सेमीकंडक्टर (Semiconductor) निर्माण में आत्मनिर्भरता भारत की तकनीकी और रणनीतिक सुरक्षा के लिए क्यों आवश्यक है?
Q. सेमीकंडक्टर (Semiconductor) निर्माण में आत्मनिर्भरता भारत की तकनीकी और रणनीतिक सुरक्षा के लिए क्यों आवश्यक है?
Ans -
आधुनिक तकनीकी युग में सेमीकंडक्टर (अर्धचालक) को '21वीं सदी का नया तेल' (New Oil of the 21st Century) कहा जाता है। यह सामान्य घरेलू उपकरणों से लेकर उन्नत अंतरिक्ष मिशनों और रक्षा प्रणालियों का 'मस्तिष्क' है। वर्तमान में, भारत अपनी सेमीकंडक्टर आवश्यकता का लगभग 100% आयात करता है। हालिया वैश्विक चिप संकट और ताइवान जलडमरूमध्य में भू-राजनीतिक तनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखलाओं में किसी भी प्रकार का व्यवधान राष्ट्रीय सुरक्षा को पंगु बना सकता है। इसी रणनीतिक भेद्यता (Strategic Vulnerability) को दूर करने हेतु इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) की स्थापना की गई है।
भारत की तकनीकी संप्रभुता और रणनीतिक सुरक्षा के लिए सेमीकंडक्टर निर्माण में आत्मनिर्भरता की आवश्यकता को निम्नलिखित बहुआयामी (PESTLE) दृष्टिकोण से समझा जा सकता है:
सेमीकंडक्टर आत्मनिर्भरता की रणनीतिक और तकनीकी अनिवार्यता
1. तकनीकी संप्रभुता और साइबर सुरक्षा (Technological Security)
हार्डवेयर ट्रोजन (Hardware Trojans) का खतरा: आयातित चिप्स, विशेषकर चीन से आने वाले उपकरणों में, 'बैकडोर' या दुर्भावनापूर्ण कोड (Malware) अंतर्निहित होने की आशंका रहती है। संकट के समय इन चिप्स को रिमोटली अक्षम (Disable) किया जा सकता है या डेटा चोरी के लिए उपयोग किया जा सकता है।
उभरती प्रौद्योगिकियों का आधार: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), 5G/6G नेटवर्क, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी 'महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियां' (Critical and Emerging Technologies) पूर्णतः उन्नत सेमीकंडक्टर नोड्स (जैसे- 5nm या उससे कम) पर निर्भर हैं। इनमें पिछड़ने का अर्थ वैश्विक तकनीकी दौड़ से बाहर होना है।
2. रक्षा आधुनिकीकरण और भू-राजनीतिक सुरक्षा (Strategic Security)
सैन्य उपकरणों का डिजिटलीकरण: आधुनिक युद्ध प्रणाली C4ISR (Command, Control, Communications, Computers, Intelligence, Surveillance, and Reconnaissance), ड्रोन, और सटीक निर्देशित मिसाइलों (Precision-guided missiles) पर आधारित है। इन प्रणालियों में स्वदेशी सैन्य-ग्रेड (Military-grade) चिप्स का उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गैर-परक्राम्य (Non-negotiable) है।
आपूर्ति श्रृंखला का शस्त्रीकरण (Weaponization of Supply Chain): वैश्विक सेमीकंडक्टर निर्माण में ताइवान (विशेषकर TSMC) और दक्षिण कोरिया का एकाधिकार है। अमेरिका-चीन 'चिप युद्ध' (Chip War) और चीन की 'वन चाइना पॉलिसी' के आक्रामक रुख को देखते हुए, भारत बाहरी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर अपनी रक्षा तैयारियों को निर्भर नहीं छोड़ सकता।
3. आर्थिक और औद्योगिक सुदृढ़ीकरण (Economic Impacts)
बढ़ता आयात बिल: उद्योग अनुमानों के अनुसार, भारत में सेमीकंडक्टर की मांग वर्ष 2030 तक $110 बिलियन को पार कर जाएगी। स्वदेशी निर्माण के बिना, यह चालू खाता घाटे (CAD) पर भारी दबाव डालेगा।
औद्योगिक लचीलापन (Industrial Resilience): कोविड-19 महामारी के दौरान चिप की कमी के कारण भारतीय ऑटोमोटिव और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा था। घरेलू फैब्रिकेशन (Fab) इकाइयां इस प्रकार के 'सप्लाई शॉक' से बचाएंगी।
स्वदेशी सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम निर्माण में विद्यमान चुनौतियाँ
अत्यधिक पूंजी सघनता (High CAPEX): एक उन्नत सेमीकंडक्टर फैब (Fabrication Plant) स्थापित करने में $10 से $20 बिलियन तक का निवेश लगता है, जिसकी जेस्टेशन अवधि (Gestation period) बहुत लंबी होती है।
कठोर संसाधन आवश्यकताएं: इस उद्योग को चौबीसों घंटे निर्बाध और उच्च गुणवत्ता वाली बिजली तथा अति-शुद्ध जल (Ultra-pure water) की विशाल मात्रा की आवश्यकता होती है। भारत के कई राज्यों में यह बुनियादी ढांचा अभी भी एक चुनौती है।
बौद्धिक संपदा (IP) और कौशल का अभाव: यद्यपि वैश्विक चिप डिजाइनिंग (Fabless design) कार्यबल में भारतीय इंजीनियरों की हिस्सेदारी लगभग 20% है, किंतु भारत के पास स्वयं के IP अधिकार (Patents) और विनिर्माण (Foundry) कौशल का भारी अभाव है।
आगे की राह (Way Forward)
भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन में स्वयं को स्थापित करने के लिए एक समग्र रणनीति की आवश्यकता है:
नीतिगत निरंतरता और प्रोत्साहन: उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना और डिज़ाइन लिंक्ड प्रोत्साहन (DLI) को दीर्घकालिक नीतिगत समर्थन (कम से कम 10-15 वर्ष) मिलना चाहिए ताकि विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) और निजी पूंजी आकर्षित हो सके।
रणनीतिक वैश्विक कूटनीति: भारत को क्वाड (QUAD) के 'सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन इनिशिएटिव' और अमेरिका-भारत iCET (Initiative on Critical and Emerging Technology) के माध्यम से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer) सुनिश्चित करना चाहिए।
इकोसिस्टम का निर्माण (Cluster Approach): ताइवान के 'सिंचू साइंस पार्क' (Hsinchu Science Park) की तर्ज पर भारत में विशेष सेमीकंडक्टर पार्क विकसित किए जाने चाहिए, जहाँ फैब, OSAT (Outsourced Semiconductor Assembly and Test), और अनुसंधान केंद्र एक ही स्थान पर हों।
मानव पूंजी विकास: AICTE और शीर्ष संस्थानों के सहयोग से 85,000 से अधिक उच्च कुशल इंजीनियरों के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित समय सीमा में पूर्ण किया जाना चाहिए।
सेमीकंडक्टर निर्माण में आत्मनिर्भरता भारत के लिए केवल एक आर्थिक विकल्प नहीं, बल्कि इसके रणनीतिक अस्तित्व और 'डिजिटल औपनिवेशवाद' (Digital Colonialism) से बचाव की अपरिहार्य शर्त है। एक सुदृढ़ और सुरक्षित सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का विकास न केवल 'आत्मनिर्भर भारत' की आधारशिला रखेगा, बल्कि 'विकसित भारत @ 2047' के निर्माण में भारत को वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला का एक विश्वसनीय और अपरिहार्य केंद्र (Net Security Provider in Technology) भी बनाएगा।