गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों की विफलता के पीछे मुख्य प्रशासनिक कारण क्या हैं?
Q. गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों की विफलता के पीछे मुख्य प्रशासनिक कारण क्या हैं?
Ans -
नीति आयोग के 'राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक' (NMPI) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की रिपोर्टों से स्पष्ट होता है कि भारत ने पिछले एक दशक में करोड़ों लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला है। इसके बावजूद, एक बड़ी आबादी का अभी भी गरीबी और अभाव के दुष्चक्र में फंसे रहना, सतत विकास लक्ष्य-1 (SDG-1: शून्य गरीबी) और संविधान के अनुच्छेद 38 (कल्याणकारी राज्य की संकल्पना) के समक्ष एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है।
मनरेगा (MGNREGA), राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) जैसे विशाल कार्यक्रमों के बावजूद, वांछित परिणामों की प्राप्ति न होने का मुख्य कारण केवल वित्तीय संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि व्यवस्थागत और प्रशासनिक तंत्र की ढांचागत कमियां हैं।
गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों की विफलता के प्रमुख प्रशासनिक कारण
गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में मौजूद प्रशासनिक बाधाओं को निम्नलिखित आयामों के अंतर्गत विश्लेषित किया जा सकता है:
1. नीति निर्माण में केंद्रीकृत दृष्टिकोण (Centralized Policy Making)
'एक आकार सभी के लिए' (One-Size-Fits-All) की नीति: नीतियां प्रायः शीर्ष स्तर (Top-down approach) पर वातानुकूलित कक्षों में बनती हैं, जो भारत की भौगोलिक, जनांकिकीय और सामाजिक-आर्थिक विविधताओं की अनदेखी करती हैं।
माइक्रो-प्लानिंग का अभाव: स्थानीय स्तर की विशिष्ट आवश्यकताओं (जैसे जनजातीय क्षेत्रों की अलग मांग) को राष्ट्रीय स्तर की योजनाओं में समुचित स्थान नहीं मिल पाता, जिससे कार्यक्रम जमीनी हकीकत से कट जाते हैं।
2. संस्थागत क्षमता और अभिसरण का अभाव (Lack of Institutional Convergence)
विभागीय 'साइलोज़' (Departmental Silos): शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और कौशल विकास विभागों के मध्य समन्वय का घोर अभाव है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने इस प्रशासनिक विखंडन को गरीबी उन्मूलन में एक बड़ी बाधा माना है।
पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) का अशक्तीकरण: 73वें और 74वें संविधान संशोधन के बावजूद, स्थानीय निकायों के पास '3Fs' (Funds, Functions, and Functionaries) का अभाव है। प्रशासनिक अमले की कमी के कारण ग्राम पंचायतें योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में अक्षम रह जाती हैं।
3. लक्षित समूहों की पहचान में त्रुटियां (Targeting Errors)
अपवर्जन और समावेशन त्रुटियां (Exclusion and Inclusion Errors): प्रशासनिक अक्षमता और भ्रष्ट गठजोड़ के कारण वास्तविक और पात्र लाभार्थी (अति निर्धन) योजनाओं से बाहर रह जाते हैं (अपवर्जन), जबकि अपात्र लोग अनुचित लाभ उठा लेते हैं (समावेशन)।
डेटा का अपडेशन न होना और लाल फीताशाही (Red Tapism) इन त्रुटियों को और अधिक गहरा करते हैं।
4. वित्तीय कुप्रबंधन और लीकेज (Financial Mismanagement)
धन का विलंबित हस्तांतरण: प्रशासनिक जटिलताओं के कारण केंद्र से राज्यों और फिर लाभार्थियों तक धन पहुंचने में अत्यधिक विलंब होता है (जैसे मनरेगा मजदूरी में देरी), जो योजना के मूल उद्देश्य को विफल कर देता है।
भ्रष्टाचार और मध्यस्थों की भूमिका: शांता कुमार समिति ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में भारी लीकेज और भ्रष्टाचार को रेखांकित किया था, जो आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन (Supply Chain Management) में प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है।
5. निगरानी, मूल्यांकन और जवाबदेही तंत्र की विफलता (Monitoring & Accountability)
परिव्यय बनाम परिणाम (Outlays vs Outcomes): प्रशासनिक तंत्र का पूरा जोर आवंटित बजट को खर्च करने (Outlays) पर होता है, न कि गरीबी कम करने के वास्तविक परिणामों (Outcomes) पर।
सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) की उपेक्षा: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की कई रिपोर्टों में यह उजागर हुआ है कि प्रशासनिक असहयोग के कारण अधिकांश राज्यों में योजनाओं का स्वतंत्र सामाजिक अंकेक्षण या तो होता ही नहीं है, या महज एक औपचारिकता बनकर रह गया है।
प्रशासनिक विफलता के प्रभाव और संबंधित रिपोर्ट
| प्रशासनिक कारण | जमीनी प्रभाव | संबंधित समिति/रिपोर्ट के साक्ष्य |
| केंद्रीकृत दृष्टिकोण | स्थानीय आवश्यकताओं की अनदेखी | 2nd ARC (स्थानीय शासन पर रिपोर्ट) |
| लाभार्थियों की गलत पहचान | पात्र लोगों का योजना से वंचित होना | एन.सी. सक्सेना समिति (BPL जनगणना) |
| निगरानी का अभाव | धन का रिसाव एवं भ्रष्टाचार | CAG ऑडिट रिपोर्ट्स |
| विभागीय समन्वय की कमी | संसाधनों का दोहराव और अपव्यय | नीति आयोग मूल्यांकन रिपोर्ट |
आगे की राह (Way Forward)
प्रशासनिक जड़ता को दूर कर गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों को प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित बहुआयामी सुधारों की आवश्यकता है:
साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण (Evidence-Based Policy Making): बिग डेटा एनालिटिक्स (Big Data Analytics) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग करके लाभार्थियों की सटीक पहचान की जानी चाहिए।
JAM ट्रिनिटी का विस्तार: जन-धन, आधार और मोबाइल (JAM) तथा प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से मध्यस्थों को समाप्त कर लीकेज को शून्य स्तर पर लाया जाना चाहिए।
संस्थागत क्षमता निर्माण: मिशन कर्मयोगी के तहत जमीनी स्तर के नौकरशाहों (Frontline workers) और पंचायत प्रतिनिधियों के क्षमता निर्माण तथा संवेदनशीलता पर विशेष जोर दिया जाए।
परिणाम-आधारित निगरानी (Outcome-based Monitoring): नीति आयोग के आउटपुट-आउटकम मॉनिटरिंग फ्रेमवर्क (OOMF) को ग्राम पंचायत स्तर तक मजबूती से लागू किया जाना चाहिए तथा सामाजिक अंकेक्षण को अनिवार्य व स्वतंत्र बनाया जाए।
गरीबी उन्मूलन केवल एक कल्याणकारी कदम नहीं, बल्कि राष्ट्र की समग्र आर्थिक उत्पादकता को बढ़ाने की रणनीतिक आवश्यकता है। एक पारदर्शी, उत्तरदायी और जन-केंद्रित प्रशासनिक ढांचा ही योजनाओं को फाइलों से निकालकर धरातल पर उतार सकता है। इन प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से ही हम 'अंत्योदय' (अंतिम व्यक्ति का उदय) के दर्शन को साकार कर 'विकसित भारत @ 2047' के समावेशी और समृद्ध राष्ट्र के विजन को प्राप्त कर सकेंगे।