भारत में संसदीय संप्रभुता (Parliamentary Sovereignty) और न्यायिक सर्वोच्चता (Judicial Supremacy) के बीच संतुलन का विश्लेषण करें।

 Q. भारत में संसदीय संप्रभुता (Parliamentary Sovereignty) और न्यायिक सर्वोच्चता (Judicial Supremacy) के बीच संतुलन का विश्लेषण करें।

Ans - 

भारतीय संविधान न तो ब्रिटिश प्रणाली की भांति 'संसदीय संप्रभुता' (Parliamentary Sovereignty) को पूर्णतः अपनाता है और न ही अमेरिकी प्रणाली की तरह 'न्यायिक सर्वोच्चता' (Judicial Supremacy) को स्थापित करता है; बल्कि यह 'संवैधानिक सर्वोच्चता' (Constitutional Supremacy) के अंतर्गत दोनों के मध्य एक अद्वितीय और स्वर्णिम संतुलन निर्मित करता है। संविधान निर्माताओं ने शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) को इस प्रकार गढ़ा कि संविधानवाद (Constitutionalism) और लोकतांत्रिक जनादेश (Democratic Mandate) दोनों की रक्षा हो सके।

संतुलन स्थापित करने वाले संवैधानिक तंत्र

संसद और न्यायपालिका के मध्य शक्तियों का यह संतुलन विशिष्ट संवैधानिक प्रावधानों द्वारा प्रबंधित होता है:

1. विधायी अधिकार और उनकी सीमाएं (Political & Legal)

  • अनुच्छेद 368: संसद को संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने और जन-कल्याणकारी नीतियों (जैसे नीति निदेशक तत्व - DPSP) को लागू करने के लिए व्यापक शक्तियां प्रदान करता है।

  • संसदीय विशेषाधिकार: अनुच्छेद 105 और 122 के तहत संसद की आंतरिक कार्यवाही को न्यायिक हस्तक्षेप से उन्मुक्ति प्राप्त है, जो संसदीय स्वायत्तता सुनिश्चित करता है।

2. न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति (Governance & Institutional)

  • अनुच्छेद 13, 32 और 136: सर्वोच्च न्यायालय को विधायी और कार्यकारी कार्यों की संवैधानिकता जांचने का अधिकार देते हैं।

  • प्रक्रियात्मक विकास: भारतीय संविधान में मूल रूप से 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' (Procedure established by law - अनुच्छेद 21) को अपनाया गया था, लेकिन मेनका गांधी वाद (1978) के ऐतिहासिक निर्णय के बाद इसे अमेरिकी 'विधि की उचित प्रक्रिया' (Due process of law) का स्वरूप दे दिया गया, जिसने न्यायिक समीक्षा के दायरे को व्यापक बना दिया।

टकराव और संतुलन का विकास: ऐतिहासिक पड़ाव

संसद (जनादेश का प्रतिनिधित्व) और न्यायपालिका (संविधान की संरक्षक) के मध्य इस संतुलन का विकास विभिन्न न्यायिक निर्णयों के माध्यम से हुआ है:

संवैधानिक चरणप्रमुख वाद (Landmark Case)संतुलन की स्थिति और प्रभाव
आरंभिक दौरशंकरी प्रसाद वाद (1951)संसदीय शक्ति की सर्वोच्चता। न्यायालय ने माना कि संसद मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है।
टकराव का कालगोलकनाथ वाद (1967)न्यायिक सर्वोच्चता का प्रदर्शन। निर्णय दिया गया कि संसद भाग-III (मौलिक अधिकारों) में संशोधन नहीं कर सकती।
स्वर्णिम समन्वयकेशवानंद भारती वाद (1973)'मूल ढांचा' (Basic Structure) सिद्धांत का प्रतिपादन। संसद की संशोधन शक्ति को स्वीकार किया गया, परंतु असीमित अधिकार को खारिज कर दिया गया।
संतुलन की पुनर्स्थापनामिनर्वा मिल्स वाद (1980)42वें संशोधन के उस प्रावधान को निरस्त किया गया जिसने न्यायिक समीक्षा को बाधित किया था। 'सीमित संशोधन शक्ति' को मूल ढांचा घोषित किया गया।

समकालीन चुनौतियां और विश्लेषणात्मक मूल्यांकन

वर्तमान परिदृश्य में इस नाजुक संतुलन के समक्ष कई चुनौतियां उभर रही हैं:

  • न्यायिक अतिरेक (Judicial Overreach): कार्यपालिका और विधायिका की निष्क्रियता के कारण जनहित याचिकाओं (PIL) की बाढ़ आई है। नीतिगत मामलों में (जैसे हाईवे के किनारे शराब बंदी या पर्यावरण संबंधी कठोर आदेश) न्यायपालिका का हस्तक्षेप विधायी क्षेत्र के अतिक्रमण की चिंताएं बढ़ाता है।

  • संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न: राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC - 99वां संशोधन, 2015) को असंवैधानिक घोषित कर सर्वोच्च न्यायालय ने 'न्यायिक स्वतंत्रता' की रक्षा की, लेकिन इससे 'कॉलेजियम प्रणाली' की पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर गंभीर विमर्श उत्पन्न हुआ है।

  • विधायी प्रक्रियाओं का बाईपास (Technological & Political): संसद द्वारा बिना व्यापक बहस के धन विधेयक (Money Bill) के रूप में कानूनों (जैसे आधार अधिनियम) को पारित करना या अध्यादेशों (Ordinances) का अत्यधिक प्रयोग, विधायी जवाबदेही और न्यायिक जांच से बचने का प्रयास माना जाता है।

आगे की राह

संसदीय संप्रभुता और न्यायिक सर्वोच्चता के बीच का यह विमर्श कोई 'शून्य-योग खेल' (Zero-sum game) नहीं है। संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग (NCRWC) और द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की भावना के अनुरूप, दोनों अंगों को अपनी संवैधानिक सीमाओं के भीतर कार्य करते हुए एक-दूसरे की स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिए।

'नया भारत 2047' के विजन को साकार करने और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDG) 16 (शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) की प्राप्ति के लिए यह अनिवार्य है कि 'संस्थागत वर्चस्व' के बजाय 'संवैधानिक नैतिकता' (Constitutional Morality) को सर्वोपरि रखा जाए। एक परिपक्व लोकतंत्र में विधायिका और न्यायपालिका प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण के सहयोगात्मक स्तंभ हैं।

🛍️ ऑनलाइन शॉपिंग करें
Amazon, Flipkart, Myntra और AJIO पर खरीदारी करें
यहाँ से खरीदारी करने पे एक्स्ट्रा डिस्काउंट मिल सकता है।
Next Post Previous Post
हमसे जुड़ें
1