समान नागरिक संहिता (UCC) के कार्यान्वयन से जुड़ी संवैधानिक और सामाजिक चुनौतियों की विवेचना करें।

 Q. समान नागरिक संहिता (UCC) के कार्यान्वयन से जुड़ी संवैधानिक और सामाजिक चुनौतियों की विवेचना करें।

Ans - 

भारतीय संविधान के भाग IV (नीति निदेशक तत्व) के अंतर्गत अनुच्छेद 44 राज्य को संपूर्ण भारतीय क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC) सुनिश्चित करने का निर्देश देता है। हाल ही में विभिन्न राज्यों (जैसे उत्तराखंड) द्वारा UCC विधेयक पारित करने और 22वें विधि आयोग द्वारा इस विषय पर सार्वजनिक विचार आमंत्रित करने से यह विमर्श पुनः केंद्र में आ गया है। UCC का मूल उद्देश्य विवाह, तलाक, विरासत, और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों में धर्म, लिंग या जाति से परे एक समान कानूनी ढांचा प्रदान करना है, जो संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDG) 5 (लैंगिक समानता) के आदर्शों को प्रतिध्वनित करता है।

हालांकि, एक आदर्श सिद्धांत होने के बावजूद, इसके कार्यान्वयन के समक्ष गंभीर संवैधानिक, विधिक और सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियां विद्यमान हैं।

UCC के कार्यान्वयन में संवैधानिक और विधिक चुनौतियां

संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत UCC का मार्ग कई अंतर्निहित विधिक विरोधाभासों से होकर गुजरता है:

1. मौलिक अधिकारों का द्वंद्व (Conflict of Fundamental Rights)

  • अनुच्छेद 25 और 26 बनाम अनुच्छेद 14 और 21: संविधान नागरिकों को अपने धर्म के अबाध आचरण और धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता देता है। कई समुदायों का तर्क है कि उनके 'पर्सनल लॉ' उनके धर्म का अभिन्न अंग हैं। UCC लागू करने से अंतःकरण की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) और समानता एवं गरिमा के अधिकार (अनुच्छेद 14 और 21) के बीच एक जटिल विधिक टकराव उत्पन्न होता है।

2. विशिष्ट संवैधानिक संरक्षण (Special Constitutional Protections)

  • संविधान के अनुच्छेद 371 (A से I) और छठवीं अनुसूची के तहत पूर्वोत्तर राज्यों (जैसे नागालैंड, मिजोरम) की जनजातीय आबादी के रीति-रिवाजों और प्रथागत कानूनों (Customary Laws) को विशेष संरक्षण प्राप्त है। संपूर्ण देश में एकसमान कानून लागू करने से इन संवैधानिक गारंटियों का सीधा उल्लंघन हो सकता है।

3. समवर्ती सूची और संघीय विखंडन (Federal Complexities)

  • विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे विषय संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List - प्रविष्टि 5) में आते हैं। यदि केंद्र एक राष्ट्रीय UCC नहीं लाता है और राज्य अपने-अपने अलग UCC (जैसे गोवा, उत्तराखंड) लागू करते हैं, तो कानूनों का भारी विखंडन होगा, जो 'राष्ट्रीय एकरूपता' के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देगा।

सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियां

भारत की विशाल जनसांख्यिकी में केवल 'कानूनी एकरूपता' थोपने से सामाजिक अस्थिरता उत्पन्न होने का जोखिम है:

1. सांस्कृतिक विविधता और बहुलवाद (Diversity & Pluralism)

  • भारत में केवल विभिन्न धर्मों के बीच ही नहीं, बल्कि एक ही धर्म के भीतर भी अपार विविधता है। उदाहरण के लिए, हिंदू कानून में भी क्षेत्रीय भिन्नताएं हैं (उत्तर भारत की 'मिताक्षरा' और बंगाल/असम की 'दायभाग' प्रणाली)। दक्षिण भारत में सपिंड (Sapinda) विवाह की जो प्रथा स्वीकार्य है, वह उत्तर भारत में वर्जित है। ऐसे में सभी के लिए एक मानक खोजना अत्यंत कठिन है।

2. अल्पसंख्यकों में विश्वास का संकट (Social Polarization)

  • राजनीतिकरण के कारण एक धारणा निर्मित हुई है कि UCC बहुसंख्यकवादी व्यवस्था हो सकती है। यह अल्पसंख्यकों की सांस्कृतिक पहचान (Cultural Identity) और जनसांख्यिकीय सुरक्षा की भावना को आहत कर सकता है, जिससे SDG 16 (शांति और समावेशी समाज) के समक्ष संकट उत्पन्न हो सकता है।

3. पितृसत्तात्मक संरचना (Patriarchal Mindset)

  • केवल कानूनों को संहिताबद्ध कर देने से लैंगिक न्याय सुनिश्चित नहीं होता। अधिकांश समुदायों के प्रथागत कानून गहराई से पितृसत्तात्मक हैं। एक ऐसा UCC जो लैंगिक रूप से तटस्थ न हो, वह केवल एक 'समान पितृसत्ता' को जन्म देगा।

संस्थागत दृष्टिकोण और न्यायिक विमर्श

आयामप्रमुख वाद (Landmark Judgments) एवं संस्थागत टिप्पणियां
शाह बानो वाद (1985)सर्वोच्च न्यायालय ने UCC को लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया ताकि विरोधाभासी विचारधाराओं को दूर कर राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा मिले।
सरला मुदगल वाद (1995)न्यायालय ने अनुच्छेद 44 के प्रति सरकार के दायित्वों को रेखांकित किया।
21वां विधि आयोग (2018)आयोग ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर UCC "न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय" (Neither necessary nor desirable)। इसने एकरूपता के बजाय व्यक्तिगत कानूनों में भेदभावपूर्ण प्रथाओं के क्रमिक सुधार (Piecemeal reform) की वकालत की।

आगे की राह

UCC का अंतिम लक्ष्य मात्र कानूनों की एकरूपता स्थापित करना नहीं, बल्कि न्याय की एकरूपता (Uniformity of Justice) सुनिश्चित करना होना चाहिए। 21वें विधि आयोग के सुझावों के अनुरूप, एक थोपी गई संहिता के बजाय 'नीचे से ऊपर' (Bottom-up) दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। सरकार को सभी हितधारकों—धार्मिक गुरुओं, नागरिक समाज और जनजातीय परिषदों—के बीच व्यापक संवाद स्थापित कर एक 'मॉडल कोड' का निर्माण करना चाहिए, जिसे अपनाना स्वैच्छिक हो।

'नया भारत 2047' का विजन एक ऐसे आधुनिक राष्ट्र की परिकल्पना करता है जहाँ नागरिक अधिकारों का संरक्षण धार्मिक या क्षेत्रीय पहचान से ऊपर हो। 'वसुधैव कुटुंबकम्' की मूल भावना को चरितार्थ करने के लिए भारत को अपनी आंतरिक सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करते हुए, संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) पर आधारित एक न्यायपूर्ण, समावेशी और लैंगिक रूप से संवेदनशील नागरिक संहिता की दिशा में क्रमिक कदम बढ़ाने होंगे।

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