पशुपालन और डेयरी क्षेत्र महिलाओं के सशक्तीकरण और ग्रामीण आय में वृद्धि का एक प्रमुख साधन है। स्पष्ट करें।
Q. पशुपालन और डेयरी क्षेत्र महिलाओं के सशक्तीकरण और ग्रामीण आय में वृद्धि का एक प्रमुख साधन है। स्पष्ट करें।
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भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में पशुपालन और डेयरी क्षेत्र केवल एक सहायक गतिविधि नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास और सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण का एक प्रमुख इंजन है। आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार, पिछले एक दशक में पशुधन क्षेत्र ने लगभग 8% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) दर्ज की है, जो फसल क्षेत्र की तुलना में काफी अधिक है। वर्तमान में, कृषि सकल मूल्य वर्धित (GVA) में पशुधन का योगदान 30% से अधिक है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के आंकड़ों के अनुसार, भारत के पशुधन क्षेत्र के कार्यबल में लगभग 70% से अधिक महिलाओं की भागीदारी है। इस प्रकार, यह क्षेत्र ग्रामीण आय वृद्धि और महिला सशक्तीकरण के दोहरे लक्ष्यों को प्राप्त करने का एक संस्थागत माध्यम बन चुका है।
ग्रामीण आय वृद्धि में पशुपालन और डेयरी की भूमिका
पशुधन और डेयरी क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए 'सुरक्षा जाल' (Safety Net) और सतत आय का स्रोत प्रदान करता है:
सतत और नियमित नकदी प्रवाह (Continuous Cash Flow): कृषि (जो मौसमी है) के विपरीत, डेयरी क्षेत्र किसानों को दैनिक या साप्ताहिक आय प्रदान करता है, जिससे ग्रामीण परिवारों की तरलता (Liquidity) और क्रय शक्ति बनी रहती है।
समावेशी विकास (Inclusive Growth): भारत में लगभग 85% पशुधन भूमिहीन, सीमांत और छोटे किसानों (2 हेक्टेयर से कम जोत) के पास है। यह क्षेत्र संपत्ति और आय के समान वितरण को बढ़ावा देकर ग्रामीण गरीबी उन्मूलन में प्रत्यक्ष भूमिका निभाता है।
जलवायु लचीलापन (Climate Resilience): सूखा, बाढ़ या फसल विफलता (Crop Failure) की स्थिति में पशुपालन ग्रामीण परिवारों के लिए एक 'प्राकृतिक बीमा' के रूप में कार्य करता है।
रोजगार सृजन: उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन (Value Addition) और कोल्ड चेन लॉजिस्टिक्स तक, यह क्षेत्र लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित करता है।
महिलाओं के सशक्तीकरण का सशक्त माध्यम
पशुपालन ग्रामीण महिलाओं को पितृसत्तात्मक संरचनाओं से बाहर निकालकर उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से स्वावलंबी बनाता है:
1. आर्थिक स्वतंत्रता और निर्णय निर्माण (Economic & Social Impact)
प्रत्यक्ष आय नियंत्रण: डेयरी गतिविधियों (जैसे- दूध की बिक्री) से प्राप्त आय अक्सर सीधे महिलाओं के हाथों में जाती है। अध्ययनों से सिद्ध हुआ है कि जब महिलाएँ आय को नियंत्रित करती हैं, तो परिवार के पोषण, स्वास्थ्य और बच्चों की शिक्षा पर खर्च में वृद्धि होती है।
तरल संपत्ति (Liquid Asset): भूमि और संपत्ति के स्वामित्व (Property Rights) में महिलाओं की हिस्सेदारी नगण्य है, किंतु पशुधन उनके लिए एक ऐसी 'जीवित संपत्ति' है जिसे वे सुगमता से खरीद, बेच या प्रबंधित कर सकती हैं।
2. संस्थागत और राजनीतिक समावेशन (Institutional Inclusion)
सहकारी समितियों का नेतृत्व: राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) और 'अमूल' (AMUL) मॉडल के अंतर्गत स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और दुग्ध सहकारी समितियों ने महिलाओं को नेतृत्व के अवसर प्रदान किए हैं।
वित्तीय समावेशन: डेयरी समितियों से जुड़ाव के कारण महिलाओं का औपचारिक बैंकिंग प्रणाली तक विस्तार हुआ है, जिससे उन्हें किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) और सूक्ष्म ऋण (Microfinance) प्राप्त करने में सुविधा हुई है।
ग्रामीण विकास पर बहुआयामी प्रभाव: एक विश्लेषणात्मक रूपरेखा
| प्रभाव का क्षेत्र | पशुपालन/डेयरी की भूमिका | प्राप्त होने वाले वृहद लक्ष्य |
| आर्थिक (Economic) | छोटे किसानों की आय में विविधता, मूल्य संवर्धन | कृषक आय दोगुनी करना (अशोक दलवई समिति) |
| सामाजिक (Social) | महिलाओं का वित्तीय स्वावलंबन, कुपोषण में कमी | SDG 5 (लैंगिक समानता), SDG 2 (शून्य भुखमरी) |
| पारिस्थितिक (Environmental) | एकीकृत कृषि प्रणाली (Integrated Farming), जैविक खाद | सतत कृषि, मृदा स्वास्थ्य में सुधार |
क्षेत्र की विद्यमान चुनौतियाँ (Critical Analysis)
यद्यपि यह क्षेत्र संभावनाओं से परिपूर्ण है, फिर भी इसमें कई संरचनात्मक बाधाएं मौजूद हैं:
उत्पादकता का संकट: भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक होने के बावजूद, उन्नत नस्लों की कमी और वैज्ञानिक चारा प्रबंधन के अभाव के कारण प्रति पशु दुग्ध उत्पादकता वैश्विक औसत से काफी कम है।
अदृश्य महिला श्रम (Unpaid Care Work): पशुओं को चारा खिलाने, नहलाने और गोबर साफ करने जैसे कार्यों का 90% बोझ महिलाओं पर है, किंतु इसे प्रायः 'घरेलू काम' मानकर जीडीपी गणना में शामिल नहीं किया जाता है और न ही उन्हें 'किसान' का वैधानिक दर्जा प्राप्त होता है।
संस्थागत ऋण और बीमा का अभाव: पशुपालन के लिए किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) का विस्तार किया गया है, किंतु संपार्श्विक (Collateral) के अभाव में भूमिहीन महिलाओं को ऋण और पशु बीमा प्राप्त करने में कठिनाई होती है।
स्वास्थ्य और जलवायु चुनौतियाँ: लंपी स्किन डिजीज (LSD), खुरपका-मुंहपका रोग (FMD) जैसी महामारियां और जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न 'हीट स्ट्रेस' (Heat Stress) पशुओं की उत्पादकता और जीवन को गंभीर खतरे में डाल रहे हैं।
आगे की राह (Way Forward)
पशुपालन और डेयरी क्षेत्र के पूर्ण दोहन के लिए नीतिगत और तकनीकी हस्तक्षेप अनिवार्य हैं:
तकनीकी और अवसंरचनात्मक उन्नयन: पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (AHIDF) और राष्ट्रीय गोकुल मिशन का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। साथ ही, कृत्रिम गर्भाधान, 'सेक्स-सॉर्टेड सीमेन' (Sex-sorted Semen) तकनीक और ब्लॉकचेन आधारित दुग्ध आपूर्ति श्रृंखला को बढ़ावा देना होगा।
महिला केंद्रित नीतियाँ: महिलाओं को औपचारिक रूप से 'किसान' के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए, ताकि वे सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ उठा सकें। महिला नेतृत्व वाले किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को कर छूट और प्राथमिकता के आधार पर ऋण दिया जाना चाहिए।
पशु स्वास्थ्य सेवा: पंचायत स्तर पर मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों (Mobile Veterinary Units) का विस्तार कर रोगों की पूर्व-चेतावनी और त्वरित उपचार सुनिश्चित करना आवश्यक है।
डेयरी और पशुपालन मात्र एक कृषि-संबद्ध क्षेत्र नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के 'समावेशी विकास' का मेरुदंड है। जब ग्रामीण महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होती हैं, तो इसका "ट्रिकल-डाउन प्रभाव" (Trickle-down effect) पूरे समाज पर पड़ता है। संस्थागत सहायता, तकनीकी समावेशन और सहकारी मॉडल के सुदृढ़ीकरण से यह क्षेत्र 'आत्मनिर्भर भारत' की नींव को मजबूत करेगा और 'विकसित भारत @ 2047' के सर्वांगीण विकास के लक्ष्य को वास्तविकता में परिवर्तित करने का सबसे सशक्त साधन सिद्ध होगा।