ई-कचरा (E-Waste) प्रबंधन भारत के लिए एक गंभीर चुनौती क्यों है? इसके सुरक्षित निपटान के उपाय सुझाएं।
Q. ई-कचरा (E-Waste) प्रबंधन भारत के लिए एक गंभीर चुनौती क्यों है? इसके सुरक्षित निपटान के उपाय सुझाएं।
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ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर (Global E-waste Monitor) रिपोर्ट के अनुसार, भारत चीन और अमेरिका के बाद दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट (ई-कचरा) का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। ई-कचरे के अंतर्गत वे सभी विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण (WEEE) आते हैं जिनका उपयोगी जीवन चक्र समाप्त हो चुका है। देश में तीव्र डिजिटलीकरण और उपभोक्तावाद के कारण ई-कचरे की मात्रा में घातांकीय (exponential) वृद्धि हुई है, जो पारिस्थितिकी और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक जटिल प्रशासनिक चुनौती बन गई है।
ई-कचरा प्रबंधन भारत के लिए गंभीर चुनौती क्यों है?
संरचनात्मक और आर्थिक चुनौतियाँ
असंगठित क्षेत्र का प्रभुत्व: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, भारत का 90-95% ई-कचरा असंगठित क्षेत्र (कबाड़ी वालों) द्वारा प्रबंधित किया जाता है। इनके पास वैज्ञानिक और सुरक्षित पुनर्चक्रण (Recycling) तकनीक का पूर्ण अभाव है।
शहरी और ग्रामीण अवसंरचना का अभाव: ई-कचरे के संग्रहण, परिवहन और सुरक्षित भंडारण के लिए संस्थागत आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) और वैज्ञानिक लैंडफिल का देशव्यापी अभाव है।
पर्यावरणीय और स्वास्थ्य (PESTLE: Environmental & Social)
विषाक्त रसायनों का रिसाव: अवैज्ञानिक निष्कर्षण (जैसे- तारों को खुले में जलाना या एसिड बाथ) से सीसा (Lead), पारा (Mercury), कैडमियम और पॉलीब्रोमिनेटेड डिफेनिल ईथर (PBDEs) जैसे घातक रसायन मिट्टी और भूजल में मिल जाते हैं, जिससे जैव-संचयन (Bioaccumulation) होता है।
व्यावसायिक स्वास्थ्य जोखिम: अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएँ और बच्चे शामिल हैं, को श्वसन संबंधी गंभीर बीमारियों, कैंसर और तंत्रिका तंत्र (Nervous System) की क्षति का सामना करना पड़ता है।
तकनीकी और विनियामक (Technological & Legal)
नियोजित अप्रचलन (Planned Obsolescence): कंपनियों द्वारा जानबूझकर ऐसे उपकरण बनाए जाते हैं जिनकी आयु कम होती है और जिन्हें अपग्रेड करना कठिन होता है, जिससे ई-कचरे का ढेर तेजी से बढ़ता है।
कानूनी क्रियान्वयन में शिथिलता: यद्यपि भारत ने ई-कचरा (प्रबंधन) नियम, 2022 लागू किया है, किंतु 'विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व' (Extended Producer Responsibility - EPR) लक्ष्यों की प्राप्ति और प्रवर्तन (Enforcement) जमीनी स्तर पर अत्यंत कमजोर है।
सुरक्षित निपटान और प्रबंधन के रणनीतिक उपाय
संस्थागत और विनियामक सुधार
EPR का कठोर अनुपालन: ई-कचरा (प्रबंधन) नियम, 2022 के तहत उत्पादकों और ब्रांडों को अपने उत्पादों के अंतिम निपटान के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी बनाना और ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से ऑडिटिंग को पारदर्शी करना।
'राइट टू रिपेयर' (Right to Repair) नीति: एक ऐसा कानूनी ढांचा विकसित करना जो उपभोक्ताओं को अपने उपकरणों की मरम्मत करने का अधिकार दे, जिससे इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का जीवनचक्र (Life-cycle) बढ़ाया जा सके।
तकनीकी नवाचार और चक्रीय अर्थव्यवस्था
शहरी खनन (Urban Mining) को प्रोत्साहन: ई-कचरे से सोना, चांदी, तांबा और 'रेयर अर्थ एलिमेंट्स' (Rare Earth Elements) जैसी मूल्यवान धातुओं को वैज्ञानिक रूप से निकालने की उन्नत स्वदेशी तकनीकों (R&D) में निवेश करना।
चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy): नीति आयोग के विजन के अनुरूप, 'टेक-मेक-डिस्पोज़' (Take-Make-Dispose) मॉडल से हटकर 'रेड्यूस-रियूज़-रीसायकल' (Reduce-Reuse-Recycle) दृष्टिकोण को अपनाना।
एकीकरण और क्षमता निर्माण
अनौपचारिक क्षेत्र का एकीकरण: असंगठित कबाड़ी वालों को कौशल प्रशिक्षण प्रदान कर, उन्हें अधिकृत रीसाइक्लिंग सुविधाओं (Formal Sector) के साथ जोड़ना (जैसे- 'करो संभव' - Karo Sambhav पहल)।
जागरूकता अभियान: ई-कचरे के उचित पृथक्करण (Segregation) और निपटान के लिए उपभोक्ता व्यवहार में परिवर्तन लाने हेतु 'स्वच्छ भारत अभियान' के तर्ज पर व्यापक जन-जागरूकता कार्यक्रम चलाना।
ई-कचरा केवल एक पर्यावरणीय संकट नहीं है, बल्कि संसाधनों के अनुत्पादक क्षरण का भी द्योतक है। ई-कचरे को कचरे के बजाय एक 'संसाधन' के रूप में देखकर इसके सुरक्षित निपटान को सुनिश्चित करना SDG 12 (जिम्मेदारीपूर्ण उपभोग और उत्पादन) की प्राप्ति के लिए अनिवार्य है। एक सुदृढ़ विनियामक तंत्र और 'पर्यावरण के लिए जीवन शैली' (मिशन LiFE) के साथ समन्वय स्थापित कर, भारत ई-कचरा प्रबंधन में एक वैश्विक मॉडल प्रस्तुत कर सकता है, जो 'विकसित भारत 2047' की धारणीय और हरित विकास यात्रा को सुनिश्चित करेगा।