पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कैसे सुनिश्चित करता है?

 Q. पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कैसे सुनिश्चित करता है?

Ans - 

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) किसी प्रस्तावित परियोजना के पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक प्रभावों का पूर्वानुमान लगाने का एक वैधानिक उपकरण है। भारत में इसे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत वैधानिक ढांचा प्रदान किया गया है। रियो घोषणा (1992) के सिद्धांत 17 पर आधारित यह तंत्र, तीव्र आर्थिक विकास और पारिस्थितिक संरक्षण के मध्य संतुलन स्थापित कर सतत विकास (Sustainable Development) की आधारशिला रखता है।

विकास और पर्यावरण संरक्षण के मध्य संतुलन (बहुआयामी दृष्टिकोण)

EIA किसी भी विकासात्मक परियोजना को शून्य-प्रभाव वाला बनाने के बजाय, पारिस्थितिक क्षमता के भीतर कार्य करने के लिए 'शमन रणनीतियों' (Mitigation Strategies) को अनिवार्य बनाता है:

1. वैधानिक और संस्थागत संतुलन (Legal & Political)

  • एहतियाती सिद्धांत (Precautionary Principle): सर्वोच्च न्यायालय ने वेल्लोर सिटीजंस वेलफेयर फोरम मामले में स्पष्ट किया है कि पर्यावरण को अपूरणीय क्षति से बचाना विकास का पूर्व-आकलन होना चाहिए। EIA इसी सिद्धांत को व्यावहारिक रूप देता है।

  • नियामक अनुपालन: यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी परियोजना वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 और वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के वैधानिक मानदंडों का उल्लंघन न करे।

2. सामाजिक-आर्थिक और लोकतांत्रिक संतुलन (Social & Economic)

  • पर्यावरणीय लोकतंत्र: EIA की 'सार्वजनिक सुनवाई' (Public Hearing) प्रक्रिया स्थानीय समुदायों, ग्राम सभाओं और हितधारकों को निर्णय निर्माण में भागीदार बनाती है।

  • समावेशी विकास का मॉडल: उदाहरण के लिए, जब पटना मेट्रो या पूरे बिहार के सभी जिलों से गुजरने वाले नए एक्सप्रेस-वे और नदी-जोड़ो (जैसे कोसी-मेची) परियोजनाओं का निर्माण होता है, तो EIA विस्थापन, कृषि भूमि के नुकसान और स्थानीय आजीविका पर पड़ने वाले प्रभावों का अग्रिम आकलन कर पुनर्वास (R&R) नीतियों को सुदृढ़ करता है।

3. तकनीकी और पारिस्थितिक संतुलन (Technological & Environmental)

  • हरित तकनीक का प्रोत्साहन: EIA उद्योगों को कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीकों, अपशिष्ट प्रबंधन संयंत्रों (ETP) और चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को अपनाने के लिए विवश करता है।

  • वैकल्पिक मूल्यांकन: यदि किसी प्रस्तावित स्थल (जैसे- संवेदनशील आर्द्रभूमि) पर पारिस्थितिक लागत आर्थिक लाभ से अधिक है, तो EIA परियोजना को कम संवेदनशील क्षेत्र में स्थानांतरित करने का विकल्प प्रस्तुत करता है।

EIA प्रक्रिया में विद्यमान चुनौतियाँ

  • 'हितों का टकराव' (Conflict of Interest): परियोजना समर्थकों द्वारा ही EIA रिपोर्ट तैयार करने वाले सलाहकारों (Consultants) को नियुक्त किया जाता है, जिससे रिपोर्ट के पक्षपाती होने की संभावना बढ़ जाती है।

  • पोस्ट-फैक्टो क्लीयरेंस: सर्वोच्च न्यायालय ने एलेम्बिक फार्मास्यूटिकल्स (2020) मामले में कार्योत्तर (Post-facto) पर्यावरण मंजूरी को कानून के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध माना है, फिर भी ड्राफ्ट EIA 2020 में इसके प्रावधानों ने चिंताओं को बढ़ाया है।

  • सार्वजनिक सुनवाई में औपचारिकता: जटिल तकनीकी अंग्रेजी शब्दावली का प्रयोग और जन-भागीदारी को मात्र एक रस्म अदायगी समझना इसकी प्रभावशीलता को कम करता है।

आगे की राह (Way Forward)

EIA को मात्र एक प्रशासनिक बाधा के रूप में देखने के बजाय, इसे 'हरित विकास' (Green Growth) के उत्प्रेरक के रूप में देखा जाना चाहिए। टी.एस.आर. सुब्रमण्यम समिति की सिफारिशों के अनुरूप एक स्वतंत्र 'राष्ट्रीय पर्यावरण प्रबंधन प्राधिकरण' (NEMA) की स्थापना की जानी चाहिए, जो निष्पक्ष डेटा मूल्यांकन कर सके।

इसके अतिरिक्त, EIA रिपोर्टों को स्थानीय भाषाओं (जैसे मानक हिंदी) में अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि जन-भागीदारी सुनिश्चित हो सके। आर्थिक विकास और पर्यावरण के मध्य यह वैज्ञानिक संतुलन ही SDG 13 (जलवायु कार्रवाई) और SDG 15 (थल पर जीवन) को साकार करेगा, जो 'विकसित भारत 2047' के विजन और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (पृथ्वी ही परिवार है) के भारतीय दर्शन को फलीभूत करने के लिए अपरिहार्य है।

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