भारत में भूमि सुधारों (Land Reforms) के अधूरे एजेंडे का कृषि उत्पादकता पर क्या प्रभाव पड़ा है?
Q. भारत में भूमि सुधारों (Land Reforms) के अधूरे एजेंडे का कृषि उत्पादकता पर क्या प्रभाव पड़ा है?
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारतीय कृषि में संरचनात्मक और संस्थागत परिवर्तन लाने हेतु भूमि सुधार (Land Reforms) नीति-निर्माण का एक प्रमुख आधार रहे हैं। इनका मुख्य उद्देश्य सामाजिक समानता सुनिश्चित करना और "जोतने वाले को भूमि" (Land to the Tiller) का अधिकार प्रदान करना था। यद्यपि जमींदारी उन्मूलन जैसी प्रारंभिक सफलताओं ने एक मजबूत आधारशिला रखी, किंतु कृषि जनगणना 2015-16 के आँकड़े दर्शाते हैं कि आज भी भारत में लगभग 86% कृषक छोटे और सीमांत (2 हेक्टेयर से कम जोत वाले) हैं, और औसत जोत का आकार घटकर मात्र 1.08 हेक्टेयर रह गया है।
यह स्थिति भूमि सुधारों के 'अधूरे एजेंडे' को परिलक्षित करती है, जिसने भारत की कृषि उत्पादकता और समग्र आर्थिक विकास की क्षमता को गंभीर रूप से अवरुद्ध किया है।
भूमि सुधारों का अधूरा एजेंडा: संरचनात्मक विफलताएं
किरायेदारी सुधारों (Tenancy Reforms) का अभाव: काश्तकारी को वैधानिक मान्यता न मिलने से 'मौखिक या अनौपचारिक किरायेदारी' (Informal/Concealed Tenancy) में वृद्धि हुई है। अधिकांश राज्यों में पट्टेदारी कानूनों में कठोरता के कारण जमींदार भूमि किराये पर देने से कतराते हैं।
भूमि अधिकतम सीमा (Land Ceiling) का निष्प्रभावी कार्यान्वयन: बेनामी संपत्तियों के हस्तांतरण और कानूनी खामियों (जैसे- बागानों, धार्मिक ट्रस्टों को दी गई छूट) के कारण भूमि का समान पुनर्वितरण और अधिशेष (Surplus) भूमि का अधिग्रहण पूर्ण रूप से विफल रहा।
चकबंदी (Land Consolidation) की धीमी गति: पंजाब और हरियाणा जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर, देश के अधिकांश हिस्सों में भूमि का अत्यधिक विखंडन हुआ है।
भूमि अभिलेखों (Land Records) का धीमा आधुनिकीकरण: डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP) के बावजूद, भारत में अभी भी 'निर्णायक स्वामित्व' (Conclusive Titling) के बजाय 'अनुमानित स्वामित्व' (Presumptive Titling) की दोषपूर्ण व्यवस्था विद्यमान है।
कृषि उत्पादकता पर अधूरे एजेंडे का बहुआयामी प्रभाव
भूमि सुधारों की इस अपूर्णता का कृषि क्षेत्र पर बहुआयामी (PESTLE) और नकारात्मक प्रभाव पड़ा है:
1. आर्थिक प्रभाव (Economic Impacts)
संस्थागत ऋण और पूंजीगत निवेश का अभाव: अनौपचारिक काश्तकारों (Tenants) और बटाईदारों के पास भूमि का मालिकाना हक (Collateral) न होने के कारण उन्हें संस्थागत ऋण नहीं मिलता। इसके परिणामस्वरूप, किसान भूमि की उत्पादकता बढ़ाने वाले दीर्घकालिक बुनियादी ढांचे (जैसे- ड्रिप सिंचाई, ट्यूबवेल) में पूंजीगत निवेश करने से कतराते हैं।
पैमाने की अर्थव्यवस्था (Economies of Scale) का नुकसान: जोतों के अत्यधिक छोटे होने के कारण कृषि लागत (Input costs) बढ़ जाती है और प्रति हेक्टेयर लाभप्रदता न्यूनतम स्तर पर आ जाती है।
2. तकनीकी प्रभाव (Technological Impacts)
मशीनीकरण (Mechanization) में बाधा: विखंडित जोतों पर आधुनिक कृषि यंत्रों (जैसे- हार्वेस्टर, लेजर लैंड लेवलर) और 'सटीक कृषि' (Precision Farming) का उपयोग तकनीकी रूप से कठिन और आर्थिक रूप से अव्यवहार्य (Unviable) हो जाता है। इससे श्रम उत्पादकता और फसल उत्पादकता दोनों बाधित होती हैं।
3. सामाजिक एवं पर्यावरणीय प्रभाव (Social & Environmental Impacts)
मृदा स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी का क्षरण: कार्यकाल की असुरक्षा (Tenure Insecurity) के कारण किरायेदार किसान भूमि के दीर्घकालिक स्वास्थ्य (जैसे- जैविक खाद का उपयोग, फसल चक्र) की उपेक्षा करते हैं। उनका ध्यान अल्पावधि में अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने पर होता है, जिससे मृदा का क्षरण और भूजल स्तर में भारी गिरावट होती है।
4. विधिक और प्रशासनिक प्रभाव (Legal & Administrative Impacts)
विवादों में फंसी भूमि: नीति आयोग के अनुसार, भारतीय अदालतों में लंबित मामलों में एक बहुत बड़ा हिस्सा संपत्ति और भूमि विवादों का है। इसके कारण लाखों हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि वर्षों तक अनुत्पादक (Unproductive) पड़ी रहती है।
उत्पादकता ह्रास: एक विश्लेषणात्मक रूपरेखा
| अधूरे सुधार का घटक | वर्तमान स्थिति (कारण) | उत्पादकता पर सीधा प्रभाव (Impact) |
| काश्तकारी कानून | अनौपचारिक और असुरक्षित पट्टेदारी | दीर्घकालिक निवेश शून्य; मृदा गुणवत्ता का क्षरण |
| चकबंदी | अत्यधिक विखंडित जोत (Fragmented Holdings) | मशीनीकरण असंभव; लागत में वृद्धि (High Input Cost) |
| भूमि अभिलेख | अस्पष्ट संपत्ति शीर्षक (Unclear Titles) | PMFBY (फसल बीमा) और संस्थागत ऋण (KCC) से वंचन |
आगे की राह (Way Forward)
मॉडल कृषि भूमि पट्टा अधिनियम (Model Agricultural Land Leasing Act, 2016): नीति आयोग द्वारा प्रस्तावित इस अधिनियम को राज्यों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। यह पट्टेदारों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करेगा, जिससे वे ऋण, बीमा और आपदा राहत का लाभ उठा सकेंगे, तथा भू-मालिकों का संपत्ति अधिकार भी सुरक्षित रहेगा।
भूमि रिकॉर्ड का आधुनिकीकरण: 'स्वामित्व योजना' (SVAMITVA Scheme) के तहत ड्रोन तकनीक का उपयोग कर ग्रामीण संपत्तियों का सटीक सीमांकन किया जाना चाहिए। भारत को 'टॉरेंस प्रणाली' (Torrens System) पर आधारित गारंटीशुदा भूमि शीर्षक (Conclusive Titling) की ओर तेजी से बढ़ना होगा।
किसान उत्पादक संगठन (FPOs) और सहकारी खेती: भूमि के भौतिक एकीकरण के बजाय, छोटे किसानों को FPOs या सहकारी मॉडल के माध्यम से संगठित किया जाना चाहिए। इससे वे बिना मालिकाना हक खोए बड़े पैमाने की खेती और सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining) का लाभ ले सकेंगे।
डिजिटल एग्री-स्टैक (Agri-Stack): किसानों के डेटा, भूमि रिकॉर्ड और मौसम की जानकारी को एकीकृत कर एक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करना, ताकि लक्षित सब्सिडी और तकनीकी सहायता सीधे किसान तक पहुंच सके।
भूमि केवल कृषि उत्पादन का कारक नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण भारत में सामाजिक सुरक्षा, आजीविका और गरिमा का मुख्य आधार है। एम. एस. स्वामीनाथन समिति (राष्ट्रीय किसान आयोग) ने भी भारतीय कृषि संकट के स्थायी समाधान हेतु 'द्वितीय पीढ़ी के भूमि सुधारों' (Second Generation Land Reforms) को अपरिहार्य माना है। संस्थागत और संरचनात्मक बाधाओं को दूर करके ही हम कृषि को लाभकारी उद्यम में बदल सकते हैं। यह कदम न केवल SDG 1 (गरीबी उन्मूलन) और SDG 2 (शून्य भुखमरी) के वैश्विक लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक होगा, बल्कि 'आत्मनिर्भर कृषि' के माध्यम से 'विकसित भारत @ 2047' के समावेशी और समृद्ध राष्ट्र के संकल्प को भी मूर्त रूप प्रदान करेगा।