शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और ब्रिक्स (BRICS) में भारत की सदस्यता इसके पश्चिमी सहयोगियों के साथ संबंधों को कैसे संतुलित करती है?
Q. शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और ब्रिक्स (BRICS) में भारत की सदस्यता इसके पश्चिमी सहयोगियों के साथ संबंधों को कैसे संतुलित करती है?
Ans -
समकालीन बहु-ध्रुवीय (Multipolar) विश्व व्यवस्था में, भारत की विदेश नीति पारंपरिक 'गुटनिरपेक्षता' (Non-Alignment) से आगे बढ़कर 'बहु-गठबंधन' (Multi-Alignment) और 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) के उन्नत चरण में प्रवेश कर चुकी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के शब्दों में, भारत आज बहुपक्षीय कूटनीति (Plurilateralism) का अनुसरण कर रहा है। एक ओर जहाँ भारत इंडो-पैसिफिक में क्वाड (QUAD) और यूरोप के साथ रणनीतिक साझेदारियों के माध्यम से पश्चिमी देशों के करीब है, वहीं दूसरी ओर शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और ब्रिक्स (BRICS) जैसी गैर-पश्चिमी संस्थाओं में इसकी सक्रिय सदस्यता यूरेशियन भू-राजनीति और 'ग्लोबल साउथ' (Global South) में इसके प्रभाव को संतुलित और सुदृढ़ करती है।
SCO और ब्रिक्स के माध्यम से पश्चिमी सहयोगियों के साथ रणनीतिक संतुलन
भारत इन मंचों का उपयोग पश्चिमी शक्तियों के साथ अपने संबंधों में 'बार्गेनिंग पावर' (Bargaining Power) बढ़ाने और अपनी स्वायत्तता बनाए रखने के लिए एक 'हेजिंग रणनीति' (Hedging Strategy) के रूप में करता है। इसे निम्नलिखित PESTLE आयामों के अंतर्गत विश्लेषित किया जा सकता है:
1. भू-राजनीतिक और रणनीतिक संतुलन (Geopolitical & Strategic)
यूरेशियन सुरक्षा बनाम इंडो-पैसिफिक: जहाँ अमेरिका और पश्चिमी सहयोगी मुख्य रूप से भारत को इंडो-पैसिफिक (समुद्री सुरक्षा) में चीन के प्रतिसंतुलन के रूप में देखते हैं, वहीं SCO सदस्यता भारत को मध्य एशिया (यूरेशिया) में आतंकवाद-रोधी संरचना (RATS - Regional Anti-Terrorist Structure) के माध्यम से अपनी महाद्वीपीय सुरक्षा सुनिश्चित करने का मंच प्रदान करती है।
रूस के साथ पारंपरिक संबंधों का निर्वहन: पश्चिमी देशों (विशेषकर NATO) और रूस के बीच बढ़ते तनाव (रूस-यूक्रेन संघर्ष) के बावजूद, ब्रिक्स और SCO भारत को रूस के साथ अपने ऐतिहासिक और रक्षा संबंधों (जैसे S-400 मिसाइल प्रणाली) को पश्चिमी प्रतिबंधों (CAATSA) के दबाव से मुक्त रखने का कूटनीतिक कवच प्रदान करते हैं।
चीन के साथ सीमा प्रबंधन: डोकलाम और गलवान संघर्षों के बाद, SCO और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ही वे दुर्लभ बहुपक्षीय मंच रहे हैं, जहाँ भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व ने 'बैक-चैनल' कूटनीति के माध्यम से तनाव कम करने के प्रयास किए हैं (जैसे हाल ही में कज़ान ब्रिक्स समिट में सीमा समझौते का अनुसमर्थन)।
2. आर्थिक और वित्तीय स्वायत्तता (Economic)
डॉलर के आधिपत्य का विकल्प (De-dollarization): ब्रिक्स का न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) और ब्रिक्स भुगतान प्रणाली (BRICS Pay) जैसी पहलें, पश्चिमी-नियंत्रित विश्व बैंक और IMF जैसी ब्रेटन वुड्स संस्थाओं (Bretton Woods Institutions) के एकाधिकार को चुनौती देती हैं। यह भारत को पश्चिमी वित्तीय प्रतिबंधों के प्रति कम संवेदनशील बनाता है।
ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security): पश्चिमी देशों द्वारा रूसी तेल पर 'प्राइस कैप' (Price Cap) लगाने के बावजूद, ब्रिक्स सहयोगी के रूप में रूस से रियायती तेल की खरीद ने भारत की ऊर्जा मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जो भारत के संप्रभु राष्ट्रीय हित का सर्वोच्च उदाहरण है।
3. कूटनीतिक और वैश्विक व्यवस्था (Diplomatic & Global Governance)
'ग्लोबल साउथ' की आवाज: पश्चिमी देश अक्सर मानवाधिकारों, जलवायु वित्त (Climate Finance) और व्यापार (WTO) पर विकासशील देशों पर नीतियां थोपने का प्रयास करते हैं। ब्रिक्स (अब BRICS+) भारत को SDG 17 (लक्ष्यों के लिए साझेदारी) के तहत ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने और पश्चिमी आधिपत्य के विरुद्ध एक न्यायसंगत विश्व व्यवस्था की मांग करने का मंच देता है।
बहु-आयामी कूटनीति का संरचनात्मक निरूपण
| मंच की प्रकृति | भारत का जुड़ाव (Engagement) | संतुलन का मुख्य उद्देश्य (Balancing Objective) |
| पश्चिमी मंच (QUAD, G20, G7 आउटरीच) | पूंजी, उन्नत तकनीक (AI, सेमीकंडक्टर), समुद्री सुरक्षा (FOIP) | हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की आक्रामकता को रोकना और एफडीआई (FDI) आकर्षित करना। |
| गैर-पश्चिमी मंच (SCO, BRICS) | ऊर्जा सुरक्षा, महाद्वीपीय कनेक्टिविटी (INSTC), आतंकवाद-निरोध | पश्चिमी वैचारिक दबाव से बचना, रूस को चीन के पूर्ण प्रभाव में जाने से रोकना। |
संतुलन स्थापित करने में विद्यमान चुनौतियाँ (Challenges)
यद्यपि यह कूटनीतिक संतुलन आकर्षक प्रतीत होता है, परंतु इसके व्यावहारिक क्रियान्वयन में गंभीर अंतर्विरोध मौजूद हैं:
चीन का संस्थागत प्रभुत्व: SCO और ब्रिक्स दोनों में चीन का स्पष्ट आर्थिक और रणनीतिक वर्चस्व है। भारत के लिए यह सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण है कि ये मंच 'गैर-पश्चिमी' (Non-Western) बने रहें, न कि 'पश्चिम-विरोधी' (Anti-Western) चीनी ब्लॉक में परिवर्तित हो जाएं।
पश्चिमी देशों में विश्वास की कमी (Trust Deficit): भारत द्वारा रूस-यूक्रेन मुद्दे पर तटस्थता और SCO में सक्रियता के कारण, पश्चिमी हलकों में यह धारणा पनप सकती है कि भारत एक विश्वसनीय सुरक्षा भागीदार नहीं है।
द्विपक्षीय तनावों का बहुपक्षीय प्रभाव: पाकिस्तान (SCO में) और चीन (SCO व ब्रिक्स दोनों में) की उपस्थिति के कारण, भारत के लिए आतंकवाद (Cross-border terrorism) और 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) जैसे संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर आम सहमति बनाना कठिन हो जाता है।
आगे की राह (Way Forward)
भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को संरक्षित रखते हुए निम्नलिखित कूटनीतिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए:
मुद्दा-आधारित गठबंधन (Issue-based Coalitions): भारत को 'प्रोजेक्ट-स्पेसिफिक' (Project-specific) कूटनीति को अपनाना चाहिए, जहाँ वह तकनीक और रक्षा के लिए पश्चिम के साथ जुड़े, और ऊर्जा व महाद्वीपीय व्यापार के लिए SCO/ब्रिक्स का लाभ उठाए।
संस्थागत सुधारों की मांग: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) में सुधारों की मांग को ब्रिक्स के माध्यम से अधिक मुखर किया जाना चाहिए, ताकि वैश्विक शासन में समता स्थापित हो सके।
ब्रिजिंग पावर (Bridging Power): भारत को स्वयं को पूर्व और पश्चिम, तथा उत्तर और दक्षिण के बीच एक 'सेतु' के रूप में स्थापित करना चाहिए (जैसा कि G20 नई दिल्ली घोषणापत्र में देखा गया)।
वर्तमान वैश्विक संक्रमण काल में भारत की कूटनीति 'जीरो-सम गेम' (Zero-sum game) पर आधारित नहीं है। SCO और ब्रिक्स में भारत की उपस्थिति इसे एक 'स्विंग स्टेट' (Swing State) के बजाय एक 'अग्रणी शक्ति' (Leading Power) के रूप में स्थापित करती है। पश्चिमी शक्तियों के साथ सहभागिता और एशियाई गठबंधनों में दृढ़ता, भारत को 'विश्वमित्र' (Global Friend) की भूमिका में स्थापित करती है। यही बहु-स्तरीय कूटनीतिक संतुलन 'विकसित भारत @ 2047' के आर्थिक व सामरिक लक्ष्यों को सिद्ध करने तथा 'वसुधैव कुटुंबकम' के दर्शन को वैश्विक पटल पर चरितार्थ करने का सर्वोत्तम मार्ग है।