कांत के 'निरपेक्ष आदेश' (Categorical Imperative) के सिद्धांत को लोक प्रशासन में कैसे लागू किया जा सकता है?

 Q. कांत के 'निरपेक्ष आदेश' (Categorical Imperative) के सिद्धांत को लोक प्रशासन में कैसे लागू किया जा सकता है?

Ans - 

जर्मन दार्शनिक इमैनुअल कांत का नीतिशास्त्र 'कर्तव्यवाद' (Deontology) पर आधारित है, जो परिणामों (उपयोगितावाद) के बजाय कर्म की अंतर्निहित नैतिकता पर बल देता है। कांत के दर्शन का केंद्रबिंदु 'निरपेक्ष आदेश' (Categorical Imperative) है, जिसका अर्थ है एक ऐसा बिना शर्त का नैतिक दायित्व, जिसका पालन हर परिस्थिति में किया जाना चाहिए, चाहे उसके परिणाम कुछ भी हों।

समकालीन लोक प्रशासन में, जहाँ अधिकारी अक्सर राजनीतिक दबाव, 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) और परिणाम-उन्मुख (Target-driven) कार्यसंस्कृति का सामना करते हैं, कांत का यह सिद्धांत एक सुदृढ़ नैतिक दिशा-सूचक (Moral Compass) का कार्य करता है। यह लोक सेवकों को संविधान की प्रस्तावना और द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) द्वारा अनुशंसित मूलभूत मूल्यों के प्रति अडिग रहने की प्रेरणा देता है।

लोक प्रशासन में 'निरपेक्ष आदेश' के सूत्रों का अनुप्रयोग

कांत ने अपने निरपेक्ष आदेश को तीन मुख्य सूत्रों (Maxims) में विभाजित किया है, जिन्हें प्रशासनिक कार्यप्रणाली में निम्नलिखित रूप से लागू किया जा सकता है:

1. सार्वभौमिकता का नियम (Principle of Universality) कांत का कथन: "केवल उसी नियम के अनुसार कार्य करो, जिसके बारे में तुम यह चाह सको कि वह एक सार्वभौमिक कानून बन जाए।"

  • प्रशासनिक वस्तुनिष्ठता (Administrative Objectivity): एक सिविल सेवक को ऐसे निर्णय लेने चाहिए जो किसी भी व्यक्तिगत पूर्वाग्रह (जाति, धर्म, क्षेत्र) से मुक्त हों। यदि कोई अधिकारी भाई-भतीजावाद (Nepotism) या भ्रष्टाचार करता है, तो उसे यह सोचना चाहिए कि यदि सभी अधिकारी ऐसा करने लगें तो पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी।

  • कानून का शासन (Rule of Law): यह सिद्धांत संविधान के अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता) को नैतिक आधार प्रदान करता है। नियम शासक और शासित दोनों पर समान रूप से लागू होने चाहिए।

2. मानवता: साधन नहीं, बल्कि साध्य (Humanity as an End in Itself) कांत का कथन: "स्वयं में और दूसरों में मानवता को हमेशा एक साध्य मानो, कभी भी केवल एक साधन के रूप में नहीं।"

  • नागरिक-केंद्रित प्रशासन (Citizen-Centric Administration): नागरिकों को केवल 'वोट बैंक', 'करदाता' या सांख्यिकीय आँकड़ों के रूप में उपयोग करना अनैतिक है। प्रशासन का मुख्य उद्देश्य उनके अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार) की रक्षा करना है।

  • तकनीकी और डेटा नैतिकता (Technological Ethics): ई-गवर्नेंस और बिग डेटा (Big Data) के युग में, नागरिकों के निजी डेटा का उपयोग केवल राजकीय लक्ष्यों की प्राप्ति (जैसे सर्विलांस) के लिए करना इस सिद्धांत का उल्लंघन है। निजता (Privacy) का सम्मान मानवता को साध्य मानने का ही रूप है।

3. साध्यों का राज्य और स्वायत्तता (Kingdom of Ends and Autonomy) कांत का कथन: "इस प्रकार कार्य करो जैसे कि तुम साध्यों के राज्य में एक विधायक (Law-maker) हो।"

  • कर्तव्य के लिए कर्तव्य (Duty for Duty's Sake): एक प्रशासक को अपना कार्य किसी पुरस्कार (प्रमोशन) की लालसा या दंड (तबादले) के भय से नहीं, बल्कि आंतरिक नैतिक प्रेरणा और 'निष्काम कर्म' की भावना से करना चाहिए।

  • सत्यनिष्ठा और जवाबदेही (Integrity & Accountability): लोक सेवक को अपने अंतःकरण के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए। यदि उच्चाधिकारी द्वारा कोई गैर-कानूनी या अनैतिक आदेश (Unlawful Orders) दिया जाता है, तो एक कांतवादी अधिकारी उसका पालन करने से इंकार कर देगा, क्योंकि वह अपनी स्वायत्तता और सत्यनिष्ठा से समझौता नहीं कर सकता।

प्रशासनिक चुनौतियों के समाधान में बहुआयामी दृष्टिकोण (Multidimensional Impact)

  • राजनीतिक (Political): यह उपयोगितावाद (बहुसंख्यकवाद) के खतरों को रोकता है। यदि कोई नीति बहुसंख्यक वर्ग को लाभ पहुँचाती है लेकिन अल्पसंख्यक या कमजोर वर्ग के अधिकारों का हनन करती है, तो कांत के अनुसार वह नीति अनैतिक है।

  • सामाजिक (Social): वंचित वर्गों (महिलाओं, जनजातियों, दिव्यांगों) के प्रति करुणा और उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाना राज्य का बिना शर्त नैतिक कर्तव्य (Categorical duty) बन जाता है।

  • पर्यावरणीय (Environmental): सतत विकास केवल इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि यह आर्थिक रूप से लाभदायक है, बल्कि इसलिए किया जाना चाहिए क्योंकि भावी पीढ़ियों के अस्तित्व (मानवता) की रक्षा हमारा निरपेक्ष कर्तव्य है।

आगे की राह (Way Forward)

कांत के सिद्धांतों को संस्थागत रूप देने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:

  • आचार संहिता (Code of Ethics) का निर्माण: 2nd ARC की अनुशंसा के अनुसार नियमों (Rules) के साथ-साथ मूल्यों (Values) पर आधारित एक व्यापक आचार संहिता लागू की जानी चाहिए।

  • मिशन कर्मयोगी (Mission Karmayogi): क्षमता निर्माण कार्यक्रमों में केस-स्टडी और दार्शनिक प्रशिक्षण को शामिल कर अधिकारियों की 'नैतिक बुद्धिमत्ता' (Ethical Intelligence) का विकास किया जाना चाहिए।

  • व्हिसिलब्लोअर संरक्षण (Whistleblower Protection): सत्यनिष्ठा का पालन करने वाले अधिकारियों को संस्थागत सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए ताकि वे निर्भीकता से अपने 'निरपेक्ष आदेश' का पालन कर सकें।

निष्कर्ष

लोक प्रशासन में कांत का 'निरपेक्ष आदेश' यह सुनिश्चित करता है कि प्रशासन केवल 'क्या किया जाना चाहिए' (विधिक दायित्व) तक सीमित न रहे, बल्कि 'क्या करना सही है' (नैतिक दायित्व) की ओर अग्रसर हो। जब नीति-निर्माण और उसके क्रियान्वयन में साधन (Means) और साध्य (Ends) दोनों की पवित्रता स्थापित होती है, तभी सतत विकास लक्ष्य- 16 (शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) प्राप्त किए जा सकते हैं। इस कर्तव्यनिष्ठ दृष्टिकोण को अपनाकर ही भारत एक पारदर्शी, जवाबदेह और समावेशी शासन व्यवस्था के साथ 'वसुधैव कुटुंबकम' के मूल्यों को पोषित करते हुए 'नव भारत 2047' के अपने स्वप्न को साकार कर सकता है।

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