चुनाव आयोग की स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में हालिया बदलावों की समीक्षा करें।
Q. चुनाव आयोग की स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में हालिया बदलावों की समीक्षा करें।
Ans -
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग (ECI) को देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव संपन्न कराने का व्यापक जनादेश प्रदान करता है। दशकों तक निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति कार्यपालिका (प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति) द्वारा की जाती रही, जिसमें स्पष्ट विधायी दिशा-निर्देशों का अभाव था। इस विधिक शून्यता को समाप्त करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) वाद में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया। इसके प्रत्युत्तर में संसद द्वारा 'मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023' पारित किया गया, जिसने नियुक्ति प्रक्रिया में आधारभूत परिवर्तन किए हैं।
नियुक्ति प्रक्रिया का नया वैधानिक ढांचा और संस्थागत परिवर्तन
नए अधिनियम ने नियुक्ति प्रक्रिया को दो-चरणीय प्रणाली में संरचित किया है। इसे सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम निर्देश और वर्तमान कानून के तुलनात्मक विश्लेषण (Institutional Review) से स्पष्ट किया जा सकता है:
| तुलना का आधार | अनूप बरनवाल वाद (सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश) | नया अधिनियम (2023) का प्रावधान |
| चयन समिति (Selection Committee) | प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (LoP) और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) | प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (LoP) और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री |
| खोज समिति (Search Committee) | कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं | कैबिनेट सचिव (Cabinet Secretary) की अध्यक्षता में गठित, जो चयन समिति को 5 नाम प्रस्तावित करेगी |
| पारदर्शिता और स्वायत्तता का स्तर | शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के अनुरूप | कार्यपालिका का स्पष्ट बहुमत (2:1 का अनुपात) |
हालिया परिवर्तनों का आलोचनात्मक मूल्यांकन (विधिक और राजनीतिक विश्लेषण)
नए अधिनियम के माध्यम से किए गए बदलावों ने संस्थागत संरचना को विधिक मान्यता तो दी है, परंतु इसकी स्वायत्तता को लेकर गंभीर विमर्श भी उत्पन्न किए हैं:
सकारात्मक पक्ष (सुदृढ़ीकरण की दिशा)
संवैधानिक शून्यता की समाप्ति (Legal & Constitutional): संविधान के अनुच्छेद 324(2) में अपेक्षित 'संसदीय कानून' का सात दशक बाद निर्माण होना विधायी जवाबदेही का एक सकारात्मक कदम है।
संस्थागत प्रक्रिया का मानकीकरण (Administrative): खोज समिति के गठन से मनमानी नियुक्तियों पर रोक लगेगी। यह समिति भारत सरकार के सचिव स्तर के अधिकारियों में से योग्य उम्मीदवारों का चयन करेगी, जो प्रशासनिक विशेषज्ञता सुनिश्चित करता है।
सेवा शर्तों की सुरक्षा: अधिनियम में यह स्पष्ट किया गया है कि निर्वाचन आयुक्तों का वेतन और भत्ते सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही रहेंगे, जो उन्हें वित्तीय और कार्यकारी दबावों से मुक्त रखता है।
चुनौतियां और चिंताएं (स्वायत्तता पर प्रभाव)
कार्यपालिका का वर्चस्व (Political Control): चयन समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री के होने से सरकार के पास 2:1 का बहुमत आ गया है। इससे 'नियंत्रण और संतुलन' (Checks and Balances) का सिद्धांत कमजोर होता है।
न्यायपालिका का निष्कासन: चयन प्रक्रिया से CJI को बाहर करने से चुनाव आयोग की तटस्थता के प्रति सार्वजनिक धारणा (Public Perception) नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकती है।
स्थानीय प्रशासन पर विश्वास का संकट (Social & Governance): चुनाव आयोग की पूर्ण निष्पक्षता केवल सैद्धांतिक आवश्यकता नहीं है। पटना और बिहार के सभी जिलों जैसे सघन आबादी वाले और राजनीतिक रूप से अति-सक्रिय क्षेत्रों में कई चरणों में होने वाले चुनावों के सफल प्रबंधन और शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण के लिए चुनाव मशीनरी पर जनता का अटूट विश्वास अनिवार्य है। कार्यपालिका के प्रत्यक्ष नियंत्रण की धारणा इस विश्वास को खंडित कर सकती है।
सुरक्षा का अभाव (Tenure Security): अधिनियम ने CEC को हटाने की प्रक्रिया (महाभियोग) तो बरकरार रखी है, परंतु अन्य निर्वाचन आयुक्तों (ECs) को अभी भी CEC की सिफारिश पर हटाया जा सकता है, जो टी.एन. शेषन वाद (1995) में उठाई गई चिंताओं का पूर्ण समाधान नहीं करता।
आगे की राह
स्वतंत्र चुनाव आयोग एक जीवंत लोकतंत्र की धमनियों में रक्त-संचार के समान है। संस्थागत स्वायत्तता को सुदृढ़ करने के लिए विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट तथा द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की सिफारिशों को लागू किया जाना चाहिए। चयन समिति में पूर्ण सर्वसम्मति (Unanimity) की आवश्यकता पर विचार किया जाना चाहिए, या फिर कार्यपालिका के प्रभाव को संतुलित करने के लिए एक स्वतंत्र प्रबुद्ध नागरिक या CJI को पुनः समिति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
'नया भारत 2047' (New India 2047) के विजन और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDG) 16 (शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) की प्राप्ति के लिए निर्वाचन आयोग का हर प्रकार के राजनीतिक प्रभाव से मुक्त होना अपरिहार्य है। 'वसुधैव कुटुंबकम्' का उद्घोष करने वाले विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की साख केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि उन चुनावों की असंदिग्ध निष्पक्षता और लोकतांत्रिक पवित्रता में निहित है।