'संविधान का मूल ढांचा' (Basic Structure) सिद्धांत ने भारतीय लोकतंत्र को कैसे सुरक्षित किया है?

 Q.  'संविधान का मूल ढांचा' (Basic Structure) सिद्धांत ने भारतीय लोकतंत्र को कैसे सुरक्षित किया है?

Ans - 

भारतीय संविधान के अंतर्गत 'मूल ढांचा' (Basic Structure) का सिद्धांत केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) वाद में सर्वोच्च न्यायालय की 13-सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा प्रतिपादित एक युगांतकारी न्यायिक नवाचार है। यह सिद्धांत स्थापित करता है कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद की संविधान संशोधन की शक्ति असीमित नहीं है; संसद संविधान के उन मूलभूत तत्वों या 'मूल ढांचे' को नष्ट या परिवर्तित नहीं कर सकती, जिन पर संविधान की नींव टिकी है। वैश्विक स्तर पर यह संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) और विधि के शासन (Rule of Law) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसने पिछले पांच दशकों में भारतीय लोकतंत्र को कई संकटों से उबारा है।

मूल ढांचा सिद्धांत द्वारा भारतीय लोकतंत्र की सुरक्षा

इस सिद्धांत ने राजनीतिक, विधिक और सामाजिक स्तर पर लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक 'सुरक्षा वाल्व' (Safety Valve) के रूप में कार्य किया है:

1. बहुसंख्यकवाद और सत्तावादी प्रवृत्तियों पर अंकुश (Political & Legal)

  • निरंकुश संशोधनों को रद्द करना: जब भी संसद ने अपनी संशोधन शक्ति का दुरुपयोग कर असीमित अधिकार प्राप्त करने का प्रयास किया, न्यायपालिका ने इस सिद्धांत का उपयोग कर उसे निरस्त किया।

  • न्यायिक समीक्षा की बहाली: मिनर्वा मिल्स वाद (1980) में सर्वोच्च न्यायालय ने 42वें संशोधन के उस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित किया जिसने मौलिक अधिकारों पर नीति निदेशक तत्वों (DPSP) को पूर्ण प्राथमिकता दी थी और न्यायिक समीक्षा को सीमित किया था। न्यायालय ने न्यायिक समीक्षा को मूल ढांचे का हिस्सा माना।

  • स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव: इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण वाद (1975) में 39वें संविधान संशोधन (जिसने प्रधानमंत्री के चुनाव को न्यायिक जांच से बाहर कर दिया था) को रद्द कर दिया गया, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पवित्रता सुनिश्चित हुई।

2. शक्तियों का पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता (Governance & Institutional)

  • लोकतंत्र की सफलता के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन वाद (2015) में 99वें संविधान संशोधन (NJAC अधिनियम) को निरस्त कर दिया गया, क्योंकि यह न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका के अत्यधिक हस्तक्षेप को बढ़ाकर 'न्यायपालिका की स्वतंत्रता' (जो मूल ढांचे का अभिन्न अंग है) का उल्लंघन कर रहा था।

3. संघीय ढांचे की रक्षा (Federalism)

  • भारत का स्वरूप 'राज्यों का संघ' है। एस.आर. बोम्मई वाद (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने संघवाद (Federalism) और पंथनिरपेक्षता (Secularism) को संविधान का मूल ढांचा घोषित किया। इससे अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के मनमाने दुरुपयोग पर रोक लगी और राज्य सरकारों को केंद्र की राजनीतिक दुर्भावना से संरक्षण मिला।

4. नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण (Social & Human Rights)

  • इस सिद्धांत ने सुनिश्चित किया है कि राज्य मनमाने ढंग से भाग III के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों को समाप्त न कर सके। यह कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को मजबूत करता है और नागरिकों की स्वतंत्रता, समानता और गरिमा की रक्षा करता है, जो संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDG) 16: शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं के अनुरूप है।

सिद्धांत से जुड़ी विधिक और प्रशासनिक चुनौतियां

चुनौती का क्षेत्रविश्लेषणात्मक विवरण
संसदीय संप्रभुता का ह्रासआलोचकों का तर्क है कि यह सिद्धांत निर्वाचित संसद (लोकतांत्रिक इच्छा का प्रतिनिधित्व) के ऊपर गैर-निर्वाचित न्यायपालिका (Judicial Supremacy) को स्थापित करता है।
अस्पष्ट परिभाषासंविधान में 'मूल ढांचे' की कोई स्पष्ट सूची नहीं है। इसका निर्धारण न्यायपालिका द्वारा 'वाद-दर-वाद' (Case-by-case basis) किया जाता है, जिससे न्यायिक व्यक्तिपरकता (Judicial Subjectivity) और न्यायिक अतिरेक (Judicial Overreach) की आशंका उत्पन्न होती है।
विकास में बाधा का आरोपकई बार महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक सुधारों (जैसे भूमि सुधार या न्यायिक सुधार) को इस सिद्धांत के तहत चुनौती दिए जाने से विधायी प्रक्रिया बाधित होती है।

आगे की राह

'मूल ढांचा' सिद्धांत संसदीय सर्वोच्चता और न्यायिक समीक्षा के मध्य एक नाजुक संतुलन स्थापित करता है। हालांकि इसे न्यायिक अतिसक्रियता का साधन नहीं बनना चाहिए, लेकिन सत्ता के संभावित दुरुपयोग के खिलाफ यह सबसे सुदृढ़ संस्थागत ढाल है।

भारत के 'नया भारत 2047' (New India 2047) के विजन और एक लचीले, समावेशी लोकतंत्र के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि विधायिका और न्यायपालिका के बीच सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व हो। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की भावना के अनुरूप, संस्थागत शक्तियों का प्रयोग संवैधानिक सीमाओं के भीतर होना चाहिए। अंततः, मूल ढांचा सिद्धांत एक अवरोधक नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का वह 'ध्रुव तारा' है, जो संविधान निर्माताओं के मूल विजन को सुरक्षित रखते हुए राष्ट्र को प्रगति के पथ पर मार्गदर्शित करता है।

🛍️ ऑनलाइन शॉपिंग करें
Amazon, Flipkart, Myntra और AJIO पर खरीदारी करें
यहाँ से खरीदारी करने पे एक्स्ट्रा डिस्काउंट मिल सकता है।
Next Post Previous Post
हमसे जुड़ें
1