मीडिया एथिक्स (Media Ethics) क्या है? टीआरपी (TRP) की होड़ ने पत्रकारिता के मूल्यों को कैसे प्रभावित किया है?

 Q. मीडिया एथिक्स (Media Ethics) क्या है? टीआरपी (TRP) की होड़ ने पत्रकारिता के मूल्यों को कैसे प्रभावित किया है?

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लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ के रूप में मीडिया की भूमिका केवल सूचना संप्रेषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनमत निर्माण और सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक सशक्त माध्यम है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) से शक्ति प्राप्त करने वाला मीडिया जब अपने नैतिक दायित्वों से विमुख होता है, तो यह संपूर्ण लोकतांत्रिक ढांचे के लिए संकट उत्पन्न करता है। हालिया 'विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक' (World Press Freedom Index) और एडलमैन ट्रस्ट बैरोमीटर जैसी रिपोर्टें मीडिया की गिरती विश्वसनीयता और नैतिक पतन की ओर स्पष्ट संकेत करती हैं, जिसके मूल में 'टीआरपी' (TRP) का अनियंत्रित व्यावसायीकरण निहित है।

मीडिया एथिक्स (Media Ethics) की वैचारिक रूपरेखा

मीडिया एथिक्स या पत्रकारिता का नीतिशास्त्र उन नैतिक सिद्धांतों, नियमों और मानकों का समुच्चय है जो पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के आचरण को निर्देशित करता है। इसका मुख्य उद्देश्य सूचना की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करना है।

इसके मूलभूत स्तंभ निम्नलिखित हैं:

  • सत्यता और सटीकता (Truth and Accuracy): तथ्यों को बिना किसी तोड़-मरोड़ के, उनके मूल संदर्भ में जनता के समक्ष प्रस्तुत करना।

  • वस्तुनिष्ठता और निष्पक्षता (Objectivity and Fairness): समाचार और विचारों (News and Views) के बीच स्पष्ट विभाजन रखना तथा सभी पक्षों को समान अवसर देना।

  • स्वतंत्रता (Independence): राजनीतिक, कॉर्पोरेट या किसी भी प्रकार के निहित स्वार्थों (Vested Interests) से मुक्त होकर कार्य करना।

  • निजता और गरिमा का सम्मान: अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) का सम्मान करते हुए संवेदनशील मामलों में पीड़ितों की पहचान और निजता की रक्षा करना।

टीआरपी (TRP) की होड़ और पत्रकारिता के मूल्यों पर इसका प्रभाव

टेलीविजन रेटिंग पॉइंट (TRP) मुख्य रूप से विज्ञापन राजस्व (Advertising Revenue) निर्धारित करने का एक मीट्रिक है। इस विशुद्ध व्यावसायिक मीट्रिक ने पत्रकारिता को एक 'सार्वजनिक सेवा' से 'मुनाफा-संचालित कमोडिटी' में बदल दिया है। इसका बहुआयामी (PESTLE) प्रभाव निम्नलिखित है:

1. राजनीतिक एवं विधिक प्रभाव (Political & Legal Impact)

  • 'मीडिया ट्रायल' (Trial by Media) की प्रवृत्ति: TRP बढ़ाने के लिए मीडिया संस्थान स्वयं अन्वेषक, अभियोजक और न्यायाधीश की भूमिका निभाने लगे हैं। यह न्यायशास्त्र के मूल सिद्धांत 'दोष सिद्ध होने तक निर्दोष' (Innocent until proven guilty) का सीधा उल्लंघन है।

  • लोकतांत्रिक विमर्श का पतन: गंभीर नीतिगत मुद्दों (शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था) के बजाय राजनीतिक बयानबाजी और 'विषाक्त पैनल चर्चाओं' (Toxic Panel Debates) को प्राथमिकता दी जा रही है, जो राजनीतिक ध्रुवीकरण को तीव्र करता है।

2. सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव (Social & Cultural Impact)

  • सनसनीखेज और पीत पत्रकारिता (Yellow Journalism): दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए भय, घृणा और उत्तेजना पैदा करने वाली खबरों का प्रसारण बढ़ गया है।

  • सांप्रदायिक सौहार्द पर प्रहार: कई बार टीआरपी-चालित समाचार कवरेज समाज में सांप्रदायिक और जातीय दरार (Social Cleavages) उत्पन्न करती है, जो अनुच्छेद 15 की भावना और राष्ट्रीय एकता के लिए अत्यंत घातक है।

3. आर्थिक एवं तकनीकी प्रभाव (Economic & Technological Impact)

  • कॉर्पोरेट एकीकरण (Corporatization) और 'पेड न्यूज़': मीडिया घरानों का बड़े कॉर्पोरेट समूहों के साथ गठजोड़ समाचारों की निष्पक्षता को समाप्त कर रहा है। 'पेड न्यूज़' (Paid News) जैसी कुप्रथाएं इसी व्यावसायिक दबाव का परिणाम हैं।

  • एल्गोरिदम और 'इको-चैंबर' (Echo Chambers): डिजिटल मीडिया में क्लिकबेट (Clickbait) संस्कृति ने टीआरपी की होड़ को और आक्रामक बना दिया है, जहाँ सत्य की कीमत पर 'वायरल' होने की होड़ लगी है।

संस्थागत प्रतिक्रिया और विनियामक चुनौतियाँ

  • दंतविहीन संस्थाएं: भारतीय प्रेस परिषद (PCI) और न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (NBDSA) जैसी संस्थाओं के पास दंडात्मक शक्तियों का अभाव है।

  • द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि अनियंत्रित और अनैतिक मीडिया सुशासन (Good Governance) के मार्ग में एक बड़ी बाधा है।

आगे की राह: समाधान और सुधारात्मक उपाय

टीआरपी की अंधाधुंध दौड़ से पत्रकारिता को बचाने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:

  • 'सह-विनियमन' (Co-regulation) का मॉडल: पूर्ण सरकारी नियंत्रण (जो सेंसरशिप का रूप ले सकता है) और विफल स्व-नियमन (Self-regulation) के बीच का मार्ग अपनाते हुए वैधानिक समर्थन प्राप्त एक स्वतंत्र नियामक निकाय की स्थापना की जानी चाहिए, जिसे जुर्माना लगाने की शक्ति प्राप्त हो।

  • ब्रिटेन की 'लेवेसन इंक्वायरी' (Leveson Inquiry) से सीख: भारत में भी मीडिया नैतिकता के उल्लंघन पर सख्त कानूनी दिशा-निर्देश और स्वतंत्र ऑडिट तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।

  • वैकल्पिक राजस्व मॉडल: मीडिया को विज्ञापनदाताओं पर निर्भरता कम करने के लिए सब्सक्रिप्शन-आधारित (Subscription-based) और क्राउड-फंडेड (Crowd-funded) मॉडल्स को बढ़ावा देना चाहिए।

  • मीडिया साक्षरता (Media Literacy): नागरिकों को फेक न्यूज़ और सनसनीखेज सामग्री को पहचानने के लिए जागरूक करना आवश्यक है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता एक जागरूक और सत्य-निष्ठ सूचना तंत्र पर निर्भर करती है। मीडिया संस्थानों को यह समझना होगा कि उनकी वास्तविक पूंजी 'टीआरपी' (Television Rating Point) नहीं, बल्कि 'टीआरपी' (Trust, Reliability, and Public Interest) है। जब मीडिया अपने नैतिक दायित्वों का निर्वहन करेगा, तभी सतत विकास लक्ष्य-16 (SDG 16: शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) की प्राप्ति संभव होगी। एक पारदर्शी और जवाबदेह मीडिया ही 'अमृत काल' में भारत को एक परिपक्व और समावेशी 'नव भारत 2047' के रूप में स्थापित करने में उत्प्रेरक की भूमिका निभा सकता है।

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