मानव-वन्यजीव संघर्ष (Man-Animal Conflict) के कारणों का विवरण दें और इसके शमन की रणनीतियां बताएं।
Q. मानव-वन्यजीव संघर्ष (Man-Animal Conflict) के कारणों का विवरण दें और इसके शमन की रणनीतियां बताएं।
Ans -
विश्व वन्यजीव कोष (WWF) और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की हालिया संयुक्त रिपोर्ट "अ फ्यूचर फॉर ऑल" (A Future for All) के अनुसार, मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict - HWC) विश्व के जैव-विविधता संरक्षण के लिए सबसे गंभीर खतरों में से एक है। भारत में, जहाँ विश्व की 18% मानव आबादी, 75% बाघ और 60% एशियाई हाथी पाए जाते हैं, यह संघर्ष संसाधनों (भूमि और जल) के लिए प्रतिस्पर्धा का परिणाम है। यह न केवल वन्यजीवों के अस्तित्व को संकट में डालता है, बल्कि सतत विकास लक्ष्य (SDG 15: थल पर जीवन) की प्राप्ति में भी एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती प्रस्तुत करता है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष के प्रमुख कारण (बहुआयामी विश्लेषण)
मानव-वन्यजीव संघर्ष किसी एक कारक का परिणाम नहीं है, बल्कि यह पारिस्थितिक, आर्थिक और विकासात्मक नीतियों की विसंगतियों से उत्पन्न होता है:
| संघर्ष के कारण (Causes) | विवरण और प्रभाव (Details & Impacts) |
| आवास विखंडन (Habitat Fragmentation) | रैखिक अवसंरचना (Linear Infrastructure) जैसे राजमार्गों, रेलवे लाइन और नहरों के निर्माण से प्राकृतिक वन्यजीव गलियारों (Corridors) का कटना। |
| कृषि विस्तार और भूमि उपयोग | वन सीमाओं के समीप नकदी फसलों (जैसे गन्ना, केला) की खेती हाथियों और बाघों को आकर्षित करती है। (उदाहरण: वाल्मीकि टाइगर रिजर्व और संपूर्ण बिहार के सीमांत क्षेत्रों में बढ़ता संघर्ष)। |
| जलवायु परिवर्तन (Climate Change) | जंगलों में जल स्रोतों का सूखना, प्राकृतिक चारे की कमी और वनाग्नि (Forest Fires) की बढ़ती घटनाएं वन्यजीवों को मानव बस्तियों की ओर धकेल रही हैं। |
| पारिस्थितिक असंतुलन (Ecological Imbalance) | जंगलों में आक्रामक विदेशी प्रजातियों (Invasive Alien Species - जैसे लैंटाना कैमरा) के प्रसार से शाकाहारी जीवों के लिए भोजन की कमी होना। |
| जनसांख्यिकीय दबाव (Demographic Pressure) | संरक्षित क्षेत्रों के बफर ज़ोन (Buffer Zone) और इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) में मानव बस्तियों एवं रिसॉर्ट्स का बढ़ता अतिक्रमण। |
संघर्ष के व्यापक प्रभाव
आर्थिक और आजीविका की हानि: फसलों का बड़े पैमाने पर विनाश और पशुधन की क्षति, जो सीमांत किसानों को ऋण जाल में धकेलती है।
प्रतिशोधात्मक हत्याएं (Retaliatory Killings): आजीविका छिनने के आक्रोश में स्थानीय समुदायों द्वारा जहर देकर, बिजली के झटके (Electrocution) या फंदे (Snares) लगाकर वन्यजीवों की हत्या।
जूनोटिक रोगों का प्रसार: वन्यजीवों और मनुष्यों/पालतू जानवरों के मध्य बढ़ती निकटता से निपाह (Nipah) और रेबीज जैसे जूनोटिक रोगों (Zoonotic Diseases) के फैलने का खतरा बढ़ गया है।
शमन की रणनीतियां और समाधान (Mitigation Strategies)
मानव-वन्यजीव संघर्ष को पूर्णतः समाप्त करना संभव नहीं है, परंतु वैज्ञानिक और प्रशासनिक उपायों से इसे प्रबंधित किया जा सकता है:
तकनीकी और अवसंरचनात्मक उपाय (Technological & Structural)
पूर्व-चेतावनी प्रणाली (Early Warning Systems): हाथियों की आवाजाही को ट्रैक करने के लिए रेडियो कॉलर (Radio Collaring), ड्रोन निगरानी और सेंसर आधारित सायरन का उपयोग।
अवसंरचनात्मक अनुकूलन: राष्ट्रीय राजमार्गों पर वन्यजीवों के सुरक्षित मार्ग के लिए 'इको-ब्रिज' (Eco-bridges) या 'एनिमल अंडरपास' का निर्माण (जैसे NH-44 पर पेंच टाइगर रिजर्व के पास सफल मॉडल)।
प्लान बी (Plan Bee): रेलवे पटरियों पर हाथियों की मृत्यु रोकने के लिए पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे द्वारा अपनाई गई मधुमक्खियों की भिनभिनाहट वाली ध्वनि प्रणाली, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाना चाहिए।
नीतिगत और प्रशासनिक सुधार (Policy & Administrative)
त्वरित मुआवजा तंत्र: नौकरशाही की लालफीताशाही को कम करते हुए, प्रभावित किसानों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से 24-48 घंटों के भीतर उचित वित्तीय मुआवजा सुनिश्चित करना।
गलियारों की वैधानिक सुरक्षा: भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा चिन्हित हाथी और बाघ गलियारों (Corridors) को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत कानूनी संरक्षण प्रदान करना।
भूमि उपयोग योजना (Land-use Planning): वन क्षेत्रों के समीप ऐसी फसलों (जैसे मिर्च, नींबू या चाय) को बढ़ावा देना, जिन्हें जंगली जानवर खाना पसंद नहीं करते।
सामुदायिक सहभागिता (Community Participation)
क्षमता निर्माण: स्थानीय युवाओं को शामिल करते हुए 'गज मित्र' (Gaj Mitra) या 'प्राथमिक प्रतिक्रिया दल' (Primary Response Teams - PRT) का गठन करना, जो वन विभाग और ग्रामीणों के मध्य सेतु का कार्य करें।
संयुक्त वन प्रबंधन (JFM): स्थानीय समुदायों को वनों के संरक्षण से होने वाले आर्थिक लाभ (Eco-tourism) में भागीदार बनाना, जिससे उनका वन्यजीवों के प्रति दृष्टिकोण सकारात्मक हो सके।
आगे की राह (Way Forward)
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण संरक्षण का निर्देश देता है और अनुच्छेद 51A(g) प्रत्येक नागरिक का यह मूल कर्तव्य निर्धारित करता है कि वह वन्यजीवों के प्रति दया भाव रखे।
मानव और वन्यजीव एक-दूसरे के शत्रु नहीं, बल्कि एक ही पारिस्थितिकी तंत्र के अभिन्न अंग हैं। प्रबंधन की दिशा 'संघर्ष' (Conflict) से हटकर 'सह-अस्तित्व' (Co-existence) की ओर होनी चाहिए। 'प्रोजेक्ट टाइगर' और 'प्रोजेक्ट एलीफेंट' के हालिया एकीकरण की तर्ज पर एक समग्र 'राष्ट्रीय मानव-वन्यजीव संघर्ष न्यूनीकरण रणनीति' लागू करना समय की मांग है। यह दृष्टिकोण न केवल जैव-विविधता का संरक्षण करेगा, बल्कि 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (संपूर्ण पृथ्वी एक परिवार है) के शाश्वत मूल्य और 'विकसित भारत 2047' के समावेशी एवं धारणीय विकास के विजन को भी धरातल पर उतारेगा।