ग्लोबल साउथ (Global South) का नेतृत्व करने में भारत की भूमिका और इसके समक्ष चुनौतियों की विवेचना करें।

Q. ग्लोबल साउथ (Global South) का नेतृत्व करने में भारत की भूमिका और इसके समक्ष चुनौतियों की विवेचना करें।

Ans - 

ग्लोबल साउथ के नेतृत्वकर्ता के रूप में भारत: भूमिका एवं चुनौतियाँ

भूमिका

'ग्लोबल साउथ' (Global South) शब्द भौगोलिक से अधिक एक भू-राजनीतिक और आर्थिक संकल्पना है, जो मुख्य रूप से एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील, अल्पविकसित और नव-औद्योगिक देशों का प्रतिनिधित्व करता है। ऐतिहासिक रूप से इसे 'ब्रैंड्ट लाइन' (Brandt Line) के दक्षिण में स्थित देशों के रूप में परिभाषित किया गया है।

वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत, अपनी G20 अध्यक्षता और 'वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट' के सफल आयोजन के माध्यम से, इन हाशिए पर स्थित देशों की आवाज़ और एक स्वाभाविक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरा है। भारत का यह नेतृत्व प्रभुत्व पर नहीं, बल्कि 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास' की सहयोगी कूटनीति पर आधारित है।

ग्लोबल साउथ के नेतृत्व में भारत की बहुआयामी भूमिका

भारत ग्लोबल साउथ के देशों के लिए एक विकास भागीदार और वैश्विक मंचों पर उनका पैरोकार बनकर उभरा है। इसकी भूमिका को निम्नलिखित आयामों में समझा जा सकता है:

1. बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की वकालत (Advocacy for Multilateral Reforms)

  • वैश्विक वित्तीय और राजनीतिक वास्तुकला: भारत लगातार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), विश्व बैंक (World Bank) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के लोकतंत्रीकरण की मांग कर रहा है।

  • अफ्रीकी संघ का समावेशन: G20 में अफ्रीकी संघ (African Union) को स्थायी सदस्य के रूप में शामिल कराना भारत की कूटनीतिक जीत और ग्लोबल साउथ के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण है।

2. विकासशील देशों के लिए डिजिटल और तकनीकी सहयोग

  • डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI): भारत ने अपने सफल मॉडलों जैसे UPI (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस), CoWIN और आधार (Aadhaar) को 'इंडिया स्टैक' के माध्यम से ग्लोबल साउथ के देशों (जैसे मॉरीशस, श्रीलंका, यूएई) के साथ साझा किया है।

  • यह तकनीकी हस्तांतरण विकासशील देशों में वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दे रहा है।

3. जलवायु न्याय और पर्यावरण कूटनीति

  • भारत 'समान परंतु विभेदित उत्तरदायित्व' (CBDR) के सिद्धांत का प्रबल समर्थक है, जो यह सुनिश्चित करता है कि जलवायु परिवर्तन का आर्थिक बोझ विकासशील देशों पर न पड़े।

  • अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) और 'LiFE' (पर्यावरण के लिए जीवन शैली) जैसे पहलों के माध्यम से भारत जलवायु नेतृत्व प्रदान कर रहा है।

4. मानवीय सहायता और दक्षिण-दक्षिण सहयोग (South-South Cooperation)

  • प्रथम अनुक्रियाकर्ता (First Responder): कोविड-19 महामारी के दौरान 'वैक्सीन मैत्री', यमन और सूडान में बचाव अभियान, तथा तुर्किये-सीरिया भूकंप में 'ऑपरेशन दोस्त' ने भारत की मानवीय कूटनीति को स्थापित किया है।

  • क्षमता निर्माण: ITEC (Indian Technical and Economic Cooperation) कार्यक्रम और रियायती ऋण व्यवस्था (Line of Credit) के तहत अफ्रीका और एशिया के 160 से अधिक देशों को विकास सहायता प्रदान की जा रही है।

भारत के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

यद्यपि भारत ग्लोबल साउथ का एक मजबूत स्तंभ है, इसके नेतृत्व के मार्ग में कई भू-राजनीतिक और आर्थिक बाधाएं विद्यमान हैं:

चुनौती का क्षेत्रविस्तृत विवरण
चीन का आर्थिक प्रभुत्वचीन अपने 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) और 'चेकबुक कूटनीति' (Checkbook Diplomacy) के माध्यम से विकासशील देशों में भारी निवेश कर रहा है। भारत के पास चीन के समान असीमित वित्तीय संसाधन नहीं हैं।
घरेलू विकासात्मक सीमाएंभारत स्वयं एक विकासशील अर्थव्यवस्था है। देश के भीतर गरीबी, बुनियादी ढांचे की कमी और कुपोषण जैसी चुनौतियां हैं। विदेशी सहायता और घरेलू निवेश के बीच वित्तीय संतुलन साधना एक बड़ी चुनौती है।
ग्लोबल साउथ की विविधताग्लोबल साउथ कोई सजातीय (Homogeneous) समूह नहीं है। आसियान, अफ्रीकी संघ और खाड़ी देशों के अपने-अपने क्षेत्रीय अंतर्विरोध और परस्पर विरोधी हित हैं, जिन्हें एक मंच पर लाना जटिल है।
ग्लोबल नॉर्थ (पश्चिमी देशों) का असहयोगविकसित देशों द्वारा जलवायु वित्तपोषण (Climate Finance) के लिए प्रति वर्ष $100 बिलियन की प्रतिबद्धता का पूरा न होना और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में आनाकानी, ग्लोबल साउथ के विकास में बड़ी बाधा है।

बिहार के परिप्रेक्ष्य में 'ग्लोबल साउथ' कूटनीति की प्रासंगिकता

भारत की विदेश नीति और ग्लोबल साउथ के नेतृत्व में बिहार की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और विकासात्मक भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  • सॉफ्ट पावर और बौद्ध कूटनीति (Buddhist Diplomacy): बोधगया, नालंदा और राजगीर जैसी ऐतिहासिक धरोहरें भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया (आसियान) और श्रीलंका जैसे ग्लोबल साउथ देशों से सांस्कृतिक रूप से जोड़ती हैं। यह सॉफ्ट पावर भारत की विदेश नीति का एक मजबूत अस्त्र है।

  • साझा विकासात्मक चुनौतियाँ और मॉडल: बिहार का जलवायु परिवर्तन (विशेषकर उत्तरी बिहार में बाढ़ और कोसी का प्रभाव) और कृषि-संकट का अनुभव कई अफ्रीकी देशों के समान है। बिहार का महिला सशक्तिकरण और गरीबी उन्मूलन का 'जीविका (JEEViKA)' मॉडल ग्लोबल साउथ के गरीब देशों के लिए एक सफल केस स्टडी (Case Study) के रूप में निर्यात किया जा सकता है।

आगे की राह (Way Forward)

ग्लोबल साउथ के नेतृत्व को अधिक धारदार बनाने के लिए भारत को निम्नलिखित कदम उठाने की आवश्यकता है:

  1. वैकल्पिक वित्तीय तंत्र का विकास: ब्रिक्स (BRICS) के न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) जैसी संस्थाओं को सशक्त करना ताकि विकासशील देश पश्चिमी वित्तीय संस्थानों (IMF/World Bank) की शर्तों और चीन की 'ऋण-जाल कूटनीति' से बच सकें।

  2. नीति आयोग की तर्ज पर ज्ञान साझाकरण: भारत को अपनी विकास नीतियों और कृषि सुधारों को अन्य देशों के साथ साझा करने के लिए एक 'ग्लोबल साउथ सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' की स्थापना करनी चाहिए।

  3. बहु-गठबंधन (Multi-Alignment) नीति: भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) बनाए रखते हुए विकसित (Global North) और विकासशील (Global South) देशों के बीच एक सेतु (Bridge) के रूप में कार्य करना चाहिए।

उपसंहार

बदलती वैश्विक व्यवस्था में ग्लोबल साउथ अब केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि वैश्विक एजेंडे को आकार देने वाला एक सक्रिय भागीदार है। भारत इस समूह का नेतृत्व एक आधिपत्यवादी शक्ति (Hegemonic Power) के रूप में नहीं, बल्कि 'विश्वमित्र' की भूमिका में कर रहा है। 'वसुधैव कुटुंबकम्' के प्राचीन भारतीय दर्शन पर आधारित यह समावेशी नेतृत्व न केवल विकासशील देशों के अधिकारों की रक्षा करेगा, बल्कि एक अधिक न्यायसंगत, प्रतिनिधिक और संतुलित विश्व व्यवस्था के निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।

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