जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का पूरा लाभ उठाने के लिए भारत को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?

 Q. जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का पूरा लाभ उठाने के लिए भारत को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?

Ans - 

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) के अनुसार, जनसांख्यिकीय लाभांश से तात्पर्य उस आर्थिक विकास क्षमता से है जो जनसंख्या की आयु संरचना में बदलाव के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है, विशेषकर जब कार्यशील आयु (15-64 वर्ष) की जनसंख्या आश्रित जनसंख्या से अधिक हो जाती है। वर्तमान में, भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, जिसकी औसत आयु लगभग 28 वर्ष है। आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार, भारत के लिए यह जनसांख्यिकीय अवसर 2055-56 तक उपलब्ध रहेगा, जो इसे वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने का एक ऐतिहासिक अवसर प्रदान करता है।

जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ उठाने में प्रमुख चुनौतियाँ

1. आर्थिक चुनौतियाँ (रोजगार सृजन का संकट)

  • रोजगारविहीन संवृद्धि (Jobless Growth): भारतीय अर्थव्यवस्था का संरचनात्मक परिवर्तन कृषि से सीधे सेवा क्षेत्र में हुआ है, जिससे श्रम-गहन विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing Sector) पिछड़ गया है।

  • अनौपचारिक क्षेत्र का प्रभुत्व: भारत के कुल कार्यबल का लगभग 90% असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है, जहाँ सामाजिक सुरक्षा, नौकरी की स्थिरता और उचित वेतन का अभाव है।

  • मांग और आपूर्ति में बेमेल: उच्च आर्थिक विकास दर के बावजूद, अर्थव्यवस्था में प्रतिवर्ष प्रवेश करने वाले लाखों युवाओं के लिए पर्याप्त संख्या में गुणवत्तापूर्ण नौकरियों का सृजन नहीं हो पा रहा है।

2. शैक्षणिक एवं कौशल विकास संबंधी बाधाएं

  • कौशल का अभाव (Skill Deficit): इंडिया स्किल्स रिपोर्ट के अनुसार, भारत के केवल लगभग आधे स्नातक ही प्रत्यक्ष रूप से रोजगार के योग्य (Employable) हैं।

  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी: असर (ASER) रिपोर्ट लगातार स्कूली शिक्षा में मूलभूत पठन और गणितीय कौशल (Foundational Literacy and Numeracy) की भारी कमी को उजागर करती है।

  • व्यावसायिक प्रशिक्षण का निम्न स्तर: भारतीय कार्यबल के एक बहुत छोटे प्रतिशत (लगभग 5%) ने ही औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त किया है, जो विकसित देशों (जैसे दक्षिण कोरिया में 96%, जर्मनी में 75%) की तुलना में नगण्य है।

3. स्वास्थ्य और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ

  • कुपोषण और मानव पूंजी: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, भारत में अभी भी बच्चों में स्टंटिंग (35.5%) और वेस्टिंग (19.3%) की दर उच्च है। यह भविष्य की उत्पादकता और संज्ञानात्मक विकास को गंभीर रूप से बाधित करता है।

  • महिला श्रमबल भागीदारी (FLFP): आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के नवीनतम आंकड़ों में सुधार के बावजूद, महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी वैश्विक मानकों की तुलना में अभी भी कम है। महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के बिना वास्तविक जनसांख्यिकीय लाभांश प्राप्त करना असंभव है।

4. तकनीकी और भविष्योन्मुखी चुनौतियाँ

  • चौथी औद्योगिक क्रांति (Industry 4.0): कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स और स्वचालन (Automation) के कारण डेटा एंट्री, विनिर्माण और बीपीओ (BPO) जैसे क्षेत्रों में पारंपरिक नौकरियों के समाप्त होने का खतरा बढ़ गया है।

  • डिजिटल डिवाइड: ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों तथा लैंगिक आधार पर डिजिटल साक्षरता और ब्रॉडबैंड पहुंच में व्यापक असमानता है, जो अवसरों के समान वितरण को रोकता है।

जनसांख्यिकीय लाभांश को भुनाने हेतु रणनीतिक रूपरेखा (आगे की राह)

  • कौशल और शिक्षा का उन्नयन: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ-साथ STEM (विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग, गणित) शिक्षा और भविष्य के कौशल (Future Skills) पर जोर देना आवश्यक है।

  • विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन: रोजगार सृजन हेतु उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना के माध्यम से श्रम-गहन उद्योगों (जैसे कपड़ा, चमड़ा, खाद्य प्रसंस्करण) को व्यापक स्तर पर बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

  • स्वास्थ्य अवसंरचना में निवेश: मानव पूंजी निर्माण हेतु स्वास्थ्य बजट को जीडीपी के 2.5% (राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 का लक्ष्य) तक बढ़ाना और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का और अधिक विस्तार करना अनिवार्य है।

  • लैंगिक समानता और समावेशन: कार्यस्थलों को सुरक्षित और महिलाओं के अनुकूल बनाकर तथा 'केयर इकॉनमी' (Care Economy) को औपचारिक रूप देकर महिला कार्यबल भागीदारी को बढ़ाना होगा।

भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश कोई स्वतः प्राप्त होने वाला लाभ नहीं है, बल्कि यह एक सीमित समय-सीमा वाला अवसर है। यदि इस अवसर को गुणवत्तापूर्ण मानव पूंजी निवेश (Human Capital Investment) के माध्यम से समर्थन नहीं दिया गया, तो यह 'लाभांश' एक 'जनसांख्यिकीय आपदा' (Demographic Disaster) में बदल सकता है। सतत विकास लक्ष्यों (SDGs)—विशेषकर लक्ष्य 4 (गुणवत्तापूर्ण शिक्षा) और लक्ष्य 8 (उत्कृष्ट कार्य और आर्थिक वृद्धि)—के साथ राष्ट्रीय नीतियों को संरेखित करके ही भारत 'अमृत काल' में एक सशक्त, समावेशी और विकसित भारत @2047 के विजन को सफलतापूर्वक साकार कर सकता है।

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