शॉर्ट नोट्सः वैश्विक भुखमरी सूचकांक (GHI) और भारत की रैंक पर विवाद।
Q. शॉर्ट नोट्सः वैश्विक भुखमरी सूचकांक (GHI) और भारत की रैंक पर विवाद।
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वैश्विक भुखमरी सूचकांक (GHI) और भारत की रैंकिंग से संबंधित विवाद
भूमिका
हाल ही में जारी वैश्विक भुखमरी सूचकांक (GHI) 2023 में भारत को 125 देशों की सूची में 111वां स्थान प्राप्त हुआ है।
GHI की कार्यप्रणाली एवं प्रमुख संकेतक
यह सूचकांक 100-बिंदु के पैमाने पर गणना करता है। इसके आकलन के चार मुख्य आधार हैं:
अल्पपोषण (Undernourishment): अपर्याप्त कैलोरी ग्रहण करने वाली कुल जनसंख्या का अनुपात (कुल स्कोर का 1/3 भार)।
बाल दुर्बलता (Child Wasting): 5 वर्ष से कम आयु के वे बच्चे जिनका वजन उनकी ऊंचाई के अनुपात में कम है (1/6 भार)।
बाल ठिगनापन (Child Stunting): 5 वर्ष से कम आयु के वे बच्चे जिनकी ऊंचाई उनकी उम्र के अनुपात में कम है (1/6 भार)।
बाल मृत्यु दर (Child Mortality): 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर (1/3 भार)।
भारत सरकार की आपत्तियां एवं विवाद के मुख्य बिंदु
भारत ने GHI की वैज्ञानिकता और इसके सांख्यिकीय मॉडल पर कई गंभीर आपत्तियां दर्ज की हैं:
संकेतकों का असंतुलन (Methodological Flaws): सूचकांक के चार में से तीन संकेतक (ठिगनापन, दुर्बलता और मृत्यु दर) केवल 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के स्वास्थ्य से संबंधित हैं। सरकार का तर्क है कि बच्चों के स्वास्थ्य डेटा को पूरी आबादी की "भुखमरी" का संकेतक नहीं माना जा सकता।
अल्पपोषण मापने का अवैज्ञानिक तरीका: अल्पपोषण का आकलन गैलप वर्ल्ड पोल द्वारा संचालित 'खाद्य असुरक्षा अनुभव पैमाना' (FIES) पर आधारित है, जिसका नमूना आकार (Sample Size) मात्र 3,000 उत्तरदाताओं का था।
इतने छोटे नमूने के आधार पर पूरे राष्ट्र की स्थिति का आकलन करना सांख्यिकीय रूप से त्रुटिपूर्ण है। ठिगनेपन के बहुआयामी कारण: भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के अनुसार, बाल ठिगनापन और दुर्बलता केवल भुखमरी का परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह आनुवांशिकी (Genetics), पर्यावरण, और खराब स्वच्छता (Sanitation) जैसे जटिल कारकों का परिणाम है।
सरकारी आंकड़ों और योजनाओं की अनदेखी: रिपोर्ट में भारत के डिजिटल 'पोषण ट्रैकर' के रियल-टाइम डेटा की उपेक्षा की गई है। इसके अतिरिक्त, 'प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना' (PMGKAY) जैसी दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य सुरक्षा पहल के प्रभावों को भी नजरअंदाज किया गया है।
यथार्थ एवं वास्तविक चुनौतियां (NFHS-5 के आलोक में)
यद्यपि GHI की कार्यप्रणाली दोषपूर्ण हो सकती है, परंतु राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि देश में पोषण संबंधी कुछ गंभीर चुनौतियां अब भी विद्यमान हैं। विशेषकर, महिलाओं और बच्चों में 'सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी' (Hidden Hunger) और एनीमिया एक विकराल समस्या है, जिस पर त्वरित नीतिगत सुधार की आवश्यकता है।
बिहार के संदर्भ में प्रासंगिकता एवं सुधारात्मक प्रयास
NFHS-5 के अनुसार, बिहार में बाल ठिगनापन (42.9%) और दुर्बलता (22.9%) राष्ट्रीय औसत से अधिक है। इस गंभीर जनसांख्यिकीय चुनौती से निपटने के लिए राज्य सरकार का दृष्टिकोण अब अत्यंत व्यापक और विकेंद्रीकृत हो चुका है:
संस्थागत प्रसार: कुपोषण के उन्मूलन हेतु पटना और बिहार के सभी जिलों में समेकित बाल विकास सेवाओं (ICDS) और आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से 'पूरक पोषण कार्यक्रम' (THR) को प्राथमिकता के आधार पर लागू किया जा रहा है।
सामुदायिक भागीदारी: 'जीविका' (Jeevika) दीदियों के माध्यम से ग्रामीण स्तर पर आहार विविधता (Dietary Diversity) और मातृ स्वास्थ्य के प्रति जन-जागरूकता को मजबूती प्रदान की जा रही है।
आगे की राह (Way Forward)
डेटा संप्रभुता (Data Sovereignty): भारत को अपनी स्वयं की 'राष्ट्रीय पोषण सूचकांक' विकसित करनी चाहिए, जो भारतीय भौगोलिक और आनुवांशिक मानकों के अनुकूल हो।
समेकित नीतिगत दृष्टिकोण: पोषण अभियान 2.0 (Poshan 2.0) के तहत केवल कैलोरी आधारित आहार के स्थान पर फोर्टिफाइड (Fortified) चावल, मोटे अनाजों (Millets) और सूक्ष्म पोषक तत्वों के वितरण पर जोर दिया जाना चाहिए।
स्वच्छता एवं पोषण का एकीकरण: स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन के साथ पोषण पहलों का पूर्ण अभिसरण सुनिश्चित किया जाए।
अंतिम विचार
वैश्विक भुखमरी सूचकांक की भ्रामक रैंकिंग से इतर, भारत का मूल लक्ष्य संविधान के अनुच्छेद 47 में निहित राज्य के दायित्वों—पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा करना—को पूर्ण करना होना चाहिए। किसी बाह्य सूचकांक के प्रति प्रतिक्रियात्मक रुख अपनाने के बजाय, अपनी घरेलू खाद्य सुरक्षा नीतियों को वैज्ञानिक और परिणाम-उन्मुख बनाकर ही एक स्वस्थ और 'कुपोषण-मुक्त भारत' के संकल्प को यथार्थ में बदला जा सकता है।
क्या आपको लगता है कि वैश्विक सूचकांकों के निर्माण में 'ग्लोबल साउथ' (Global South) के देशों की विशिष्ट भौगोलिक और सामाजिक वास्तविकताओं को सम्मिलित करने के लिए इन अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के शासन ढांचे में लोकतांत्रिक सुधार की आवश्यकता है?
यह वीडियो 2023 के सूचकांक में भारत की रैंकिंग के पीछे की कार्यप्रणाली संबंधी खामियों और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा उठाए गए आक्षेपों को संक्षिप्त रूप में स्पष्ट करता है।