क्या भारत में 'एक देश, एक चुनाव' (One Nation, One Election) को लागू करना व्यावहारिक है? पक्ष और विपक्ष में तर्क दें।
Q. क्या भारत में 'एक देश, एक चुनाव' (One Nation, One Election) को लागू करना व्यावहारिक है? पक्ष और विपक्ष में तर्क दें।
'एक देश, एक चुनाव' (One Nation, One Election - ONOE) का तात्पर्य लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ, एक ही चक्र में संपन्न कराने से है। ऐतिहासिक रूप से भारत में 1952, 1957, 1962 और 1967 में चुनाव एक साथ ही हुए थे, परंतु बाद में विधानसभाओं के समय-पूर्व विघटन के कारण यह क्रम टूट गया। हाल ही में रामनाथ कोविंद समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट ने सुशासन, आर्थिक दक्षता और संवैधानिक रूपरेखा के संदर्भ में इस विमर्श को पुनर्जीवित कर दिया है।
'एक देश, एक चुनाव' के पक्ष में तर्क (सकारात्मक प्रभाव)
यह सुधार शासन-प्रशासन को कई मोर्चों पर सुदृढ़ कर सकता है:
आर्थिक दक्षता और विकास (Economic): बार-बार चुनाव कराने से राजकोष पर भारी दबाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त, आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct - MCC) के बार-बार लागू होने से नई विकास परियोजनाएं अवरुद्ध होती हैं। ONOE से चुनाव व्यय में व्यापक कमी आएगी।
प्रशासनिक सुगमता (Administrative): चुनाव प्रक्रिया में राज्य मशीनरी, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) और शिक्षकों की निरंतर तैनाती होती है। उदाहरणार्थ, पटना और बिहार के सभी जिलों जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में बार-बार चुनाव होने से संपूर्ण प्रशासनिक तंत्र और शैक्षणिक ढांचा लंबे समय तक पंगु बना रहता है; यह व्यवस्था इस समस्या का एक स्थायी समाधान प्रस्तुत करती है।
दीर्घकालिक नीति निर्माण (Political): निरंतर 'चुनावी मोड' (Perpetual election mode) में रहने से राजनीतिक दल लोकलुभावन (Populist) नीतियां अपनाते हैं। ONOE से सरकारों को दीर्घकालिक और कठोर संरचनात्मक सुधारों (जैसे श्रम या आर्थिक सुधार) को लागू करने के लिए निर्बाध 5 वर्ष का समय मिलेगा।
सामाजिक सद्भाव (Social): बार-बार होने वाले चुनावों में वोट-बैंक की राजनीति और ध्रुवीकरण के प्रयास सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाते हैं। एक साथ चुनाव इसे सीमित कर सतत विकास लक्ष्य (SDG) 16 (शांति और न्याय) को बढ़ावा देंगे।
विपक्ष में तर्क और संरचनात्मक चुनौतियां
इस व्यवस्था को लागू करने में कई संवैधानिक और राजनीतिक पेचीदगियां विद्यमान हैं:
संघीय ढांचे पर आघात (Federalism): भारत 'राज्यों का संघ' है। IDFC इंस्टीट्यूट के एक अध्ययन के अनुसार, एक साथ चुनाव होने पर 77% संभावना है कि मतदाता राष्ट्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर एक ही पार्टी को वोट दें। इससे राष्ट्रीय विमर्श के समक्ष क्षेत्रीय मुद्दे गौण हो सकते हैं, जो एस.आर. बोम्मई वाद (1994) में स्थापित संघीय ढांचे (संविधान का मूल ढांचा) के विरुद्ध है।
संवैधानिक और विधिक बाधाएं (Legal): इसे लागू करने के लिए अनुच्छेद 83 (संसद की अवधि), अनुच्छेद 85 (संसद का विघटन), अनुच्छेद 172 (विधानसभा की अवधि), और अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) में संशोधन की आवश्यकता होगी। साथ ही, आधे राज्यों का अनुसमर्थन (Ratification) भी अनिवार्य होगा।
लोकतांत्रिक जवाबदेही में कमी (Democratic Accountability): बार-बार चुनाव नेताओं को जनता के प्रति जवाबदेह बनाए रखते हैं। 5 साल में केवल एक बार चुनाव होने से जनप्रतिनिधियों की निरंतर जवाबदेही कम हो सकती है।
तकनीकी चुनौतियां (Technological): निर्वाचन आयोग (ECI) को बड़े पैमाने पर अतिरिक्त EVM और VVPAT मशीनों की आवश्यकता होगी, जिसका निर्माण, भंडारण और सुरक्षा एक अत्यंत जटिल कार्य है।
क्या यह व्यावहारिक है? (संभावित रूपरेखा)
इस नीति को लागू करने की व्यावहारिकता इसके विधिक सामंजस्य और चरणबद्ध क्रियान्वयन पर निर्भर है:
| क्रियान्वयन का तंत्र | विधिक और संस्थागत उपाय |
| चरणबद्ध चुनाव (Phased Synchronization) | लोकसभा और अधिकांश राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ, और अगले 100 दिनों के भीतर स्थानीय निकायों के चुनाव संपन्न कराना। |
| त्रिशंकु विधानसभा का समाधान | यदि सरकार बीच में गिर जाती है, तो नई सरकार केवल बचे हुए कार्यकाल (Remainder Term) के लिए गठित की जाए, ताकि चुनाव चक्र न टूटे। |
| अविश्वास प्रस्ताव का विकल्प | जर्मनी की भांति 'रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव' (Constructive Vote of No-Confidence) को अपनाना, जहाँ सरकार गिराने के साथ ही वैकल्पिक सरकार का गठन अनिवार्य हो। |
आगे की राह
'एक देश, एक चुनाव' का विचार भारतीय लोकतंत्र के परिपक्व होने का सूचक है, जो प्रशासनिक दक्षता को प्राथमिकता देता है। हालांकि, इसे राजनीतिक आम सहमति (Political Consensus) के बिना लागू करना भारतीय संघवाद की मूल भावना के लिए हानिकारक हो सकता है। विधि आयोग (Law Commission) और कोविंद समिति की सिफारिशों के अनुरूप, संविधान में आवश्यक संशोधन कर इसे क्रमिक रूप में लागू किया जाना चाहिए।
'नया भारत 2047' (New India 2047) के विजन के तहत एक विकसित राष्ट्र बनने के लिए यह आवश्यक है कि भारत का प्रशासनिक तंत्र चुनावी रैलियों के प्रबंधन के बजाय जन-कल्याण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर केंद्रित हो। एक सुव्यवस्थित चुनाव प्रणाली ही भारत को विश्व पटल पर एक सशक्त लोकतांत्रिक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर सकती है।