अंतरिक्ष का सैन्यीकरण (Militarization of Space) और भारत की रक्षा तैयारियों (Mission Shakti) पर चर्चा करें।

 Q. अंतरिक्ष का सैन्यीकरण (Militarization of Space) और भारत की रक्षा तैयारियों (Mission Shakti) पर चर्चा करें।

Ans - 

आधुनिक भू-राजनीति और सामरिक रणनीति में अंतरिक्ष को भूमि, समुद्र और वायु के बाद युद्ध के 'चतुर्थ आयाम' (Fourth Frontier) के रूप में मान्यता प्राप्त हो चुकी है। यद्यपि बाह्य अंतरिक्ष संधि (Outer Space Treaty), 1967 अंतरिक्ष को एक 'वैश्विक साझा संपत्ति' (Global Commons) के रूप में परिभाषित करती है, किंतु वर्तमान में तकनीकी प्रतिस्पर्धा के कारण यह एक सक्रिय सैन्य क्षेत्र (Warfighting Domain) में परिवर्तित हो रहा है। अंतरिक्ष का सैन्यीकरण न केवल वैश्विक सुरक्षा संरचना के लिए एक चुनौती है, बल्कि इसने भारत को भी अपनी रक्षा रणनीतियों को पुनर्गठित करने के लिए विवश किया है।

अंतरिक्ष का सैन्यीकरण: कारण और बहुआयामी प्रभाव

अंतरिक्ष के सैन्यीकरण को केवल हथियारों की तैनाती तक सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि यह उपग्रहों के सामरिक उपयोग से जुड़ा एक व्यापक परिदृश्य है।

  • रणनीतिक प्रतिस्पर्धा (Strategic): महाशक्तियों (अमेरिका, रूस और चीन) के मध्य 'स्पेस डोमिनेंस' (Space Dominance) स्थापित करने की होड़ मची है। अमेरिका द्वारा 'स्पेस फोर्स' (Space Force) का गठन इसी दिशा में उठाया गया कदम है।

  • तकनीकी विकास (Technological): दोहरे उपयोग (Dual-use) वाली प्रौद्योगिकियों का तीव्र विकास हुआ है। इनमें डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स (DEWs), साइबर जैमिंग, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और 'किलर सैटेलाइट्स' शामिल हैं जो दुश्मन के संचार तंत्र को पंगु बना सकते हैं।

  • आर्थिक निर्भरता (Economic): आधुनिक अर्थव्यवस्था, बैंकिंग, नेविगेशन (जैसे- GPS, NavIC) और संचार नेटवर्क पूरी तरह से उपग्रहों पर निर्भर हैं। इन्हें लक्षित कर किसी भी राष्ट्र को गंभीर आर्थिक क्षति पहुँचाई जा सकती है।

  • सैन्य अभियानों में भूमिका: सटीक मारक क्षमता (Precision-guided munitions) और खुफिया जानकारी (ISR - Intelligence, Surveillance, and Reconnaissance) जुटाने के लिए अंतरिक्ष संपत्तियों पर सैन्य बलों की निर्भरता अत्यधिक बढ़ गई है।

भारत की रक्षा तैयारियां: 'मिशन शक्ति' और संस्थागत उपाय

चीन द्वारा 2007 में किए गए एंटी-सैटेलाइट (ASAT) परीक्षण के बाद भारत के लिए अपनी अंतरिक्ष संपत्तियों की सुरक्षा एक रणनीतिक अनिवार्यता बन गई थी। इस दिशा में भारत ने निम्नलिखित ठोस कदम उठाए हैं:

1. मिशन शक्ति (Mission Shakti - 2019)

  • तकनीकी क्षमता: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और ISRO के इस संयुक्त अभियान के तहत भारत ने लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में लगभग 300 किमी की ऊंचाई पर अपने ही एक निष्क्रिय उपग्रह को 'हिट-टू-किल' (Kinetic Kill) तकनीक से सफलतापूर्वक नष्ट किया।

  • रणनीतिक निवारण (Strategic Deterrence): अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत ऐसी क्षमता हासिल करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया। यह परीक्षण किसी देश के विरुद्ध निर्देशित नहीं था, बल्कि यह भारत की विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता (Credible Minimum Deterrence) का एक स्पष्ट प्रदर्शन था।

2. संस्थागत और संरचनात्मक सुदृढ़ीकरण

  • डिफेंस स्पेस एजेंसी (DSA): तीनों सेनाओं (थल, वायु, नौसेना) के मध्य अंतरिक्ष आधारित अभियानों में समन्वय स्थापित करने के लिए इस एकीकृत एजेंसी का गठन किया गया है।

  • डिफेंस स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (DSRO): DSA को तकनीकी और अनुसंधान समर्थन प्रदान करने तथा भविष्य के अंतरिक्ष हथियारों के विकास के लिए इसकी स्थापना की गई है।

  • प्रोजेक्ट नेत्रा (Project NETRA): ISRO द्वारा विकसित यह 'स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस' (SSA) प्रणाली है, जो अंतरिक्ष मलबे और भारत के उपग्रहों पर मंडराने वाले खतरों की पूर्व-चेतावनी प्रदान करती है।

  • इंडीस्पेसएक्स (IndSpaceX): भारतीय सशस्त्र बलों ने अंतरिक्ष युद्ध की जटिलताओं को समझने और रणनीतिक खामियों का आकलन करने के लिए अपना पहला सिमुलेटेड अंतरिक्ष युद्ध अभ्यास आयोजित किया।

विद्यमान चुनौतियाँ

  • अंतर्राष्ट्रीय कानून में शून्यता (Legal Vacuum): 1967 की संधि अंतरिक्ष में केवल 'सामूहिक विनाश के हथियारों' (WMD) की तैनाती को रोकती है, पारंपरिक हथियारों या साइबर हमलों को नहीं।

  • अंतरिक्ष मलबे का संकट (Environmental): काइनेटिक ASAT परीक्षणों से भारी मात्रा में मलबा उत्पन्न होता है, जो 'केसलर सिंड्रोम' (Kessler Syndrome) जैसी भयावह स्थिति को जन्म दे सकता है।

  • पड़ोसी देशों का आक्रामक रुख: चीन का उन्नत काउंटर-स्पेस प्रोग्राम, जिसमें सह-कक्षीय (Co-orbital) उपग्रह और लेजर हथियार शामिल हैं, भारतीय संपत्तियों के लिए एक स्पष्ट और वर्तमान खतरा है।

आगे की राह (Way Forward)

भारत को रक्षा और कूटनीति के दोहरे मोर्चे पर कार्य करने की आवश्यकता है:

  • सक्रिय कूटनीति: भारत को संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण सम्मेलन (CD) में PAROS (Prevention of an Arms Race in Outer Space) जैसे संधियों के निर्माण में एक नेतृत्वकारी भूमिका निभानी चाहिए, ताकि एक नियम-आधारित वैश्विक अंतरिक्ष व्यवस्था (Rules-based space order) स्थापित हो सके।

  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी: साइबर सुरक्षा, उपग्रह निर्माण और अंतरिक्ष संचार में निजी क्षेत्र के नवाचार को IN-SPACe के माध्यम से रक्षा प्रतिष्ठानों के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए।

  • गैर-गतिज (Non-Kinetic) हथियारों का विकास: भविष्य के युद्धों को देखते हुए भारत को लेजर तकनीक, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स (EMP) और साइबर डिफेंस जैसी गैर-मलबा उत्पन्न करने वाली रक्षा प्रणालियों पर निवेश बढ़ाना चाहिए।

अंतरिक्ष का शस्त्रीकरण और सैन्यीकरण आधुनिक भू-राजनीतिक यथार्थ का एक अपरिहार्य हिस्सा बन चुका है। भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग के प्रति प्रतिबद्ध रही है, परंतु बदलती सुरक्षा गतिशीलता में 'मिशन शक्ति' जैसी रक्षात्मक क्षमताएं नितांत आवश्यक हैं। एक सुदृढ़ और आत्मनिर्भर 'स्पेस डिफेंस इकोसिस्टम' न केवल 'विकसित भारत @ 2047' की तकनीकी संप्रभुता (Technological Sovereignty) की रक्षा करेगा, बल्कि 'वसुधैव कुटुंबकम' के सिद्धांत के अनुरूप, भविष्य में वैश्विक अंतरिक्ष संपत्तियों को सुरक्षित रखने में भारत को एक परिपक्व और उत्तरदायी 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' के रूप में स्थापित करेगा।

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