डीपफेक (Deepfake) तकनीक क्या है? यह लोकतंत्र और निजता के लिए खतरा कैसे है? बचाव के उपाय बताएं।

 Q. डीपफेक (Deepfake) तकनीक क्या है? यह लोकतंत्र और निजता के लिए खतरा कैसे है? बचाव के उपाय बताएं।

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डीपफेक (Deepfake) तकनीक: लोकतंत्र और निजता के समक्ष एक नवीन साइबर चुनौती

विश्व आर्थिक मंच (WEF) की 'वैश्विक जोखिम रिपोर्ट 2024' (Global Risks Report 2024) ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा जनित दुष्प्रचार और भ्रामक सूचनाओं (Misinformation and Disinformation) को वैश्विक स्थिरता के लिए सबसे गंभीर अल्पकालिक जोखिमों में से एक माना है। इसी परिप्रेक्ष्य में, 'डीपफेक' (Deepfake) तकनीक एक जटिल साइबर-खतरे के रूप में उभरी है, जो न केवल व्यक्तिगत अधिकारों का हनन करती है, बल्कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावी प्रक्रियाओं की बुनियाद पर भी प्रहार करती है।

डीपफेक तकनीक की अवधारणा

'डीपफेक' शब्द 'डीप लर्निंग' (Deep Learning) और 'फेक' (Fake) से मिलकर बना है। यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मशीन लर्निंग की एक उन्नत तकनीक है, जिसमें मुख्य रूप से जनरेटिव एडवरसेरियल नेटवर्क्स (GANs) का उपयोग किया जाता है।

  • इस तकनीक के माध्यम से किसी व्यक्ति के मूल ऑडियो या वीडियो को किसी अन्य व्यक्ति के दृश्य या स्वर के साथ इस तरह 'सुपरइम्पोज़' (Superimpose) किया जाता है कि वह पूर्णतः यथार्थ (Real) प्रतीत होता है।

  • वर्तमान में, ओपन-सोर्स AI टूल्स की सुलभता के कारण डीपफेक सामग्री का निर्माण अत्यंत तीव्र और लागत-प्रभावी हो गया है।

लोकतंत्र के लिए खतरा (Threat to Democracy)

लोकतंत्र की सफलता मतदाताओं की 'सत्य और तथ्य' तक अबाध पहुंच पर निर्भर करती है। डीपफेक निम्नलिखित रूपों में लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रहा है:

  • चुनावी प्रक्रिया में हेरफेर और दुष्प्रचार: चुनावों के दौरान राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के फर्जी वीडियो या ऑडियो (जैसे- झूठे भाषण या घृणास्पद बयान) प्रसारित किए जा सकते हैं। इससे रातों-रात जनमत को प्रभावित किया जा सकता है।

  • सामाजिक ध्रुवीकरण और कानून-व्यवस्था: डीपफेक के माध्यम से सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाले फर्जी दृश्य निर्मित किए जा सकते हैं।

  • बिहार के परिप्रेक्ष्य में चुनौती: बिहार एक सघन आबादी और राजनीतिक रूप से अत्यधिक जागरूक राज्य है। चुनाव के संवेदनशील चरणों के दौरान, पटना और बिहार के सभी जिलों में यदि कोई डीपफेक वीडियो वायरल होता है (जैसे किसी नेता का फर्जी घृणास्पद भाषण), तो यह न केवल आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) का उल्लंघन करेगा, बल्कि राज्य के दूरदराज के क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति उत्पन्न कर सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता की कमी इस दुष्प्रचार के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती है।

  • 'लायर्स डिविडेंड' (Liar's Dividend) की समस्या: डीपफेक की बढ़ती उपस्थिति के कारण, वास्तविक साक्ष्यों या सच्चे वीडियो को भी 'डीपफेक' बताकर खारिज करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिससे लोकतांत्रिक जवाबदेही से बचना आसान हो गया है।

निजता के लिए खतरा (Threat to Privacy)

सर्वोच्च न्यायालय ने पुट्टास्वामी वाद (2017) में निजता के अधिकार (Right to Privacy) को अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता) के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार घोषित किया है। डीपफेक इस अधिकार का सीधा और गंभीर उल्लंघन है:

  • पहचान की चोरी (Identity Theft) और वित्तीय धोखाधड़ी: साइबर अपराधी डीपफेक ऑडियो (वॉयस क्लोनिंग) का उपयोग करके बैंक अधिकारियों या परिजनों की नकल कर वित्तीय ठगी को अंजाम दे रहे हैं।

  • गरिमा का हनन और साइबर उत्पीड़न: महिलाओं और आम नागरिकों की तस्वीरों का उपयोग करके गैर-सहमति आधारित अश्लील सामग्री (Non-consensual pornography) का निर्माण किया जा रहा है। यह अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त 'गरिमामय जीवन के अधिकार' पर सीधा आघात है।

  • प्रतिष्ठा की क्षति (Reputational Damage): किसी भी व्यक्ति के कृत्रिम वीडियो बनाकर समाज में उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल किया जा सकता है, जिसकी भरपाई कानूनी प्रक्रियाओं के बाद भी पूर्णतः संभव नहीं होती।

बचाव और शमन के उपाय (Preventive Measures)

इस बहुआयामी खतरे से निपटने के लिए एक समन्वित रणनीति (Coordinated Strategy) की आवश्यकता है:

  • सशक्त विधिक और विनियामक ढांचा: वर्तमान में सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम 2000 (धारा 66D, 67) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) में धोखाधड़ी और मानहानि के प्रावधान हैं, परंतु डीपफेक के लिए एक विशिष्ट और कठोर कानून की आवश्यकता है। हाल ही में भारत सरकार द्वारा IT नियम 2021 के तहत सोशल मीडिया मध्यस्थों (Intermediaries) को 36 घंटे के भीतर ऐसी सामग्री हटाने का निर्देश दिया गया है।

  • तकनीकी समाधान (Technological Interventions): AI-जनित सामग्री पर अनिवार्य 'डिजिटल वॉटरमार्किंग' (Digital Watermarking) लागू की जानी चाहिए। इसके साथ ही, डीपफेक का पता लगाने वाले उन्नत 'डिटेक्शन एल्गोरिदम' और कंटेंट की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए ब्लॉकचेन (Blockchain) तकनीक का विकास करना होगा।

  • डिजिटल साक्षरता और तथ्य-जांच (Fact-Checking): नागरिकों के बीच मीडिया साक्षरता (Media Literacy) को बढ़ावा देना आवश्यक है। चुनाव आयोग और नागरिक समाज को मिलकर क्षेत्रीय भाषाओं में 'तथ्य-जांच नेटवर्क' (Fact-checking networks) को मजबूत करना चाहिए।

आगे की राह (Way Forward)

तकनीकी प्रगति को रोका नहीं जा सकता, परंतु इसके सुरक्षित उपयोग को विनियमित अवश्य किया जा सकता है। भारत को यूरोपीय संघ के 'AI एक्ट' (EU AI Act) की तर्ज पर जोखिम-आधारित दृष्टिकोण (Risk-based approach) अपनाते हुए एक व्यापक 'राष्ट्रीय AI कानून' का निर्माण करना चाहिए।

चूंकि इंटरनेट की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती, इसलिए इस चुनौती से निपटने के लिए 'ग्लोबल पार्टनरशिप ऑन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (GPAI) जैसे मंचों के माध्यम से एक अंतरराष्ट्रीय अभिसमय (International Convention) स्थापित करना अपरिहार्य है। एक प्रोएक्टिव प्रशासन, सशक्त न्यायपालिका और जागरूक नागरिक समाज का त्रिकोणीय सहयोग ही डीपफेक के खतरों को बेअसर कर भारत की लोकतांत्रिक गरिमा और नागरिकों की निजता को सुरक्षित रख सकता है।

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