दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) अपने मूल उद्देश्यों को प्राप्त करने में विफल रहा है। विश्लेषण करें।

 Q. दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) अपने मूल उद्देश्यों को प्राप्त करने में विफल रहा है। विश्लेषण करें।

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भारतीय राजनीतिक प्रणाली में 'आया राम, गया राम' की अवसरवादी संस्कृति पर अंकुश लगाने और दलीय अनुशासन सुनिश्चित करने हेतु 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से संविधान में 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) को शामिल किया गया था। इसका प्राथमिक उद्देश्य निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों द्वारा व्यक्तिगत लाभ के लिए दल बदलने की प्रवृत्ति को रोककर सरकारों को स्थायित्व प्रदान करना था। यद्यपि अपने प्रारंभिक वर्षों में इसने कुछ सीमा तक दलबदल को हतोत्साहित किया, परंतु समकालीन राजनीतिक घटनाक्रमों का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि यह कानून अपने मूल विजन को प्राप्त करने में काफी हद तक विफल रहा है।

दलबदल विरोधी कानून की विफलता: कारण एवं विश्लेषणात्मक मूल्यांकन

कानून के प्रावधानों में विद्यमान विधिक और संस्थागत कमियों ने इसे एक निवारक अस्त्र के बजाय, सत्ता-परिवर्तन के एक रणनीतिक उपकरण में बदल दिया है:

1. थोक दलबदल (Wholesale Defection) का वैधीकरण (Political & Legal)

  • 91वें संविधान संशोधन (2003) द्वारा 'विभाजन' (1/3 सदस्यों का अलग होना) को अवैध घोषित किया गया, परंतु 'विलय' (Merger - 2/3 सदस्यों का अन्य दल में जाना) को मान्यता दी गई।

  • राजनीतिक दलों ने इस विधिक छिद्र (Loophole) का उपयोग कर 'रिटेल' दलबदल के स्थान पर 'होलसेल' दलबदल को संस्थागत रूप दे दिया है।

2. पीठासीन अधिकारी (Speaker) की संदेहास्पद भूमिका (Governance & Institutional)

  • दलबदल के मामलों में अयोग्यता का अंतिम निर्णय सदन के अध्यक्ष पर निर्भर करता है, जो प्रायः सत्तारूढ़ दल के प्रति वफादार होते हैं।

  • निर्णय लेने की कोई समय-सीमा निर्धारित न होने के कारण अयोग्यता याचिकाएं वर्षों तक लंबित रहती हैं। किहोतो होलोहॉन वाद (1992) में यद्यपि न्यायालय ने अध्यक्ष के निर्णय को 'न्यायिक समीक्षा' के अधीन माना, परंतु निर्णय की प्रक्रिया में होने वाले राजनीतिक विलंब को नहीं रोक सका।

3. 'इस्तीफा और उपचुनाव' का मार्ग (The Resignation Route)

  • दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए विधायकों द्वारा एक नया तंत्र विकसित किया गया है। विधायक सामूहिक रूप से इस्तीफा देकर सदन की कुल संख्या कम कर देते हैं, जिससे सरकार अल्पमत में आ जाती है।

  • तत्पश्चात, वे दूसरे दल के समर्थन से उपचुनाव लड़कर पुनः निर्वाचित हो जाते हैं और मंत्री पद भी प्राप्त कर लेते हैं। यह प्रणाली सीधे तौर पर मतदाता के जनादेश का उपहास है।

4. आंतरिक दलीय लोकतंत्र का हनन (Social & Political)

  • सचेतक (Whip) का प्रत्येक छोटे-बड़े मुद्दे पर अनिवार्य अनुपालन जनप्रतिनिधियों को मात्र एक 'रबर स्टैंप' बना देता है।

  • यह निर्वाचित प्रतिनिधि के स्वतंत्र विचार रखने के अधिकार (अनुच्छेद 105) को बाधित करता है और रचनात्मक असहमति (Constructive Dissent) को दबाता है।

कानून को सशक्त बनाने हेतु अनुशंसित सुधार

दलबदल विरोधी कानून को प्रभावी बनाने के लिए विभिन्न समितियों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा महत्वपूर्ण विधिक सुधारों की अनुशंसा की गई है:

सुधार का क्षेत्रप्रमुख सिफारिशें और विधिक दृष्टिकोण
निर्णय प्राधिकारी में बदलावदिनेश गोस्वामी समिति (1990) और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के अनुसार, अयोग्यता का निर्णय अध्यक्ष के बजाय निर्वाचन आयोग की बाध्यकारी सलाह पर राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा लिया जाना चाहिए।
स्वतंत्र न्यायाधिकरणकेशम मेघचंद्र वाद (2020) में सर्वोच्च न्यायालय ने सुझाव दिया कि पीठासीन अधिकारी के स्थान पर सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र 'स्थायी न्यायाधिकरण' (Permanent Tribunal) गठित किया जाए।
ह्विप (Whip) का सीमित प्रयोगविधि आयोग (170वीं रिपोर्ट) के अनुसार, ह्विप का प्रयोग केवल अविश्वास प्रस्ताव, धन विधेयक या सरकार के अस्तित्व से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों तक ही सीमित होना चाहिए।
दंडात्मक प्रावधानसंविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग (NCRWC) की सिफारिश है कि दलबदल करने वाले सदस्य को कम से कम शेष कार्यकाल के लिए कोई भी मंत्री या सार्वजनिक पद धारण करने से अयोग्य घोषित किया जाए।

आगे की राह

दलबदल विरोधी कानून में मौजूद कमियों ने इसे 'दलबदल निवारक' के बजाय 'दलबदल प्रबंधक' का रूप दे दिया है। राजनीतिक दल संसदीय लोकतंत्र की धुरी हैं, परंतु उनका व्यवहार केवल विधिक प्रावधानों से नहीं, बल्कि 'संवैधानिक नैतिकता' (Constitutional Morality) द्वारा निर्देशित होना चाहिए।

'नया भारत 2047' (New India 2047) के विजन और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDG) 16 (शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) की प्राप्ति के लिए यह अनिवार्य है कि द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की भावना के अनुरूप इस कानून में तत्काल संरचनात्मक संशोधन किए जाएं। प्रतिनिधि लोकतंत्र में जनता के जनादेश की पवित्रता का संरक्षण ही सुशासन, पारदर्शी प्रशासन और राष्ट्रीय स्थिरता की अंतिम गारंटी है।

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