जॉन रॉल्स के 'न्याय के सिद्धांत' (Theory of Justice) की विवेचना करें।
Q. जॉन रॉल्स के 'न्याय के सिद्धांत' (Theory of Justice) की विवेचना करें।
Ans -
बीसवीं सदी के प्रमुख अमेरिकी राजनीतिक दार्शनिक जॉन रॉल्स ने अपनी युगांतरकारी कृति 'ए थ्योरी ऑफ जस्टिस' (A Theory of Justice, 1971) में न्याय के एक ऐसे ढांचे की नींव रखी, जिसने समकालीन राजनीतिक दर्शन और लोक नीति को पुनर्परिभाषित किया। रॉल्स का यह सिद्धांत उपयोगितावाद (Utilitarianism) के 'अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख' के सिद्धांत के कड़े विकल्प के रूप में उभरा, क्योंकि उपयोगितावाद बहुसंख्यक सुख के लिए समाज के वंचित और अल्पसंख्यक वर्गों के मूल अधिकारों के हनन को भी उचित ठहरा देता था।
इमैनुअल कांत के कर्तव्यवादी (Deontological) दर्शन और सामाजिक अनुबंध (Social Contract) की परंपरा से प्रेरित होकर रॉल्स ने 'निष्पक्षता के रूप में न्याय' (Justice as Fairness) की अवधारणा प्रस्तुत की। उनका स्पष्ट मानना था कि "न्याय सामाजिक संस्थाओं का प्रथम सद्गुण है, जैसे सत्य विचार प्रणालियों का।"
रॉल्स की पद्धति: निष्पक्षता के निर्माण की वैचारिक संरचना
रॉल्स ने न्याय के सार्वभौमिक नियमों तक पहुँचने के लिए एक काल्पनिक स्थिति और पद्धति विकसित की:
मूल स्थिति (Original Position): यह पारंपरिक सामाजिक अनुबंध का एक परिष्कृत और अमूर्त रूप है, जहाँ सभी व्यक्ति स्वतंत्र, समान और विवेकशील कर्ता के रूप में एकत्रित होकर समाज के बुनियादी नियमों का चयन करते हैं।
अज्ञानता का पर्दा (Veil of Ignorance): इस स्थिति में व्यक्तियों को अपनी वास्तविक पहचान का कोई ज्ञान नहीं होता—उन्हें अपनी जाति, वर्ग, लिंग, प्रतिभा, संपत्ति अथवा जीवन के नैतिक दृष्टिकोण का बोध नहीं होता। रॉल्स के अनुसार, जब व्यक्ति को अपनी भविष्य की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का ज्ञान नहीं होगा, तो वह स्वतः ही किसी एक वर्ग के पक्ष में पक्षपाती नियम नहीं बना सकेगा।
मैक्सीमिन नियम (Maximin Rule): अज्ञानता के पर्दे के पीछे विवेकशील कर्ता जोखिम से बचने (Risk-averse) की रणनीति अपनाता है। वह यह मानकर नियम बनाता है कि पर्दा हटने पर संभवतः वह समाज के सबसे निचले पायदान (Worst-off position) पर पाया जाएगा। अतः वह ऐसी व्यवस्था चुनेगा जो न्यूनतम स्थिति को अधिकतम सुरक्षित बनाए (Maximize the Minimum)।
न्याय के मूलभूत सिद्धांत और उनकी प्राथमिकता
रॉल्स ने मूल स्थिति में विचार-विमर्श के माध्यम से न्याय के दो प्रमुख सिद्धांतों का प्रतिपादन किया, जिन्हें एक सख्त शब्दकोषीय क्रम (Lexical Order) में लागू किया जाना अनिवार्य है:
[1. समान मूल स्वतंत्रताओं का सिद्धांत]
↓ (सर्वोच्च प्राथमिकता)
[2(a). अवसर की निष्पक्ष समानता का सिद्धांत]
↓ (द्वितीय प्राथमिकता)
[2(b). भेदमूलक सिद्धांत (Difference Principle)]
1. समान मूल स्वतंत्रताओं का सिद्धांत (Principle of Equal Basic Liberties)
प्रत्येक व्यक्ति को सबसे व्यापक मूल स्वतंत्रताओं (भाषण, संगठन, अंतःकरण, मतदान और संपत्ति की स्वतंत्रता) का समान अधिकार होना चाहिए, जो अन्य सभी व्यक्तियों की समान स्वतंत्रता के साथ संगत हो सके।
प्राथमिकता: स्वतंत्रता का बलिदान आर्थिक लाभ या दक्षता के लिए नहीं किया जा सकता।
2. सामाजिक और आर्थिक विषमताओं का सिद्धांत (Principle of Social and Economic Inequalities)
समाज में आर्थिक और सामाजिक विषमताएँ केवल तभी स्वीकार्य हैं, जब वे दो शर्तों को पूरा करती हों:
(a) अवसर की निष्पक्ष समानता (Fair Equality of Opportunity): सभी सार्वजनिक पद और अवसर केवल औपचारिक रूप से खुले न हों, बल्कि समान प्रतिभा वाले सभी व्यक्तियों को पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना उन पदों को प्राप्त करने के वास्तविक और समान अवसर मिलें।
(b) भेदमूलक सिद्धांत (Difference Principle): समाज में विषमता की अनुमति केवल तब है, जब वह समाज के सबसे वंचित वर्ग (Least Advantaged) के अधिकतम लाभ के लिए कार्य करे।
भारतीय संवैधानिक दर्शन और लोक प्रशासन में रॉल्स की प्रासंगिकता
रॉल्स का न्याय सिद्धांत भारतीय संविधान की अंतरात्मा और कल्याणकारी राज्य की नीतियों में गहरे रूप से प्रतिध्वनित होता है:
संवैधानिक समता और स्वतंत्रता (Political & Legal):
अनुच्छेद 19 और 21 रॉल्स के प्रथम सिद्धांत (मूल स्वतंत्रताओं की समानता) की गारंटी देते हैं।
अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता) अवसर की समानता को वैधानिक आधार प्रदान करता है।
सकारात्मक भेदभाव और आरक्षण (Affirmative Action):
अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण रॉल्स के भेदमूलक सिद्धांत का सजीव प्रमाण है, जो विशुद्ध योग्यतावाद (Pure Meritocracy) के बजाय वास्तविक सामाजिक न्याय को स्थापित करता है।
राज्य के नीति निदेशक तत्व (Socio-Economic):
अनुच्छेद 38 और 39(b)(c) संसाधनों के संकेंद्रण को रोकने और समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण का निर्देश देते हैं।
लक्षित लोक वितरण प्रणाली (TPDS), मनरेगा (MGNREGA), और आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं सबसे वंचित वर्ग के कल्याण को प्राथमिकता देकर 'मैक्सीमिन सिद्धांत' को चरितार्थ करती हैं।
रॉल्स के सिद्धांत का समालोचनात्मक मूल्यांकन
यद्यपि रॉल्स का सिद्धांत अत्यंत प्रभावशाली रहा, फिर भी विभिन्न दार्शनिक धाराओं द्वारा इसकी आलोचना की गई:
| दार्शनिक धारा / विचारक | प्रमुख आपत्ति |
| रॉबर्ट नॉज़िक (स्वैच्छातंत्रवाद - Libertarianism) | 'एनार्की, स्टेट एंड यूटोपिया' में उन्होंने तर्क दिया कि भेदमूलक सिद्धांत व्यक्तिगत अधिकारों और संपत्ति के अर्जन का उल्लंघन करता है। कर (Taxation) लगाना एक प्रकार का 'बेगार' (Forced labor) है। |
| अमर्त्य सेन (क्षमता उपागम - Realization-focused) | 'द आइडिया ऑफ जस्टिस' में सेन ने कहा कि रॉल्स केवल पूर्णतः न्यायपूर्ण संस्थाओं के निर्माण (नीति) पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जबकि वास्तविक न्याय का सार व्यक्तियों के वास्तविक जीवन और उनके परिणामों (न्याय) में निहित है। |
| समुदायवादी (Communitarians - Sandel, Walzer) | अज्ञानता के पर्दे में व्यक्ति को उसकी सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक पहचान से पूरी तरह विलग (Unencumbered Self) मान लेना अवास्तविक और भ्रामक है। |
| मार्क्सवादी (Marxist) | यह सिद्धांत पूंजीवादी ढांचे को नष्ट किए बिना केवल उसके दुष्प्रभावों को कम करने का प्रयास करता है, जिससे संरचनात्मक असमानता बनी रहती है। |
आगे की राह (Way Forward)
समकालीन शासन व्यवस्था में रॉल्स के सिद्धांत को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए निम्नलिखित दृष्टिकोण अपनाए जाने चाहिए:
संस्थागत निष्पक्षता (Institutional Fairness): नीति-निर्माण के दौरान नीति निर्धारकों को स्वयं को 'अज्ञानता के पर्दे' में रखकर सोचना चाहिए कि किसी नीति (जैसे डिजिटल गवर्नेंस या भूमि अधिग्रहण) का सबसे प्रतिकूल प्रभाव किस वर्ग पर पड़ेगा, और उसका शमन पहले किया जाना चाहिए।
'नीति' से 'न्याय' की ओर संक्रमण: अमर्त्य सेन के सुझावों को शामिल करते हुए प्राथमिक वस्तुओं (Primary Goods) के वितरण से आगे बढ़कर कमजोर वर्गों के क्षमता निर्माण (Capability Development) पर बल दिया जाए।
डिजिटल और जलवायु न्याय: आधुनिक युग में डेटा असमानता (Digital Divide) और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सबसे गरीब वर्ग पर पड़ता है; अतः जलवायु अनुकूलन और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) तक सबकी निष्पक्ष पहुँच सुनिश्चित की जाए।
निष्कर्ष
जॉन रॉल्स का न्याय का सिद्धांत उदारवादी लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के मध्य एक ऐसा समन्वयकारी सेतु है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता से समझौता किए बिना समतामूलक समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है। यह सिद्धांत लोक सेवकों के लिए एक नैतिक दिशा-सूचक (Moral Compass) का कार्य करता है, जो उन्हें याद दिलाता है कि किसी भी शासन व्यवस्था की वास्तविक सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसका सबसे संपन्न वर्ग कितना समृद्ध है, बल्कि इससे मापी जाती है कि उसका सबसे दुर्बल वर्ग कितना सुरक्षित और समर्थ है।
रॉल्स का यह दर्शन भारत के संवैधानिक संकल्प 'सर्वोदय से अंत्योदय', सतत विकास लक्ष्य-10 (असमानता में कमी) तथा 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना को आत्मसात करते हुए एक समावेशी, न्यायपूर्ण और सशक्त 'नव भारत 2047' के निर्माण की दिशा में अकादमिक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर अत्यंत प्रासंगिक है।