भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' (Neighbourhood First) नीति के सामने मालदीव और नेपाल के संदर्भ में वर्तमान चुनौतियां क्या हैं?
Q. भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' (Neighbourhood First) नीति के सामने मालदीव और नेपाल के संदर्भ में वर्तमान चुनौतियां क्या हैं?
Ans -
भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' (Neighbourhood First) नीति का मूल उद्देश्य एक शांतिपूर्ण, स्थिर और समृद्ध परिधि (Periphery) का निर्माण करना है। 'सागर' (SAGAR - Security and Growth for All in the Region) के व्यापक दृष्टिकोण से निर्देशित इस नीति के बावजूद, हाल के वर्षों में भू-राजनीतिक उथल-पुथल और पड़ोसी देशों की घरेलू राजनीति ने गंभीर चुनौतियां प्रस्तुत की हैं।
मालदीव के संदर्भ में वर्तमान चुनौतियां
मालदीव हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए एक रणनीतिक "टोल गेट" (Toll Gate) के समान है, लेकिन इसके साथ संबंधों में बहुआयामी चुनौतियां मौजूद हैं:
1. राजनीतिक अस्थिरता और कूटनीतिक तनाव (Political)
'इंडिया आउट' अभियान का प्रभाव: मालदीव की घरेलू राजनीति में भारत-विरोध को एक चुनावी हथियार के रूप में प्रयोग किया गया। यद्यपि 2025-26 तक एक 'व्यावहारिक पुनर्निर्धारण' (Pragmatic Reset) देखा गया है, लेकिन 2024 में भारतीय सैन्य कर्मियों (विमानन विशेषज्ञों) की वापसी का दबाव और मालदीव के मंत्रियों द्वारा की गई विवादास्पद टिप्पणियां राजनीतिक संवेदनशीलता को दर्शाती हैं।
वैचारिक उतार-चढ़ाव: मालदीव की विदेश नीति में सरकार बदलने के साथ ही भारी अस्थिरता आती है, जिससे दीर्घकालिक द्विपक्षीय परियोजनाओं में बाधा उत्पन्न होती है।
2. चीन का बढ़ता रणनीतिक पदचिह्न (Geopolitical & Economic)
मालदीव में चीन का बढ़ता आर्थिक निवेश (जैसे हवाई अड्डा विस्तार और सिनामाले ब्रिज) और 'ऋण जाल' (Debt Trap) कूटनीति भारत के सामरिक हितों (SLOCs की सुरक्षा) के लिए एक सीधी चुनौती है।
मालदीव द्वारा भारत और चीन के मध्य संतुलन (Balancing act) बनाने का प्रयास भारत के लिए कूटनीतिक जटिलता पैदा करता है।
3. सुरक्षा और चरमपंथ (Social & Technological)
धार्मिक कट्टरपंथ: मालदीव में इस्लामिक स्टेट (IS) जैसे वैश्विक आतंकी समूहों के प्रभाव में वृद्धि हुई है, जो पूरे हिंद महासागर क्षेत्र की तटीय सुरक्षा के लिए खतरा है।
समुद्री सुरक्षा (Maritime Security): अवैध शिकार (IUU Fishing), समुद्री डकैती और मादक पदार्थों की तस्करी जैसी गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं।
नेपाल के संदर्भ में वर्तमान चुनौतियां
नेपाल के साथ भारत के 'रोटी-बेटी' के सांस्कृतिक संबंध रहे हैं, परंतु खुली सीमा और उभरते भू-राजनीतिक समीकरणों ने कई प्रशासनिक और सामरिक चुनौतियां उत्पन्न की हैं:
1. सीमा विवाद और कार्टोग्राफिक आक्रामकता (Legal & Political)
कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा विवाद: नेपाल द्वारा 1816 की सुगौली संधि की अपने अनुसार व्याख्या करते हुए नए राजनीतिक मानचित्र का प्रकाशन भारत की संप्रभुता संबंधी चिंताओं को बढ़ाता है।
1950 की शांति और मित्रता संधि: नेपाली समाज और राजनीतिक दलों का एक वर्ग इस ऐतिहासिक संधि को 'असमान' (Unequal) मानता है और इसमें संशोधन की निरंतर मांग करता है, जो विश्वास की कमी को दर्शाता है।
2. आंतरिक राजनीतिक तरलता (Internal Instability)
हाल ही में 2025 का 'जेन-जेड (Gen Z) आंदोलन' और 2026 के आम चुनावों के बाद उभरी नई राजनीतिक व्यवस्था ने भारत के लिए एक रणनीतिक निर्वात (Strategic Vacuum) पैदा कर दिया है।
पारंपरिक राजनीतिक अभिजात वर्ग के बजाय नए राजनीतिक परिदृश्य के साथ जुड़ना भारत के लिए एक नई चुनौती है।
3. सैन्य कूटनीति और गोरखा भर्ती (Defense)
भारतीय सेना में 'अग्निपथ योजना' के लागू होने के बाद से नेपाली गोरखाओं की पारंपरिक भर्ती प्रक्रिया बाधित हुई है। यह सैन्य कूटनीति के लिए एक झटका है और इस जनसांख्यिकीय शून्य का लाभ प्रतिस्पर्धी राष्ट्रों द्वारा उठाया जा सकता है।
4. चीन का आर्थिक एवं सामरिक हस्तक्षेप (Economic & Geopolitical)
चीन द्वारा 2026 के नेपाली चुनावों के लिए अनुदान देना और 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के तहत बुनियादी ढांचे का विस्तार, नेपाल की भू-रणनीतिक स्वायत्तता को प्रभावित कर रहा है, जिससे भारत की सुरक्षा चिंताएं (विशेषकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर के संदर्भ में) बढ़ रही हैं।
आगे की राह (Way Forward)
भारत को अपनी विदेश नीति में केवल प्रतिक्रियात्मक (Reactive) होने के बजाय अधिक सक्रिय, संस्थागत और लचीला (Resilient) दृष्टिकोण अपनाना होगा:
गुजराल सिद्धांत (Gujral Doctrine) का सुदृढ़ीकरण: 'गैर-पारस्परिकता' (Non-reciprocity) के सिद्धांत पर आर्थिक और ढांचागत सहायता जारी रखनी चाहिए। (जैसे- 2025 में मालदीव को ₹4,850 करोड़ की ऋण सुविधा और नेपाल को त्वरित मानवीय सहायता)।
डिजिटल और अवसंरचना कूटनीति: नेपाल के NPI और मालदीव में UPI (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) का सफल एकीकरण 'सॉफ्ट पावर' कूटनीति का उत्कृष्ट उदाहरण है, इसे ऊर्जा (Power Grid) और क्रॉस-बॉर्डर कनेक्टिविटी तक विस्तारित किया जाना चाहिए।
संस्थागत संवाद: कोलंबो सुरक्षा कॉन्क्लेव (CSC) जैसे बहुपक्षीय मंचों को अधिक सक्रिय बनाकर साझा समुद्री सुरक्षा तंत्र विकसित किया जाए।
जन-केंद्रित कूटनीति (People-to-People Contact): सीमाओं पर बुनियादी ढांचे (जैसे इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट - ICP) का आधुनिकीकरण किया जाए ताकि व्यापार और नागरिक आवाजाही निर्बाध हो सके।
भारत की परिधि में उभरती चुनौतियां एक बहुध्रुवीय विश्व की जटिलताओं का प्रत्यक्ष परिणाम हैं। अपने पड़ोसियों की संप्रभुता और राजनीतिक स्वायत्तता का सम्मान करते हुए आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देना ही एकमात्र स्थायी विकल्प है। पड़ोसियों के विकास को साथ लेकर चलना ही 'विकसित भारत @ 2047' के रणनीतिक विजन और 'वसुधैव कुटुंबकम' की वास्तविक सिद्धि का मार्ग प्रशस्त करेगा।