प्रशासकों में 'सहनशीलता' (Tolerance) का गुण भारतीय विविधता को बनाए रखने के लिए क्यों आवश्यक है?
Q. प्रशासकों में 'सहनशीलता' (Tolerance) का गुण भारतीय विविधता को बनाए रखने के लिए क्यों आवश्यक है?
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भारत जैसे महाद्वीपीय आकार वाले बहुलवादी (Pluralistic) देश में, जहाँ धर्म, जाति, भाषा और संस्कृति की असीम विविधता विद्यमान है, प्रशासन मात्र एक यांत्रिक अथवा विधिक प्रक्रिया नहीं है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी रिपोर्ट 'शासन में नैतिकता' तथा नोलन समिति (Nolan Committee) ने सिविल सेवकों के लिए जिन मूलभूत नैतिक मूल्यों को रेखांकित किया है, उनमें 'सहनशीलता' (Tolerance) अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रशासनिक संदर्भ में सहनशीलता का अर्थ केवल विरोधी या भिन्न विचारों को निष्क्रिय रूप से 'बर्दाश्त' करना नहीं है, बल्कि समाज के सभी वर्गों के प्रति सम्मान, वस्तुनिष्ठता और संवेदनशीलता प्रदर्शित करना है।
भारतीय प्रशासनिक संदर्भ में 'सहनशीलता' की वैचारिक रूपरेखा
एक सिविल सेवक के लिए सहनशीलता वह नैतिक आधार है जो संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित 'बंधुत्व' (Fraternity) और 'व्यक्ति की गरिमा' को यथार्थ में परिवर्तित करता है। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, "हमें केवल सहिष्णु ही नहीं होना चाहिए, बल्कि हर मार्ग को सत्य मानकर उसका सम्मान करना चाहिए।" जब एक प्रशासक इस दर्शन को आत्मसात करता है, तो वह व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों (Personal Biases) से मुक्त होकर लोक कल्याण के लिए कार्य करता है।
भारतीय विविधता को संरक्षित करने हेतु प्रशासकों में सहनशीलता की अनिवार्यता
भारतीय समाज के जटिल ताने-बाने को अक्षुण्ण रखने के लिए प्रशासकों में सहनशीलता का गुण निम्नलिखित बहुआयामी (PESTLE) दृष्टिकोण से आवश्यक है:
संवैधानिक एवं राजनीतिक आयाम (Constitutional & Political)
अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा: भारत का संविधान अनुच्छेद 25 से 30 के तहत धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति और धर्म को अबाध रूप से मानने का मौलिक अधिकार देता है। एक सहिष्णु प्रशासक बहुसंख्यकवाद (Majoritarianism) की प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाकर इन संवैधानिक गारंटियों की रक्षा करता है।
लोकतांत्रिक असहमति (Democratic Dissent) का सम्मान: लोकतंत्र में भिन्न मतों और शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों का होना स्वाभाविक है। सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में स्पष्ट किया है कि असहमति लोकतंत्र का 'सेफ्टी वाल्व' है। एक सहिष्णु प्रशासक विरोध को बलपूर्वक कुचलने (Coercion) के बजाय संवाद (Persuasion) और अनुनय का मार्ग अपनाता है।
सामाजिक एवं सांस्कृतिक सामंजस्य (Social & Cultural)
सांप्रदायिक सौहार्द का प्रबंधन: भारत में धार्मिक जुलूसों, त्योहारों या संवेदनशील अंतर्जातीय/अंतरधार्मिक मुद्दों के दौरान अक्सर तनाव की स्थिति उत्पन्न होती है। ऐसे संकट के समय, प्रशासक की सहिष्णुता, निष्पक्षता (Impartiality) और भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) दंगों को रोकने तथा सामाजिक पूंजी (Social Capital) को बनाए रखने में निर्णायक होती है।
बहुलवाद का संरक्षण: जनजातीय समुदायों (STs), भाषाई अल्पसंख्यकों और हाशिए पर स्थित अन्य समूहों की विशिष्ट जीवनशैली को सम्मान देना एक सहिष्णु प्रशासन की पहचान है, जो 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' की राष्ट्रीय भावना को सुदृढ़ करता है।
आर्थिक एवं विकासात्मक आयाम (Economic & Developmental)
समावेशी विकास (Inclusive Growth): 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' का लक्ष्य तभी प्राप्त किया जा सकता है जब नीतियां लागू करने वाला तंत्र समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति (अंत्योदय) के प्रति सहिष्णु हो।
वैश्विक विकास लक्ष्यों की प्राप्ति: एक सहिष्णु प्रशासनिक व्यवस्था सतत विकास लक्ष्य-10 (SDG-10: असमानताओं में कमी) और SDG-16 (शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) को धरातल पर उतारने के लिए अपरिहार्य है।
प्रशासनिक एवं विधिक आयाम (Administrative & Legal)
निर्णय-निर्माण में वस्तुनिष्ठता (Objectivity): प्रशासक की अपनी व्यक्तिगत धार्मिक, राजनीतिक या वैचारिक मान्यताएं हो सकती हैं। परंतु, सार्वजनिक ड्यूटी के दौरान सहनशीलता उसे अपनी मान्यताओं को किनारे रखकर विशुद्ध रूप से 'लॉ ऑफ द लैंड' (Law of the Land) और लोकहित के आधार पर निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करती है।
कमजोर वर्गों के प्रति समानुभूति (Empathy): सहिष्णुता समानुभूति की पूर्व शर्त है। जब एक प्रशासक भिन्नताओं को स्वीकार करता है, तभी वह महिलाओं, दिव्यांगों (PWDs) और LGBTQ+ समुदाय की विशिष्ट समस्याओं को समझकर उनके विधिक अधिकारों (जैसे नवतेज सिंह जौहर वाद में स्थापित अधिकार) को सुनिश्चित कर सकता है।
आगे की राह
विविधता भारत की कमजोरी नहीं, बल्कि इसकी सबसे बड़ी 'सॉफ्ट पावर' (Soft Power) है। एक असहिष्णु और पूर्वाग्रही प्रशासन इस विविधता को विखंडन और सामाजिक अस्थिरता में बदल सकता है, जबकि एक सहिष्णु प्रशासन इसे राष्ट्रीय एकीकरण के मजबूत सूत्र में पिरोता है।
प्रशासनिक प्रशिक्षण (जैसे- मिशन कर्मयोगी) में मूल्य-आधारित केस स्टडीज और संवेदनशीलता प्रशिक्षण (Sensitivity Training) को और अधिक गहराई से एकीकृत किया जाना चाहिए। जब लोक सेवक सहनशीलता, करुणा और संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) के साथ कार्य करेंगे, तभी भारत 'वसुधैव कुटुंबकम' के अपने शाश्वत दर्शन को चरितार्थ करते हुए एक सशक्त, समरस और समावेशी 'नव भारत 2047' (New India 2047) के निर्माण के अपने परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगा।