COP-28 में लिए गए प्रमुख निर्णयों और जलवायु वित्त (Climate Finance) की चुनौतियों का विश्लेषण करें।

 Q. COP-28 में लिए गए प्रमुख निर्णयों और जलवायु वित्त (Climate Finance) की चुनौतियों का विश्लेषण करें।

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संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के दुबई में आयोजित COP-28 (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज-28) जलवायु कूटनीति के इतिहास में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। यह पेरिस समझौते (2015) के बाद पहला सम्मेलन था, जिसमें 'वैश्विक स्टॉकटेक' (Global Stocktake) को अपनाया गया, जिसे 'यूएई आम सहमति' (UAE Consensus) के रूप में जाना जाता है,। इस सम्मेलन ने न केवल जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाने (Transitioning away from fossil fuels) का ऐतिहासिक आह्वाहन किया, बल्कि जलवायु कार्रवाई और जलवायु वित्त के मध्य बढ़ती खाई को भी वैश्विक पटल पर मजबूती से रेखांकित किया।

COP-28 में लिए गए प्रमुख ऐतिहासिक निर्णय

  • वैश्विक स्टॉकटेक (Global Stocktake - GST) का अंगीकरण: पेरिस समझौते के लक्ष्यों (तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित करना) की दिशा में प्रगति का आकलन करते हुए, पहली बार आधिकारिक दस्तावेज़ में "जीवाश्म ईंधन से योजनाबद्ध, न्यायसंगत और सुव्यवस्थित तरीके से दूर जाने" की बात शामिल की गई,।

  • हानि और क्षति कोष (Loss and Damage Fund) का संचालन: जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील और सुभेद्य विकासशील देशों को तत्काल वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए इस बहुप्रतीक्षित कोष को औपचारिक रूप से चालू (Operationalize) कर दिया गया है।

  • नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता (Renewable Energy): वर्ष 2030 तक वैश्विक स्तर पर नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को तीन गुना (Tripling) करने और ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency) सुधार की वैश्विक औसत वार्षिक दर को दोगुना करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया,।

  • वैश्विक अनुकूलन लक्ष्य (Global Goal on Adaptation - GGA): जलवायु प्रत्यास्थता (Climate Resilience) बढ़ाने के लिए जल, भोजन, स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र जैसे क्षेत्रों में अनुकूलन हेतु स्पष्ट लक्ष्यों के ढाँचे पर सहमति बनी।

  • भारत की विशिष्ट पहलें: भारत ने 'ग्लोबल रिवर सिटीज़ एलायंस' (GRCA), 'लीड-आईटी 2.0' (LeadIT 2.0) और पर्यावरण-अनुकूल स्वैच्छिक कार्यों को प्रोत्साहित करने के लिए 'हरित ऋण पहल' (Green Credit Initiative) जैसी महत्वपूर्ण शुरुआत की।

जलवायु वित्त (Climate Finance) से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ (आर्थिक और नीतिगत परिप्रेक्ष्य)

  • प्रतिबद्धता और आवश्यकता में अंतर (Funding Gap): विकसित देशों द्वारा वर्ष 2020 तक प्रतिवर्ष 100 बिलियन डॉलर प्रदान करने का वादा अभी भी पूरी तरह से पारदर्शी रूप में धरातल पर नहीं उतरा है, जबकि विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के लिए खरबों डॉलर (Trillions) की आवश्यकता है।

  • अनुदान बनाम ऋण का संकट (Grants vs. Loans): उपलब्ध जलवायु वित्त का एक बड़ा हिस्सा अनुदान के बजाय ऋण के रूप में दिया जा रहा है। यह प्रवृत्ति 'ग्लोबल साउथ' (Global South) के विकासशील देशों को जलवायु ऋण जाल (Climate Debt Trap) में धकेल रही है।

  • परिभाषा और 'दोहरी गिनती' (Definitional Ambiguity & Double Counting): 'जलवायु वित्त' की कोई मानकीकृत और सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत परिभाषा नहीं है। विकसित देश प्रायः आधिकारिक विकास सहायता (ODA) को ही जलवायु वित्त के रूप में पुनः प्रस्तुत कर देते हैं, जिससे निधियों की 'दोहरी गिनती' (Double Counting) की समस्या उत्पन्न होती है।

  • नया सामूहिक मात्रात्मक लक्ष्य (NCQG): वर्ष 2025 के बाद के लिए 'नए सामूहिक मात्रात्मक जलवायु वित्त लक्ष्य' (New Collective Quantified Goal) पर विकसित और विकासशील देशों के मध्य समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR-RC) के सिद्धांत को लेकर भारी मतभेद और अविश्वास बना हुआ है।

  • निजी क्षेत्र के वित्तपोषण का अभाव: विकासशील देशों में उच्च ब्याज दरों और विनियामक जोखिमों के कारण निजी निवेशक नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश करने से कतराते हैं। इसके अतिरिक्त, शमन (Mitigation) की तुलना में अनुकूलन (Adaptation) के लिए वैश्विक वित्त का प्रवाह अत्यंत न्यून है।

आगे की राह के रूप में, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे बहुपक्षीय विकास बैंकों (MDBs) में संरचनात्मक सुधार (Bretton Woods 2.0) किए जाने चाहिए, ताकि विकासशील देशों को रियायती और जोखिम-मुक्त वित्त प्राप्त हो सके। इसके साथ ही, जलवायु वित्त की एक पारदर्शी और सार्वभौमिक परिभाषा स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है।

जलवायु परिवर्तन एक साझा संकट है, जिसका समाधान केवल तभी संभव है जब विकसित देश ऐतिहासिक उत्तरदायित्व और जलवायु न्याय (Climate Justice) के सिद्धांतों का अक्षरशः पालन करें। भारत का 'पंचामृत' (2070 तक नेट-जीरो) और पर्यावरण के लिए जीवन शैली 'मिशन लाइफ' (LiFE) इस दिशा में एक अनुकरणीय वैश्विक मॉडल प्रस्तुत करते हैं। अंत्योदय से लेकर वैश्विक स्तर तक, जलवायु वित्त को केवल एक आर्थिक दायित्व न मानकर, 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (One Earth, One Family, One Future) के दर्शन के अनुरूप समग्र पृथ्वी के अस्तित्व की रक्षा हेतु एक निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए।

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