकारी है:

  • प्रशासनिक एवं तकनीकी दक्षता (Administrative & Technological):

    • डोमेन विशेषज्ञता (Domain Expertise): भारतीय नौकरशाही मुख्य रूप से 'सामान्यज्ञ' (Generalists) की है। साइबर सुरक्षा, जलवायु वित्त, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ब्लॉकचेन जैसे जटिल क्षेत्रों में नीति-निर्माण हेतु विशिष्ट 'विशेषज्ञों' (Specialists) की आवश्यकता होती है।

    • अधिकारियों की कमी की पूर्ति: बास्वान समिति (Baswan Committee) ने आईएएस (IAS) अधिकारियों की भारी कमी को रेखांकित किया था। लेटरल एंट्री मध्य और शीर्ष स्तर पर इस शून्यता को भरने का एक त्वरित विकल्प प्रदान करती है।

  • आर्थिक नवाचार (Economic Innovation):

    • निजी क्षेत्र से आने वाले विशेषज्ञ अपने साथ कॉर्पोरेट कार्य-संस्कृति, लक्ष्य-उन्मुख दृष्टिकोण (Target-oriented approach) और दक्षता लाते हैं, जो सार्वजनिक उपक्रमों के प्रबंधन और 'ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस' (Ease of Doing Business) को गति प्रदान करता है।

  • वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं का समावेश:

    • ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में सिविल सेवाओं में बाहरी विशेषज्ञों का प्रवेश एक सामान्य प्रक्रिया है। यह नवाचार को बढ़ावा देकर SDG 9 (उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढांचा) तथा SDG 16 (सुदृढ़ संस्थाएं) की प्राप्ति में सहायक है। ऐतिहासिक रूप से भी डॉ. मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया जैसे विशेषज्ञों ने लेटरल एंट्री के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था में युगांतकारी योगदान दिया है।

संबंधित चिंताएं और संस्थागत चुनौतियां

लाभों के बावजूद, भारतीय प्रशासनिक और सामाजिक-राजनीतिक परिवेश में लेटरल एंट्री कई गंभीर चुनौतियां प्रस्तुत करती है:

  • विधिक एवं सामाजिक न्याय (Legal & Social Justice):

    • आरक्षण की प्रयोज्यता: यह लेटरल एंट्री का सबसे ज्वलंत मुद्दा है। संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत प्रदत्त आरक्षण को 'सिंगल पोस्ट कैडर' (Single Post Cadre) का तर्क देकर लागू न करने से वंचित वर्गों (SC/ST/OBC) के प्रशासनिक प्रतिनिधित्व और समावेशी विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

  • हितों का टकराव (Conflict of Interest) एवं आर्थिक चिंताएं:

    • रिवॉल्विंग डोर सिंड्रोम (Revolving Door Syndrome): निजी क्षेत्र से आए अधिकारी अपनी पूर्ववर्ती कंपनियों या कॉर्पोरेट घरानों को नीति-निर्माण में अनुचित लाभ (Crony Capitalism) पहुंचा सकते हैं।

    • कार्यकाल समाप्त होने के बाद उनका पुनः उसी निजी क्षेत्र में जाना सरकारी नीतियों की गोपनीयता को खतरे में डाल सकता है।

  • प्रशासनिक और सांस्कृतिक जड़ता (Administrative Culture):

    • बाहरी विशेषज्ञों ("Outsiders") और स्थायी नौकरशाहों ("Insiders") के बीच समन्वय का अभाव देखा जाता है। निजी क्षेत्र का 'लाभ-प्रेरित' (Profit-driven) मॉडल सार्वजनिक क्षेत्र के 'कल्याण-प्रेरित' (Welfare-driven) मॉडल के साथ अक्सर वैचारिक टकराव पैदा करता है।

  • जवाबदेही और जमीनी अनुभव का अभाव:

    • लेटरल एंट्री के अधिकारियों में उस जमीनी हकीकत (Grassroots experience) का अभाव होता है जो एक IAS अधिकारी अपने शुरुआती करियर में उप-मंडलाधिकारी (SDM) या जिलाधिकारी (DM) के रूप में प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त, उनकी अल्पकालिक (3-5 वर्ष) संविदात्मक नियुक्ति दीर्घकालिक नीतिगत जवाबदेही तय करने में बाधक है।

सामान्यज्ञ बनाम विशेषज्ञ: एक तुलनात्मक अवलोकन

आधार (Criteria)सामान्यज्ञ नौकरशाह (Generalist/IAS)लेटरल विशेषज्ञ (Lateral Entrant)
दृष्टिकोण (Approach)व्यापक, बहुआयामी और नीतिगतविशिष्ट, गहन और तकनीकी
अनुभव का आधारजमीनी प्रशासन और कानून-व्यवस्थाकॉर्पोरेट, अकादमिक और विशिष्ट क्षेत्र
जवाबदेही का स्वरूपस्थायी, संवैधानिक और दीर्घकालिकसंविदात्मक और अल्पकालिक

आगे की राह (Way Forward)

लेटरल एंट्री को भारतीय प्रशासन में एक 'पूरक' (Complementary) व्यवस्था के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए, न कि स्थायी नौकरशाही के 'विकल्प' (Substitute) के रूप में। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:

  1. संस्थागत और पारदर्शी चयन: चयन प्रक्रिया पूर्णतः संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के अधीन और वस्तुनिष्ठ मापदंडों पर आधारित होनी चाहिए। साथ ही, सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने हेतु पदों को क्लस्टर (Cluster) बनाकर 'रोस्टर प्रणाली' (Roster System) लागू की जानी चाहिए।

  2. हितों के टकराव का निवारण: लेटरल एंट्री वाले अधिकारियों के लिए 'कूलिंग-ऑफ पीरियड' (Cooling-off period) अनिवार्य किया जाना चाहिए, ताकि सरकारी नीतियों का कॉर्पोरेट लाभ के लिए दुरुपयोग न हो सके।

  3. प्रशासनिक प्रशिक्षण: निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को LBSNAA जैसे संस्थानों में सार्वजनिक सेवा मूल्यों, संवैधानिक नैतिकता और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का सघन प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

  4. आंतरिक विशेषज्ञता का विकास: लेटरल एंट्री के साथ-साथ, सेवारत अधिकारियों को भी उनके करियर के मध्य में डोमेन विशेषज्ञता (Mid-career specialization) प्राप्त करने के अवसर दिए जाने चाहिए (जैसे- 'मिशन कर्मयोगी' पहल)।

भारतीय प्रशासन को 21वीं सदी की जटिलताओं से निपटने हेतु गतिशीलता और विशेषज्ञता की परम आवश्यकता है। यदि लेटरल एंट्री को संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और जवाबदेही के पारदर्शी ढांचे में ढाला जाए, तो यह 'न्यू इंडिया 2047' (विकसित भारत) के संकल्प और एक विश्वस्तरीय लोक सेवा के निर्माण में एक मील का पत्थर सिद्ध हो सकती है।

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