शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में भारत की भूमिका और इसके समक्ष चुनौतियों का वर्णन करें।

 Q. शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में भारत की भूमिका और इसके समक्ष चुनौतियों का वर्णन करें।

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शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में भारत: रणनीतिक भूमिका एवं चुनौतियाँ

भूमिका

शंघाई सहयोग संगठन (SCO), जिसे प्रायः 'यूरेशिया का सुरक्षा और आर्थिक केंद्र' माना जाता है, विश्व की लगभग 40% से अधिक आबादी और वैश्विक जीडीपी के लगभग एक-चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। वर्ष 2017 के अस्ताना शिखर सम्मेलन में पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल होने के पश्चात, भारत ने इस मंच के माध्यम से यूरेशियाई भू-भाग में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) और 'कनेक्ट सेंट्रल एशिया' नीति को नए आयाम प्रदान किए हैं। भारत के लिए SCO केवल एक क्षेत्रीय मंच नहीं, बल्कि सुरक्षा, ऊर्जा, व्यापार और भू-सामरिक संतुलन साधने का एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय तंत्र है।

SCO में भारत की बहुआयामी भूमिका एवं रणनीतिक महत्व

                 

1. सुरक्षा एवं आतंकवाद-रोधी तंत्र में सक्रिय भागीदारी

  • क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी संरचना (RATS): ताशकंद स्थित RATS के माध्यम से भारत सीमा पार आतंकवाद, अलगाववाद, नशीले पदार्थों की तस्करी (नार्को-टेररिज्म) और साइबर सुरक्षा के खतरों के विरुद्ध खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान करता है।

  • समान सुरक्षा प्रतिमान: भारत ने लगातार इस मंच पर आतंकवाद को किसी भी आधार पर न्यायोचित न ठहराने और आतंकवाद के वित्तपोषण (Terror Financing) पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का वैश्विक संदेश दिया है।

2. 'SECURE' दृष्टिकोण एवं संस्थागत नेतृत्व

वर्ष 2018 के क्विंगदाओ शिखर सम्मेलन में भारत द्वारा प्रस्तुत 'SECURE' विजन संगठन के उद्देश्यों के साथ गहराई से एकाकार हुआ है:

  • S – Security of our citizens (नागरिक सुरक्षा)

  • E – Economic development (आर्थिक विकास)

  • C – Connecting the region (क्षेत्रीय संपर्क)

  • U – Unite our people (जन-जन का जुड़ाव)

  • R – Respect for Sovereignty and Territorial Integrity (संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान)

  • E – Environment protection (पर्यावरण संरक्षण)

3. कनेक्टिविटी और वैकल्पिक व्यापार गलियारे

  • अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC): भारत पाकिस्तान के भू-भाग पर निर्भर रहे बिना मध्य एशिया तक सीधी पहुँच हेतु INSTC और ईरान स्थित चाबहार बंदरगाह को SCO के लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में एकीकृत करने पर बल देता है।

  • पारदर्शी अवसंरचना: भारत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी संपर्क परियोजना वित्तीय रूप से वहनीय, पारदर्शी और सदस्य देशों की संप्रभुता का सम्मान करने वाली होनी चाहिए।

4. ऊर्जा सुरक्षा एवं आर्थिक विविधता

  • मध्य एशियाई गणराज्यों (कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान) के पास समृद्ध हाइड्रोकार्बन, प्राकृतिक गैस और यूरेनियम के विशाल भंडार हैं, जो भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा एवं स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के लिए अपरिहार्य हैं।

5. बहुध्रुवीय संतुलन (Multi-alignment Diplomacy)

  • भारत एक ओर पश्चिमी मंचों (जैसे Quad) का सदस्य है, वहीं दूसरी ओर गैर-पश्चिमी मंचों (जैसे SCO और BRICS) में सक्रिय रहकर वैश्विक भू-राजनीति में रणनीतिक संतुलन बनाए रखता है।

भारत के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

आयामप्रमुख चुनौतियाँ
चीन-पाकिस्तान धुरीमंच का द्विपक्षीय हितों और भारत-विरोधी प्रचार हेतु दुरुपयोग का प्रयास; CPEC के माध्यम से संप्रभुता का उल्लंघन।
भौगोलिक अवरोधपाकिस्तान द्वारा भारत को पारगमन अधिकार (Transit Rights) न देना, जिससे मध्य एशिया तक स्थलीय पहुँच बाधित।
चीन का आर्थिक वर्चस्वSCO को पश्चिम-विरोधी मंच बनाने की बीजिंग की प्रवृत्ति तथा BRI को संगठन के आधिकारिक एजेंडे में थोपने का प्रयास।
रूस-चीन रणनीतिक निकटतायूक्रेन संघर्ष के बाद रूस की चीन पर बढ़ती आर्थिक-रणनीतिक निर्भरता, जिससे यूरेशियाई संतुलन प्रभावित।
अफगानिस्तान की अस्थिरतातालिबान शासित अफगानिस्तान से सीमा पार चरमपंथ और मादक पदार्थों की तस्करी का क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव।

बिहार एवं पूर्वी भारत के परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिकता

    

  • ऐतिहासिक एवं बौद्ध कूटनीति (Soft Power): प्राचीन काल में नालंदा और विक्रमशिला महाविहार मध्य एशिया और चीन के विद्वानों (जैसे ह्वेनसांग) के बौद्धिक आदान-प्रदान के प्रमुख केंद्र रहे हैं। भारत SCO में बौद्ध विरासत को सांस्कृतिक कूटनीति के रूप में उपयोग कर इस संबंध को पुनर्जीवित कर रहा है।

  • कृषि एवं उर्वरक सुरक्षा: बिहार जैसी सघन कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए मध्य एशिया से पोटाश और यूरिया के कच्चे माल का निरंतर आयात उर्वरक कीमतों को स्थिर रखने में सहायक है।

  • निर्यात क्षमता: INSTC के सुचारू होने से बिहार के जीआई-टैग प्राप्त उत्पादों (जैसे मिथिला मखाना, भागलपुरी सिल्क, शाही लीची) के लिए मध्य एशियाई बाजारों के द्वार खुल सकते हैं।

आगे की राह

  1. चाबहार का पूर्ण उपयोग: चाबहार बंदरगाह के 'शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल' को SCO के प्राथमिक पारगमन नेटवर्क में शामिल कराने हेतु कूटनीतिक दबाव बनाए रखना।

  2. डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) का विस्तार: भारत अपने UPI, आधार और डिजिटल हेल्थ मॉडल को SCO देशों के साथ साझा कर आर्थिक एकीकरण को गहरा कर सकता है।

  3. संप्रभुता पर अडिग रुख: किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता (विशेषकर गिलगित-बाल्टिस्तान/POK से गुजरने वाले गलियारों) के मुद्दे पर बिना समझौता किए भागीदारी सुनिश्चित करना।

  4. समान विचारधारा वाले मध्य एशियाई देशों से द्विपक्षीय मजबूती: संगठन के भीतर चीन के अत्यधिक प्रभाव को संतुलित करने के लिए मध्य एशियाई गणराज्यों के साथ द्विपक्षीय सामरिक व रक्षा सहयोग को सुदृढ़ करना।

उपसंहार

शंघाई सहयोग संगठन भारत के लिए यूरेशियाई भू-सामरिक पटल पर अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने का एक अनिवार्य मंच है। यद्यपि चीन-पाकिस्तान की उपस्थिति और भौगोलिक बाधाएँ चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं, तथापि अपनी रणनीतिक स्वायत्तता, 'वसुधैव कुटुंबकम्' की नीति और रचनात्मक कूटनीति के बल पर भारत SCO को टकराव के स्थान पर सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता का प्रभावी मंच बनाने में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।

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