संविधान की नौवीं अनुसूची (Ninth Schedule) और न्यायिक समीक्षा के मुद्दे का विश्लेषण करें।
Q. संविधान की नौवीं अनुसूची (Ninth Schedule) और न्यायिक समीक्षा के मुद्दे का विश्लेषण करें।
Ans -
संविधान की नौवीं अनुसूची और न्यायिक समीक्षा: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
भारतीय संविधान की नौवीं अनुसूची (Ninth Schedule) और न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के मध्य का अंतर्संबंध संसदीय संप्रभुता (Parliamentary Sovereignty) और न्यायिक सर्वोच्चता (Judicial Supremacy) के बीच शक्ति-संतुलन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा अनुच्छेद 31B के माध्यम से संविधान में अंतःस्थापित किया गया था। इसका मूल उद्देश्य नव-स्वतंत्र भारत में कृषि सुधारों और ज़मींदारी उन्मूलन कानूनों को मौलिक अधिकारों (विशेषकर संपत्ति के अधिकार) के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप से बचाना था।
हालाँकि, समय के साथ इसके राजनीतिक दुरुपयोग और 'विधि के शासन' पर इसके प्रभावों ने गंभीर संवैधानिक विमर्श को जन्म दिया है।
नौवीं अनुसूची: उद्देश्य एवं विकास का बहुआयामी विश्लेषण
नौवीं अनुसूची का निर्माण एक विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य में किया गया था, लेकिन इसके अनुप्रयोग ने विभिन्न क्षेत्रों को प्रभावित किया है:
सामाजिक-आर्थिक आयाम (Socio-Economic):
प्रारंभिक लक्ष्य राज्य के नीति निदेशक तत्वों, विशेषकर अनुच्छेद 39(b) और (c) (संसाधनों का समान वितरण), को धरातल पर उतारना था।
इसने भूमिहीनों को भूमि का अधिकार दिलाकर सामाजिक न्याय की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राजनीतिक आयाम (Political):
कालांतर में, सरकारों ने इसे एक "संवैधानिक तिजोरी" (Constitutional Vault) के रूप में उपयोग करना आरंभ कर दिया।
विवादास्पद कानूनों (जैसे- तमिलनाडु का 69% आरक्षण अधिनियम, जो इंदिरा साहनी वाद की 50% सीमा का उल्लंघन करता है) को न्यायिक जांच से बचाने के लिए राजनीतिक तुष्टीकरण हेतु इसमें शामिल किया गया।
विधिक एवं संवैधानिक आयाम (Legal/Constitutional):
अनुच्छेद 31B यह प्रावधान करता है कि नौवीं अनुसूची में शामिल कोई भी अधिनियम इस आधार पर शून्य नहीं होगा कि वह भाग III (मौलिक अधिकार) का उल्लंघन करता है। इसने अनुच्छेद 13(2) की न्यायिक शक्ति को सीमित कर दिया।
न्यायिक समीक्षा बनाम विधायी उन्मुक्ति: क्रमिक ऐतिहासिक विकास
नौवीं अनुसूची पर न्यायपालिका का दृष्टिकोण समय-समय पर विकसित हुआ है, जिसे निम्नलिखित महत्वपूर्ण वादों (Judgments) के माध्यम से समझा जा सकता है:
| सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय | प्रमुख विधिक सिद्धांत एवं प्रभाव |
| शंकरी प्रसाद वाद (1951) | न्यायालय ने प्रथम संशोधन की वैधता को बरकरार रखा और नौवीं अनुसूची को पूर्ण न्यायिक उन्मुक्ति प्रदान की। |
| केशवानंद भारती वाद (24 अप्रैल 1973) | ऐतिहासिक निर्णय जिसने 'संविधान के आधारभूत ढांचे' (Basic Structure Doctrine) का प्रतिपादन किया। स्थापित किया गया कि न्यायिक समीक्षा संविधान का मूल लक्षण है। |
| वामन राव वाद (1981) | स्पष्ट किया गया कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल किए गए कानून न्यायिक समीक्षा के अधीन होंगे। |
| आई. आर. कोएल्हो (I.R. Coelho) वाद (2007) | 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया कि नौवीं अनुसूची कोई 'ब्लैंकेट इम्युनिटी' (Blanket Immunity) प्रदान नहीं करती है। यदि इसमें शामिल कोई कानून अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 (स्वर्णिम त्रिभुज) या 'मूल ढांचे' का उल्लंघन करता है, तो उसे निरस्त किया जा सकता है। |
आलोचनात्मक मूल्यांकन (Why and How)
कारण (Why): नौवीं अनुसूची की वर्तमान प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न इसलिए लग रहा है क्योंकि मूल संविधान निर्माताओं का उद्देश्य केवल कृषि एवं आर्थिक सुधारों को संरक्षण देना था। वर्तमान में, इसमें 284 अधिनियम शामिल हैं, जिनमें से कई का भूमि सुधार से कोई सीधा संबंध नहीं है।
चुनौतियाँ (Challenges):
मौलिक अधिकारों का हनन: नागरिकों के मूल अधिकारों पर विधायिका का असीमित अतिक्रमण सतत विकास लक्ष्य (SDG) 16 (शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) के लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रतिकूल है।
संविधानवाद (Constitutionalism) का क्षरण: संविधानवाद का मूल अर्थ 'सीमित सरकार' (Limited Government) है। नौवीं अनुसूची का दुरुपयोग सत्ता को निरंकुश बनाने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
समाधान (Solutions):
विधायिका को चाहिए कि वह नौवीं अनुसूची का प्रयोग अत्यंत संयम (Doctrine of Restraint) के साथ और केवल व्यापक लोक-कल्याण (Public Welfare) के मामलों में करे।
विधि आयोग (Law Commission) की अनुशंसाओं के आधार पर 1973 के बाद अनुसूची में डाले गए गैर-प्रासंगिक कानूनों की समयबद्ध समीक्षा होनी चाहिए।
आगे की राह (Way Forward)
'मिनर्वा मिल्स वाद' (1980) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों के बीच संतुलन ही संविधान का मूल ढांचा है। नौवीं अनुसूची का अस्तित्व तब तक ही वैध है, जब तक वह इस संतुलन को बाधित नहीं करती।
संवैधानिक लोकतंत्र में कोई भी कानून 'सर्वोच्चता के परीक्षण' (Test of Supremacy) से परे नहीं हो सकता। 'न्यू इंडिया 2047' के एक पारदर्शी, उत्तरदायी और अधिकार-संपन्न राष्ट्र के विजन को साकार करने के लिए यह अनिवार्य है कि विधायिका की नीति-निर्माण शक्ति और न्यायपालिका की समीक्षा शक्ति के मध्य एक सहयोगात्मक और मर्यादापूर्ण संबंध स्थापित हो। एक सुदृढ़ 'विधि का शासन' (Rule of Law) ही 'वसुधैव कुटुंबकम' के आदर्शों पर आधारित एक न्यायपूर्ण समाज की सच्ची नींव रख सकता है।