गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की सामाजिक विकास में भूमिका का मूल्यांकन करें।

 Q. गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की सामाजिक विकास में भूमिका का मूल्यांकन करें।

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गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की सामाजिक विकास में भूमिका: एक आलोचनात्मक मूल्यांकन

लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में राज्य (State) और बाज़ार (Market) के अतिरिक्त नागरिक समाज (Civil Society) को 'तृतीयक स्तंभ' (Third Pillar) के रूप में मान्यता प्राप्त है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) (संघ बनाने की स्वतंत्रता) और नीति-निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद 43 (कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन) के अंतर्गत गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को संवैधानिक आधार प्राप्त है। विश्व बैंक के अनुसार, समावेशी विकास और गरीबी उन्मूलन के लिए राज्य की नीतियों को जमीनी स्तर पर लागू करने में ये संस्थाएं उत्प्रेरक (Catalyst) का कार्य करती हैं।

सामाजिक विकास में NGOs की बहुआयामी भूमिका

सामाजिक न्याय और नीतिगत बदलावों में NGOs की भूमिका का विश्लेषणात्मक (PESTLE) परिप्रेक्ष्य निम्नलिखित है:

  • सामाजिक और शैक्षणिक सशक्तिकरण (Social): 'प्रथम' (Pratham) NGO की ASER (Annual Status of Education Report) शिक्षा नीतियों के निर्माण में एक प्रामाणिक आधार प्रदान करती है। इसी प्रकार, 'अक्षय पात्र' संस्था मध्याह्न भोजन (Mid-Day Meal) योजना के माध्यम से कुपोषण (SDG 2) से लड़ने में राज्य की सहायता कर रही है।

  • विधिक एवं मानवाधिकार संरक्षण (Legal): पीयूसीएल (PUCL) और बचपन बचाओ आंदोलन (कैलाश सत्यार्थी) जैसे संगठनों ने जनहित याचिकाओं (PIL) के माध्यम से बंधुआ मजदूरी, बाल श्रम और चुनावी सुधारों (जैसे- NOTA का अधिकार) में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।

  • नीतिगत वकालत (Policy Advocacy): सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 और वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 जैसे प्रगतिशील कानूनों को पारित कराने में 'मज़दूर किसान शक्ति संगठन' (MKSS) जैसे NGOs का दबाव समूह के रूप में अतुलनीय योगदान रहा है।

  • पर्यावरणीय चेतना (Environmental): तरुण भारत संघ (जल संरक्षण) और नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सतत विकास (Sustainable Development) और विस्थापितों के पुनर्वास के मुद्दों को राष्ट्रीय पटल पर रखा है।

स्वयं सहायता समूहों (SHGs) का सामाजिक-आर्थिक योगदान

SHGs मुख्य रूप से समान सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले लोगों (विशेषकर महिलाओं) का स्वैच्छिक संघ है, जो सूक्ष्म-वित्त (Microfinance) के माध्यम से सामाजिक पूंजी का निर्माण करता है:

  • आर्थिक स्वावलंबन (Economic): नाबार्ड (NABARD) का SHG-Bank Linkage Programme (1992) विश्व का सबसे बड़ा सूक्ष्म-वित्त कार्यक्रम है। दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के तहत 8 करोड़ से अधिक महिलाएं SHGs से जुड़कर वित्तीय समावेशन का हिस्सा बनी हैं।

  • महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment): केरल का 'कुटुम्बश्री' (Kudumbashree) और बिहार का 'जीविका' (Jeevika) मॉडल इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसने पितृसत्तात्मक ढांचे को चुनौती देते हुए महिलाओं की निर्णय-निर्माण क्षमता में वृद्धि की है।

  • राजनीतिक सहभागिता (Political): SHGs से जुड़ी महिलाओं में नेतृत्व क्षमता का विकास हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप पंचायती राज संस्थाओं (अनुच्छेद 243D) और ग्राम सभाओं में उनकी सक्रिय भागीदारी बढ़ी है।

मूल्यांकन और विद्यमान चुनौतियाँ (Evaluation of Limitations)

इन संस्थाओं की सफलताओं के बावजूद, प्रशासनिक और संरचनात्मक स्तर पर कई गंभीर चुनौतियाँ विद्यमान हैं:

संस्था (Institution)संरचनात्मक एवं प्रशासनिक चुनौतियाँ (Challenges)
NGOs (गैर-सरकारी संगठन)

1. वित्तीय अनियमितता: विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के उल्लंघन के मामले।


2. विकास में बाधक: आईबी (IB) की एक रिपोर्ट के अनुसार, कुछ विदेशी वित्तपोषित NGOs विकास परियोजनाओं का विरोध कर देश की GDP को 2-3% का नुकसान पहुँचाते हैं।


3. आंतरिक लोकतंत्र का अभाव: अधिकांश NGOs व्यक्ति-केंद्रित हैं और शहरी क्षेत्रों तक सीमित हैं।

SHGs (स्वयं सहायता समूह)

1. क्षेत्रीय असमानता: SHGs का प्रसार दक्षिणी राज्यों में अधिक सफल रहा है, जबकि उत्तर और पूर्वी भारत में यह अभी भी सीमित है।


2. संभ्रांत वर्ग का प्रभुत्व (Elite Capture): समूहों के भीतर संपन्न और प्रभावशाली सदस्यों द्वारा ऋण और संसाधनों पर एकाधिकार।


3. तकनीकी और विपणन (Marketing) कौशल का अभाव: उत्पादों के मूल्यवर्धन (Value Addition) में कमी।

सुधारात्मक उपाय (Remedial Measures)

द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की 9वीं रिपोर्ट (Social Capital) की अनुशंसाओं के आलोक में निम्नलिखित सुधार अपेक्षित हैं:

  • पारदर्शिता और नियमन: नीति आयोग के 'एनजीओ-दर्पण' (NGO-DARPAN) पोर्टल का अनिवार्य और कठोर क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि निधियों के उपयोग की ऑनलाइन निगरानी हो सके।

  • क्षमता निर्माण (Capacity Building): SHGs को केवल ऋण वितरण तक सीमित न रखकर उन्हें सूक्ष्म-उद्यमों (Micro-enterprises) में बदलने हेतु तकनीकी प्रशिक्षण, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म (जैसे- सरस आजीविका मेला) और बाजार लिंकेज (Market Linkage) प्रदान किया जाए।

  • राष्ट्रीय स्वैच्छिक क्षेत्र नीति (National Policy on Voluntary Sector, 2007): इस नीति को अद्यतन कर सरकार और नागरिक समाज के बीच 'निरीक्षक-अधीनस्थ' (Inspector-Subordinate) के बजाय 'सहयोगी' (Partnership) का संबंध स्थापित किया जाना चाहिए।

आगे की राह (Way Forward)

राज्य की सीमाएं होती हैं; वह हर नागरिक के दरवाजे तक अकेले नहीं पहुँच सकता। ऐसे में NGOs और SHGs लोकतंत्र की 'अंतिम मील की कनेक्टिविटी' (Last Mile Connectivity) सुनिश्चित करते हैं।

सतत विकास लक्ष्य (SDG 1 - गरीबी उन्मूलन, SDG 5 - लैंगिक समानता, और SDG 17 - लक्ष्यों के लिए भागीदारी) को प्राप्त करने हेतु सरकार और नागरिक समाज के मध्य एक रचनात्मक और पारदर्शी साझेदारी अनिवार्य है। जब प्रशासनिक मशीनरी (Bureaucracy) और सामाजिक पूंजी (Social Capital) एक साथ मिलकर कार्य करेंगे, तभी 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' का दर्शन फलीभूत होगा और भारत 'न्यू इंडिया 2047' (विकसित भारत) के अपने सर्वोच्च संकल्प को साकार कर सकेगा।

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